जिस गौ हिंसा से लहूलुहान हैं पसमांदा-बहुजन, उसी गौ आतंक का लाभार्थी है सय्यैद ब्राह्मण

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लेखक: नाज़ खैर, जेंडर और पसमांदा एक्टीविस्ट

अनुवादक: डॉ जयंत चंद्रपाल, सामाजिक चिंतक

अनुकूल जलवायु और स्थलाकृति के कारण, पशु पालन, डेयरी और मत्सयपालन आदि क्षेत्रों ने भारत में प्रमुख सामाजिक-आर्थिक भूमिका निभाई है। इसके अलावा, पारंपिरक, सांस्कृतिक एवं घार्मिक मान्यताओं ने भी इन गतिविधियों की निरंतरता में अपना योगदान दिया है। वैसे देखा जाए तो लाख लोग को सस्ते एवं पोस्टिक भोजन प्रदान करने के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में (खासकर भूमिहीन छोटो एवं सीमांत किसान एवं महिलाओं में) लाभकारी रोजगार पैदान करने में भी इन क्षेत्रों की विशेष भूमिका रही है।

(वार्षिक रिपोर्ट 2016‐17, पशु पालन विभाग, डेयरी और मत्स्य पालन कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय भारत सरकार)

पशधनु आबादी 1, मवेशी सूची 2, दधू उत्पादन और मांस निर्यातक के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है, इतना ही नहीं भारत दुनिया में जूते और चमड़े के वस्त्र का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा उत्पादक है। गौरतलब है कि मवेशी (भैस समेत), बकरी और भेड़ इस पशु पालन की वजह से ही देश में डेयरी, गोमांस और चमड़े के उद्योग चलते हैं। आजीविका के संदर्भ में देखा जाए तो इन पशुधन के साथ बहुजन व्यवसायी समूह (एससी/एसटी/सभी धर्म के ओबीसी) का सीधा सदियों से निरंतर रुप से संबंध रहा है। नतीजतन न बल्कि पशुधनों का संरक्षण हुआ है बल्कि पशुआबादी में कई गुना बढ़ोतरी होते हुए संवर्धन हुआ है। पशुपालन के साथ-साथ कृषि भी बहुजनों के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन है। यह पशु पालन एवं कृषि केवल अर्थ उपार्जन का साधन न होते हुए बहुजनों के आपसी, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संबंध का मुख्य आधार बने हुए हैं। जहां तक पर्यावरण की सुरक्षा का प्रशन है वहां कृषि और पशुधन पालन में बहुदन के गैर भौतिकतावादी दृष्टिकोण ने पर्यावरण की सुरक्षा में एख बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

इस लेख में पासमांदा शब्द जिसका फारसी शब्द ‘उत्पीड़त’ का प्रयोग बहुजन मुसलमानों (एससी/एसटी/ओबीसी इस्लाम में परिवर्तित) के लिए किया गया है। इतिहास इस बात का गवाह है कि आजीविका के साधन-संसाधन जो कि बहुजनों ने अपने सशक्तिकरण के लिए खून पसीना लगाते हुए पैदा किए हैं उसको कमजोर करने के लिए अर्थात बहुजनों की आर्थिक भागीदारी नष्ट करने के लिए बहुजन सशक्तिकरण का विरोध करने वाली उपद्रवी शक्तियां हमेशा मौजूद रहती हैं। बहुजन अपने द्वारा निर्मित साधन-संसाधन एवं सम्पत्ति का लाभ प्रापत् कर सके। उससे पहले ही यह उपद्रवकी शक्तायां बहुजन विरोधी नितियां लागू कर देती है कि ताकि इसका फायदा बहुजनों को नहीं बल्कि उनको ही मिलता रहे। यह आलेक सरकार की ऐसी ही नीति ‘मेक इन इंडिया’ 4 की जांच करता है। क्या ‘मेक इन इंडिया’ की यह जो सरकारी नीति है वह बहुजन जन-आजीविका और बहुजनों के सामाजिक अधिकार-सांस्कृतिक विकास को कमजोर करने के लिए तैयार की गई है।

इस लेख का केंद्र बिंदु डेयरी, गोमांस और चमड़े के क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम की जो रुपरेखा है वह है। मेक इन इंडिया की जो निहित है वह भारत को वैश्विक रुप रेखा में ढालने की और विनिर्माण केंद्र में बदलने के लिए और विनिर्माण केंद्र में बदलने की है।

