द्विजों की गिरफ्तारी पर हंगामा क्यों है बरपा?

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~ मनीषा बांगर
बीते 28 अगस्त 2018 को दोपहर होते होते पूरे देश में यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई कि भीमा कोरेगांव मामले में पुलिस ने देश के कई हिस्सों में प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं, विचारकों, लेखकों, पत्रकारों और वकीलों के घरों और दफ्तरों पर छापेमारी की और कुछेक को गिरफ्तार किया। इनमें से एक माओवादी लेखक वरवर राव को हैदराबाद से गिरफ्तार किया गया। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने के आरोप में हिरासत में लिया गया। दिल्ली में वामपंथी गौतम नवलखा भी धर दबोचे गए। सुधा भारद्वाज भी हत्थे चढ़ गयीं। वामपंथी विचारधारा से जुड़े आनंद तुतूलमुड़े के गोवा स्थित घर पर भी छापेमारी की गई।
शहरी माओवाद का भ्रम
एनडीटीवी जैसे न्यूज चैनल ने इस खबर को इमरजेंसी थोपे जाने के अंदाज में चलाया। अरूंधति राय ने भी टिप्पणी करने में देरी नहीं की। उन्होंने भी इस घटना को आपातकाल लागू करने के जैसा करार दिया। निखिल वागले जैसे द्विज भला कैसे खामोश रहते। उन्होंने भी केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया।
इस एक घटना ने देश के द्विजों को हिलाकर रख दिया। शहरी माओवाद के नाम पर तरह-तरह के विश्लेषण सामने आने लगे। बहुजन स्तब्ध रह गए। आखिर माजरा क्या है कि वामपंथी लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है और इन सबके बीच भीमा कोरेगांव की चर्चा हो रही है?
भीमा कोरेगांव के नामपर द्विजपंथी
क्या इस वर्ष 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव में 25 हजार पेशवाई सैनिकों पर 500 महाड़ सैनिकों की विजय के 200 साल पूरे होने पर जो आयोजन किया गया, उसमें वामपंथी संगठनों की भूमिका थी? वहां जो हिंसा भड़की उसमें इनका रोल क्या था? संभाजी भिड़े और एकबोटे का वामपंथी संगठनों से कोई गुप्त समझौता था?
चलिए सच समझने का प्रयास करें। उन दिनों जब आयोजन की तैयारी चल रही थी, तब तीन तरह के लोग शामिल थे। पहले वे बहुजन जो किसी संगठन से जुड़े नहीं थे। वे भीमा कोरेगांव अपने गौरवशाली अतीत को याद करने के लिए शामिल हो रहे थे। दूसरे वामपंथी घराने वाले थे जो बहुजनों की एकता के बूते अपनी पालिटिक्स चमकाना चाहते थे। इन लोगों ने यलगार परिषद का गठन कर रखा था। कामरेड प्रकाश आंबेडकर और आनंद तुतूलमुड़े भी इनमें शरीक थे। यलगार परिषद ने आयोजन के दो महीने पहले से ही कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी आदि को प्रचार के काम में लगा दिया। यह कोशिश की गई कि भीमा कोरेगांव विजय दिवस समारोह दलितों और बहुजनों का नहीं कथित वामपंथी समूहों द्वारा आयोजित किया जा रहा है।
वामपंथी ब्राह्मण बनाम संघी ब्राह्मण
जब यह सब चल रहा था तभी तीसरे तरह के लोग जुड़े। ये आरएसएस के ब्राह्मण थे। संभाजी भिड़े और एकबोटे आदि के नेतृत्व में भीमा कोरेगांव विजय दिवस को एंटी हिंदू आयोजन के रूप में प्रचारित किया जाने लगा।
कुल मिलाकर भीमा कोरेगांव के आयोजन को वामपंथी बनाम एंटी हिंदू या वामपंथी ब्राह्मण बनाम संघी ब्राह्मण के रंग में रंगने की कोशिश की गई। इस पूरे मामले में सबसे अधिक उल्लेख नहीं है यह है कि ना तो वामपंथी ब्राह्मण अपने मंसूबे को पूरा करने में कामयाब हुए और ना ही संघी ब्राह्मण। सबकी पोल खुल चुकी थी।
जब संविधान जला तब क्यों रहे खामोश?
बहरहाल अब जो कुछ भी सामने आ रहा है, वह महज आई वाश के जैसा ही है। कुछ ब्राह्मण पकड़े जा रहे हैं। यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि केवल द्विज ही बहुजनों की लड़ाई लड़ते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। फिर चाहे कथित प्रगतिशील द्विज कितना भी तर्क देते रहें। अभी बहुत अधिक दिन नहीं हुए हैं जब देश की राजधानी दिल्ली में भारत सरकार की आंखों के सामने देश का संविधान जलाया गया। किसी भी प्रगतिशील द्विज ब्राह्मण ने इसकी आलोचना नहीं की। वह खामोश रहे। फिर आज जब उनके ऊपर हमले हो रहे हैं फिर इसे आपातकाल की संज्ञा क्यों दी जा रही है? क्या जब देश का संविधान जलाया जा रहा था तब आपातकाल की स्थिति नहीं थी?
आज हंगामा क्यों बरपाया जा रहा है? क्या आपकी पॉलिटिक्स खतरे में है कामरेड द्विज?
~ मनीषा बांगर
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