2014 में सत्ता में आने के कुछ महीने के पश्चात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली भाजपा सरकार ने इसका प्रारंभ किया था। ‘मेक इन इंडिया’ को भारत में सार्वजनिक-निजि साझेदारी की परिवर्तनकारी शक्ति के रुप में देखा जा रहा है और साथ-साथ वैश्विक भागीदारों, मुख्य रुप से संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और जापान को भी सम्मलित किया जा रहा है। इसमें भारतीय अर्थव्यवस्था के 25 सेक्टर शामिल हैं। ‘मेक इन इंडिया’ निति के तहत सम्मलित 25 क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण और चमड़े के क्षेत्र भी शामिल हैं। डेयरी और गोमांस निर्यात खाद्य प्रसस्कंरण क्षेत्र भी इसके अंतर्गत आते हैं। भारतीय नीजि कंपनियां एवं विदेशी कंपनियों को आमंत्रित करने के लिए इन 25 सेक्टर की विवरणीका जो तैयार की गई है उसमें यह बताया गया है कि इनमें व्यवसाय करने में बहुत आसानी है।

“मेक इन इंडिया-लेधर” की जो विवरणीका तैयार की गई है उसमे यह बताया गया है कि भारत में निर्यात इकाइंयो को स्थापित करने का अवसर, भारत में बड़े घरेलूबाजार को टैप करने का अवसर, अन्य प्रमुख विनिर्माण देश की तुलना में उत्पादन लागत और श्रम लागत में तुलनात्मक लाभ, एक नई उत्पादन ईकाई य मौजूद उत्पादन ईकाई के लिए कुशल प्रशिक्षित मानव शक्ति उपलब्ध है। स्वचलित मार्ग के माध्यम से अनुमत 100% विदेसी प्रत्यक्ष निवेश, पूरे चमड़े की डिलाइसेंसिग, अत्याधुनिक मशीनों के साथ आधुनिक लाइनों का विस्तार की सुविधा प्रदान करना और कई योजनाओं के माध्यम से उपकरण और पूरी तरह से सरकारी वित्तीय सहायता।

‘मेक इन इंडिया खाद्य प्रसंसकरण’ अंतर्गत डेयरी और फार्मिंग एवं बीप बीफ एक्पोटर्स सेक्टर की विवरणीका में यह बताया गया है कि अन्य चीजों के साथ एकीकृत शीत श्रृंखला और मूल्य वृद्धि बुनियादी ढांचे की योजना शामिल है जिसमें संबंधित मंत्रालय 228 ऐसी परियोजनाओं की सहायता कर रहा है, और 2017 में 16 परियोजनाएं शुरु की गई हैं। जिससे 2.44 लाख मीट्रिक टन शीत भंडारण की अतिरिक्ता क्षमता पैदा हुई है। व्यक्तिगत त्वरित फ्रीजिंग (आईक्यूएफ) के प्रति घंटे 72.70 मीट्रिक टन प्रति वर्ष, 34.55 लाख लीटर प्रतिदिन दूध/प्रसंस्करण भंडारण और 472 रियन वहान को 2014 -2017 के दौरान बनाया है। डेयरिंग प्रोसेसिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड ‘डीआईडीएफ’ की स्थापना 2017-18 से 2028-29 की अवधि के दौरान 1.67 अरब अमेरिकी डॉलर के परिव्यय के साथ की गई है। चार बूचड़खानों की परियोजनाएं पूरी की गई हैं। बूचड़खानों की आधुनिकीकरण की योजना के तहत, पणजी (गोवा) में एक परियोजना को परिचालित किया गया है। खाद्य प्रसंस्करणों में स्वचलित मार्ग के तहत 100% एफडीआई की अनुमति है, भारत में निर्मित या उत्पादित खाद्य पदार्थों के संबंध में ई-कॉमर्स माध्यम से व्यापार के लिए सरकार द्वारा अनुमोदित मार्ग के माध्यम से 100% एफडीआई की अनुमति है। अंत में सरकार ने पूरी तरह से वित्तीय सहायता और कर छुट्टियों का वचन दिया है। “मेक इन इंडिया” का रोलआउट (मार्केटिंग के लिए) भारत में विदेशी भागीदार की भागीदारी बढ़ाने के लिए जून 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 84 देशों के दौरे किए और उस दौरान स्पष्ट रुप से चार्टडर उड़ान विमानों के रखरखाव और हॉटलाइन सुविधाओं पर 1 हजार 484 करोड़ रुपये का व्यय किया गया। एक प्रेस स्टेटमेंट में प्रधानमंत्री की इस तरह की विदेशी यात्राओं के बारे में निम्नानुसार कहा गया है कि प्रधानमंत्री ने नॉर्डिक देशों और भारत के बीच के सहयोग को गहरा बनाने का वचन दिया, और वैश्विक सुऱक्षा का अधिकार वाकास, नवाचार और जलवायुपरिवर्तन से संबंधित प्रमुख मुद्दों पर अपनी चर्चाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। प्रधानमंत्री ने समावेशी विकास को प्राप्त करने के और सतत विकास लक्ष्यों को साकार करने के लिए उत्प्रेरक के रुप में मुक्ति व्यापार की पुन: पुष्टि की।

स्वच्छ प्रौद्योगिकियों, समुद्री समाधान, बंदरगाह आधुनिकीकरण, खाद्य प्रसंस्करण, स्वास्थ्य, जीवन विज्ञान और कृषि में नॉर्डिक देशों और भारत दोनों के लिए प्राथमिकता के रुप में जोर दिया गया।

(अप्रैल, 2018 में भारत और नॉर्डिक देशों के बीच शिखर सम्मेलन के बाद प्रेस वक्तव्य के कुछ अंश)

यहां पर प्रश्न यह उठता है कि क्या भारत का विकास का ऐजेंडा मुख्य रुप से पारंपरिक व्यवसाय में जुड़े बहुजन जाति समूह के लिए बना है? खासकर के इस एजेंडा का संबंध जलवायु परिवर्तन, समर्थक या विरोधी स्थानीय समुदाय के संदंर्भ में हो तब। जब इसे बारीकी से देखते हैं तो ऐसा लगता है कि भारत का विकास का ऐजेंडा बहुजन विरोधी है क्योंकि यह विकास का एजेंडा भारत की निजी कंपिनियों को चमड़े, डेयरी और गोमांस क्षेत्र में विदेशी भागीदार के लिए व्यवसाय करने में आसानी सुनिश्चित करने का विकास एजेंडा है। जहां तक पारंपरिक श्रमिकों का सवाल है, गाय सतर्कता के नाम पर गाय संरक्षण कानूनों के कड़े कार्यन्वयन और गाय के नाम पर भीड़ हत्या की वजह से पारंपरिक श्रमिकों के लिए सामान्य रुप से अपने पारंपरिक व्यवसाओं को जारी रखना लगभग असंभव हो गया है। यहां पर गंभीर सवाल यह भी है कि क्या गाय संरक्षण कानून, एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) और पीईटीए (जानवरों के नैतिक उपचार के लिए लोग) हस्तक्षेप और ‘मेक इन इंडिया’ के बीच कोई संबंध है तो उनके एक साथ आने से कौन पीड़ित है? कौन लाभार्थी है? ऐसे बहुत सारे सवाल उभरकर सामने आते हैं, इन सारे सवालों के जवाब हमें मीडिया रिपोर्ट्स के लिए गए निम्नलिखित पैराग्राफ से मिल जाता है।

 

1.उत्तर प्रदेश में 140 बस्तियों और 50, 000 से अधिक मांस की दुकानों को अवैध या बिना अनुमति के चलने वाली घोषित किया गया। (आईएएनएस, 2017) और इस तरह मांस के उत्पादन और बिक्री पर हमला किया गया, केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि समूचे भारत देश में मांस उपयोग पर कसाई (बूचर्स) जाति का प्रभुत्व है जो कि पसमांदा मुस्लिम है।

2.गौहत्या प्रतबंधित कानून पहले से ही ज्यादातर राज्यों में बने हुए हैं. इसके बावजूद कत्ल के लिए मवेशियों के व्यापार पर प्रतिबंध लगाने के कारण मवेशियों को गाड़ी, टैनरीज में श्रम और जूते, बैग और बेल्ट बनाने का काम श्रमिक खो देते हैं। इन मवेसियों में केवल गाय की भीड़ नहीं है लेकिन मांस और चमड़े के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अन्य जानवर भी होते हैं जैसे भैंस (रायटर्स 2017)।

  1. लाखों की संख्या में बहुजन मांस और चमड़े के उद्योगों में काम करते हैं। जब जून 2017 में रायटर्स ने आगरा के संकीर्ण शूमेकिंग लेन (जूता निर्माण बाजार) का दौरा किया, तो मुस्लिमों की भीड़ इकट्ठा हो गई। वे गुस्से में चिल्लाने में लगे, कि वे अब भैंस का व्यापार करने के लिए भी सुरक्षित नहीं है। जूते के ले जानवर का चमड़ा खरीदने का काम उनका समुदाय सदियों से करता आया है अब उनको यह खरीदने से गाय सतकर्ता के नाम पर उग्र हिंदूवादियों द्वारा हमला किए जाने का डर लग रहा है। मवेशी वध पर सरकारी कार्रवाई के चले अब आगरा में छोटे पैमाने पर जूता निर्माण करने वाला जूता निर्माणा श्रमिक को काम से बर्खास्त कर रहे हैं।
  2. इंडियास्पेंड जो कि एक डेटा पत्रकारिता वेबसाइकट है, (http://lynch.factchecker.in) उसके अनुसार, गाय से जुड़ी हिंसा की 94 घटनाएं 2012 से 2018 के बीच हुई जिसमें 37 लोगों की मौत हो गई. पीड़ित की संख्या 308 थी और प्रमुख हमले की संक्या 164 के रुप में सबसे ज्यादा भी। यहां पीड़ितों के रुप में शिर्ष दो जातीय समुदाय दर्ज हैं और वो है मुस्लम और दलित। इंडियास्पेंड में मुस्लिम पीड़ितों का डाटा तो है लेकिन मुस्लिम पीड़ितों की जाति के स्थान पर डेटा नहीं है। अगर झारखंड जो कि भीड़ हत्या के मामले में सबसे प्रमुख राज्य है उसके भीड़ हत्या के पीड़ितों के स्थान पर एक त्वरित नजर डाली जाए तो पता चलता है कि उनमें से अधिकतर पसमांदा मुस्लिम समुदाय से हैं। रामगढ़ जिला में अलीमुद्दीन अंसारी मांस व्यापारी की भीड़ हत्या (2017) गोदादा जिला: सिरबुद्दीन अंसारी और मुर्तजा अंसारी की 13 भैंस चुराने के शक में हत्या (2018) लतेहर जिला: मजलूम अंसारी और इम्ताज खान मवेशी मवेशी व्यापारियों के रास्ते में भीड़ के हाथों बेरहमी से पीटा गया, और उनकी लाशों को झांडी में फेंक दिया गया (2016) बोकारो जिला: शमसुद्दीन अंसारी की बच्चों का अपहरण करने वाले (2017) के संदेह में भीड़ हत्या।

भारत में वर्ग समूह में जातियों में विभाजित है. पिछड़ा वर्ग के लिए बने मंडल आयोग ने भी जाति और वर्ग के बीच अभिसरण पाया है। इंडियास्पेंड के मुताबिक भीड़ हत्या के पीड़ित लगभग पूरी तरह से गरीब परिवारों से हैं। इसलिए झारखंड मे हुई भीड़ हत्याओं के पीड़ित अंसारी जो कि मुसलमानों के बुनकर समुदाय से हैं। कुछ मामलो में ‘अंसारी’ उपनाम का प्रयोग ऊपरी जाति मुसलमानों द्वारा भी किया जाता है मगर ज्यादातर पसमांदा मुसलमानों में ही होता है।

बिल्कुल इसी प्रकार से राजस्थान से भीड़ हत्या पीड़ित पहलू खान, जुनैद खान, उमर और हरियाणा से अकबर सभी मेयो मुसलमान हैं(हरियाणा में मेओ और राजस्थान मे मेव कहा जाता है) मेव/मेओ मुसलमान पसमांदा मुस्लिम मुसलमान हैं। वे पारपंरिक देहती और उसमें भी गडरिया समुदाय के हैं जो दुग्ध गायों का पालन करते हैं। पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता जॉन देहाल ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है कि जब हम ‘कारबां-ए-मुहब्बत’ के तहत हरियाणा से होते हुए मेवात ‘राजस्थान’ की दो दिन की यात्रा पर निकले थे तो आंसू भर आंखो से नाराजगी के सुरों में बुजुर्ग सवाल करते हैं “क्या मुस्लिम गायों को नहीं रख सकते?। या क्या कोई ऐसा कानून पारित किया गया है कि मुसलमान गायों को नहीं रख सकते? मेवात में ज्यादातर मुसलमान खास करके मेव लोग गायों को रखते हैं कुछ लोग तो 100 से भी ज्यादा गायों को रखते हैं“

  1. इंडियास्पेंड के गाय के सुरक्षा कानूनों के विश्लेषण में पाया गया है कि मार्च 2017 तक भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 84% प्रदेशों में गौ हत्या को प्रतिबंधित किया गया था जो देश की 99.38% आबादी है। इस विश्लेषण में यह भी पाया गया है कि अब हकीकत यह है कि हिंदुत्वादियों का गुट गाय संरक्षण कानूनों का उपयोग एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग के सदस्यों पर हमला करने के लिए कर रहे हैं। भारत के कई हिस्सों में पूरे के पूरे कस्बों को जो कि किसी महत्वपूर्ण मंदिर के आसपास पड़ता है उसको शाकाहारी बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है एक तरह से राज्य सत्ताधारियों की यह प्रवृत्ति भारत के बहुजनों के खाद्य रीति-रिवाजों के लिए कम सम्मान दर्शाती है।
  2. “जब हम मृत जानवरों को ले जाते हैं तो वो पूछते हैं कि कहां से आते हैं। जब हम खाल या हड्डियां ले लेते हैं तो हमसे यही एक प्रश्न पूछते हैं। ये पूछने वाले ‘वे’ विभिन्न उग्र हिंदुत्वादियों का समूह है। उग्र हिंदूत्वादियों द्वारा किया गया उत्पीड़न अक्सर असुरक्षितिता महसूस करवाने के लिए है। इसके अलावा यह भी देखा गया है कि चमड़ा उतारने वाला बहुजन जिस भूमि पर मृत जानवर का चमड़ा उतारने का काम करते हैं उस भूमि पर कई समय के चलते भी उनका अधिकार नहीं हैं। इसके विपरीत गुजरात में यह देखा गया है कि राजकोट नगर निगम की सड़कों से जानवरों के शवों को इकट्ठा करने के लिए प्रतिदिन 5 हजार 800 रुपये गैर बहुजन साझेदारी के भुगतान किया जा रहा है और चमड़ा उतारने के क्षेत्रों में (सोकरा में) डंप करवाया जाता है। यह गैर बहुजन साझेदारी वाले मजदूर चमड़े का निर्माता नहीं हैं क्योंकि न तो यह चमड़ा उतारने का काम करते न ही हड्डियों का। यह न ही तो कटु सत्य है बल्कि दुखद भी। चमड़ा उतारने वाले एक बहुजन का कहना है कि उनके समुदाय के आस-पास यह काम करने का एक पारंपरिक अधिकार है। वो कहते हैं कि “हम लोग यह काम कई सदियों से करते आ रहे हैं” लेकिन सरकार यह काम किसी और जाति जिनका इस व्यवसाय से दूर दराज का भी संबंध नहीं उनको ठेकेदारी के रुप में दे रखी है।

चमड़ा उतारने वाले बहुजन अनोपचारिक श्रमिक हैं, न कि अवैध श्रमिक। लेकिन सरकार उन्हें औपचारकि रुप से लागू नहीं करेगी। (चमड़े के श्रमिकों को लाइसेंस दें) क्योंकि उनकी चमड़ा उतारने प्रदूषण पैदा करती है। कानपुर में, 98 टैनरीज बंद कर दी गई जब राष्ट्रीय पर्यावरण ट्रिब्यूनल ने पाया कि वे गंगा में प्रदूषक डंप कर रहे थे। इस साल की शुरुआत में भारतीय पत्रकारिता संगठन, द वायर ने एक जांच में पाया कि यहां भी. उग्र हिंदुत्ववादी गौसुरक्षा भीड़ के खतरे का असर पड़ रहा है। (From Aljazeera.com featured article, ‘India’s Dalit cattle skinners share stories of abuse’12).

भारत ने बुचड़खानों में ले जाने वाले मवेशियों के व्यापार पर प्रतिबंध को निलंबित कर दिया (10 जुलाई 2017) है लेकिन गाय से संबंधित हिंसा/भीड़ हत्या निरंतर रुप से चलती रहती है और इन सारी घटनाओं में पिछले वर्ष 2014, 2015, 2016, और 2017 में हुई गाय से संबंधित हिंसा, भीड़ हत्याओं की घटनाओं की तुलना में 2018 में घटित घटनाओं में मुस्लिम पीड़ितों के प्रतिशत ज्यादा रहे हैं। (lynch.factchecker.in )।

  1. मवेशी उद्योग में बहुजन तेजी से अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़ रहे हैं। 2016 के ऊना हमले में जब चार बहुजन पुरुष पर मृत मवेशियों का चमड़ा उतारने के कार्य के कारण कोड़े बरसाए गए थे, तब उना में चमड़ा उतारने वाले बहुजन टैनरों और गुजरात के अन्य हिस्सों में जाति आधारित व्यवसाय के नाम पर मवेशी शवों को स्किन करने का काम करने वालों ने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ अपना विरोध जताते हुए इस काम को छोड़ दिया था। उनमें से कई लोग नए काम को खोजने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जबकि उनके चचेरे भाई जितु सरवैया (ऊना हमले के पीड़ित) अब मोरबी जिले में एक सिरेमिक कारखाने में इलेक्ट्रीशियन के रुप में काम करते हैं।

जाहिर है इन गौरक्षकों को पीईटीए(PETA) और NGT को मवेशी क्षेत्र में पारंपरिक गैर संगठित या अनौपचारिक श्रमिक के साथ ही समस्या है। लेकिन बड़े-बड़े खिलाड़ियों के साथ नहीं। दूसरी तरफ बड़े खिलाड़ियों को भी अनौपचारिक श्रमिकों के साथ समस्या है। मिसाल के तौर पर कहते हैं कि केवल लाइसेंस प्राप्त अभियुक्तों को संचालित करने की इजाजत इस उद्योग की छवि को साफ सुधरा बनाएगी। बड़े निर्यातकों का भी यह कहना है कि उनके पर्याप्त चमड़े हैं क्यों वे विदेशों से भी व्यापक रुप से चमड़ा मंगवाते हैं।

ओईसीडी-एफएओ कृषि आऊटलुक 2017-18 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत गोमांस का दुनिय का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक है और इस दशक में अगले दशक से भी बेहतर स्थिति पकड़ने का अनुमान है। अल्लाना सन्स प्राइवेट लिमिटेड, अल-हम्द फूड प्रॉडक्टस प्राइवेट लिमिटेड, मिरा एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड और एमके ओवरसीज प्राइवेट लिमिटेड यह चार कंपनियां देश में शीर्ष चार गोमांस निर्यातक कंपनियां है। भारत सरकार के स्वामित्व वाले जेएनपीटी (जवाहर लाल नेहरु पोर्ट ट्रस्ट से आयात करने वाले देशों में जाते हैं। जिनका स्वामित्व भारत सरकार का है। भारत सरकार ने निर्यात किए जाने वाले गोमांस के सभी प्रेषण के लिए हलाला प्रक्रिया अनिवार्य कर दी है। भारत सरकार से हलाला बीफ निर्यात से अरबों डॉलर की कमाई करती है।

जमीयत उलमा ए हिंद हलाल ट्रस्ट और जमीयत उलमा हलाल फाउंडेशन जो ऊपरी जाति मुस्लिम संगठन है। (इन संगठनों के संगठनात्मक चार्टर को अपनी संबंधित वेबसाइट पर देखें) केवल वे दोनों की ही हलाला मांस के लिए मान्यता प्राप्त और विश्वस्तर पर स्वाकर्य प्रमाणकर्ता हैं। इसमें कोई आश्चार्य की बात नहीं है कि हाल ही में जमीयत उमला हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने गाय को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित करने के लिए आवाज उठाई थी? पत्रकारों से बात करते हुए मदनी ने था कि देस में गो हत्या को लेकर आए दिन माहौल बिगड़ रहे हैं, इस मसले को लेकर कई हत्याएं हो चुकी हैं, गाय और इंसान दोनों को सुरक्षित रखने के लिए गाय को राष्ट्रीय पशुघोषित किया जाए। इंटरनेट पर सर्च करने से इस बात का पता जाएगा कि ऑश्ट्रेलिया में हलाला प्रमाणीकरण एक बहुत ही बड़ा और लाख डॉलर की आमदनी वाला व्यवसाय है। हालांकि जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट औऱ जमीयत उलमा हलाल फाउंडेशन द्वारा हलाल मांस प्रमाणन के माध्यम से जमीयत के हलाल मांस प्रमाणन संगठनों की आय का अंदाजा लगाया जा सकता है। वो निश्चित रुप से अऱबों-खरबों रुपयों में होगी।

डेयरी क्षेत्र खड़ा करने के पीछे मकसद यह था कि छोटे और सीमांत किसानों के लिए माद्यम पैमानें पर डेयरी खेतों को विकसित किया जा सके। कृषि और डेयरी से जुड़े व्यवसायों के प्रमुख वित्तदाता राबोबैंक द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ‘Emerging Dairy Farm Trends in India’18 के मुताबिक 50 से 300 मवेशियों के साथ मध्यम पैमानें पर चली जाने वाली डेयरी फार्म्स भारत के विकास-चालकों में से एक होगा। इस तरह भारतीय डेयरी क्षेत्र में दुग्ध आपूर्ति श्रंखला में दूध खरीद एकमात्र सबसे महत्वपूर्ण लिंक बन जाएगा। प्रत्यक्ष दूध सोर्सिंग धीरे-धीरे एजेंट आधारित दूध सेर्सिंग में बदल जाएगा। जो कि एक प्रभुत्वशाली मॉडल बनकर रहेगा। इसलिए गाय सरंक्षण कानून का कड़ा कार्यान्वयन, गाय सतर्कता के नाम पर हिंदुवादियों का आंतक, भीड़ हत्याएं और 2017 में पशु के प्रति क्रूरता की रोकथाम के नियमों में बदलाव यह मात्र संयोग नहीं है, बास्तव में यह बुचड़खानों के लिए मवेशियों के व्यापार पर प्रतिबंध लगाने और इन मवेशियों के मालिकों के व्यापार/व्यवसाय को सीमित करने का कदम है और अंतत: यह कदम गरीब, भूमिहीन किसानों की आजीविका को छीनने बहुत बड़ी साजिश है।

इस तरह से भारत के 1 लाख करोड़ रुपये के इस मांस उपयोग से गरीब भूमिहीन किसान की भागीदारी को नकारा जा रहा है, जिसकी सबसे बड़ी वजह केवल मात्र यही हो सकती है कि मेक इन इंडिया कार्यक्रम को गैर संगठित क्षेत्र की बर्बादी कीमत पर सफल बनाया जा सके और ब्ल्कुल ऐसी साफ नजर आ रहा है। सरकार की आर्थिक नीतियां बहुजोनों ( मुख्य रुप से डेयरी, गोमांस, चमड़े के क्षेत्र में काम कर रहे मेयो/मेव, चमार, यादव और कसाई) हो रहे गाय के नाम पर या अन्य बहस के नाम पर हिंसात्मक हमलों व्यख्यात कर रही है।

ईपीडब्लू में ‘Unorganised Sector Workforce in India: Trends, Patterns and Social Security Coverage’ (S. Sakthivel and Pinaki Joddar) के शीर्षक से प्रकाशित लेख लिखी गई निम्नलिखित तालिका, समाजिक रुप से कमजोर समूहों की अनौपचारिक या संगठित क्षेत्र में हिस्सेदारी पर जानकारी प्रदान करती हैं। यह दिखाता है कि गैर-संगठित क्षेत्र में बहुजन श्रमिकों की संख्या (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जाति) 90% से अधिक हैं।

2013 में विश्व बैंक के एक नीति शोधकर्य पत्र ने भारत के असंगठित क्षेत्र को ‘पर्सिस्टेंट’ ह बहुअर्थात यत ही सख्त और हठी किस्म का होता है ऐसा कहा है। उनका कहना है कि भारत के असंगठित क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव आधुनिकीकरण, विकास और क्षेत्रिय आर्थिक समानता प्राप्ती के लिए अत्यंयत महत्वपूर्ण हैं। विनिर्माण और सेवाओं में भारत के असंगठित क्षेत्र के बारे में कई महत्वपूर्ण तथ्य हैं- पहला असंगठित क्षेत्र 99 प्रतिशत है जो कि बहुत ही बड़ा है और वो विनिर्माण में 80 फीसदी रोजगार पैदा करता है। दूसरा असंगठित क्षेत्र बहुत ही सख्त और हठी है। 1989 और 2005 में विनिर्माण के क्षेत्र में 81 प्रतिशत रोजगार असंगठित क्षेत्र को मुहैया था। तीसरा, असंगठित क्षेत्र की यह दृढ़ता किसी निश्चित विशेष उद्योग उप समूह या राज्यों के कारण नहीं हैं, क्योंकि ज्यादतर उद्योग और राज्य असंगठित क्षेत्र के रोजगार हिस्से में बहुत ही सीमित परिवर्तन दिखाते हैं।

जिस तरह से स्थानीयकृत असंगठित गतिविधि मौजूद हैं वो भी महत्वपूर्ण कारण हैं क्योंकि यह विनिर्माण फर्मों के लिए कमजोर उत्पादन कार्यों से जुड़ी हुई है। यह शोधकार्य पत्र अध्ययन राज्य और उद्योग द्वारा सकारात्मक बदलाव को बढ़ावा देने की स्थितियों की जांच करता है और पाया जाता है। कि विनिर्माण क्षेत्र में संक्रमण के लिए बड़े संगठित क्षेत्र की विनिर्माण इकाईयां सबसे महत्वपूर्ण हैं जबकि छोटे प्रतिष्ठान सेवा क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

निष्कर्ष

ऐसा क्यों है कि भारत के लोकतंत्र के 70 वर्षों बाद भी मांस, चमड़े और डेयरी क्षेत्रों में बहुजन परपंरागत व्यावसयिक समूह माध्यम पैमाने के उत्पादकों के रुप में भी विकसित नहीं हो सकें। क्यों वे मेक इन इंडिया के तहत प्रमुख प्रतिभागी के रुप में उभर नहीं पा रहे हैं। यह अनिवार्य है कि सरकार बहुजनों के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विकास पर ‘मेक इन इंडिया’ पीईटीए, एनजीटी और गाय संरक्षण कानूनों के प्रभाव पर एक श्वेत पत्र तैयार करे। बहुजन कार्यकर्ताओं और राजनेताओं को इसकी मांग करनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा तो बहुजन पूरी तरह से बर्बाद हो जाएंगे। इसलिए यही बेहतर होगा कि जितना जल्दी हो सके इस श्वेत पत्र मांग की मुहिम को आगे बढ़ायें।

‘मेक इन इंडिया’ की नीतियां और बहुजनों के जीवन उनकी आजीविका को जोड़कर समझने की आवश्यकता है। इसके साथ साथ यह भी समझने की आवश्यकता है कि गाय सतर्कता के नाम पर जो उग्र हिंदुवादिओं के माध्यम से बड़े पैमाने पर बहुजनों पर हमले हो रहे हैं। जो न केवल बहुजनों के जीवन में बाधा डाल रहे हैं बल्कि इस हिंसा के कुछ निश्चित लाभार्थी वर्ग भी हैं। उसकी पहचान भी बहुत आवश्यक है। बड़े पैमाने पर संगठति बुचड़खाने, डेयरी, आदि को अत्यधिक सब्सिडी देकर सरकार द्वारा पालन पोषण किया जा रहा है या सरकार समर्थित प्रत्यक्ष लाभार्थी हैं।

मुस्लिम नेताओं की चुप्पी साफ-साफ दिखाई दे रही है वे चुप हैं क्योंकि वे ज्यादातर ऊंची जाति पृष्ठभूमि से आते हैं, उन्होंने हमेशा पसमांदा मुसलमानों की दुर्दशाओं को उपेक्षित किया है। इस मुद्दे को बहुजन मुद्दे के रुप में समझा जना चाहिए, न कि केवल मुस्लिम या एससी-एसटी के रुप में।

-संदर्भ सूची

  1. Ghotge N, Gáspárdy A (2016) A Socio-Economic Pilot Study on Indian Peri-Urban Dairy Production†. Int J Agricultural Sci Food Technology 2(1): 028-034. DOI: 10.17352/2455- 815X.000011
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  3. http://www.makeinindia.com/sector/leather
  4. makeinindia.com
  5. . https://indianexpress.com/article/india/rs-1484-crore-spent-on-pm-narendra-modi-foreign-trips govt-5266807/ 6.

6. http://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1529452

7. Ramkrishna Mukherjee, Economic and Political Weekly, Vol. 34, No. 27 (Jul. 3-9, 1999), pp. 1759-1761

  1. http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/49948/7/07_chapter%202.pdf
  2. https://www.thehindu.com/opinion/lead/wages-of-vigilantism/article24234811.ece

10.http://haryanascbc.gov.in/list-of-backward-classes; http://sje.rajasthan.gov.in/oldpms/List%20of%20Castes/obc.htm

11.https://scroll.in/article/868067/opinion-the-opposition-must-make-repealing-cow-protection-lawsan-election-issue-in-2019

12.https://www.aljazeera.com/indepth/features/2016/08/india-dalit-cattle-skinners-share-storiesabuse-160816122203107.html

13.https://scroll.in/article/877441/dalit-survivors-of-2016-una-assault-have-converted-to-buddhismbut-continue-to-live-in-fear

14.https://in.reuters.com/article/uk-india-politics-religion-insight/cattle-slaughter-crackdown-ripplesthrough-indias-leather-industry-idINKBN1951QQ

15.Source: exportgenius.in

16.https://www.salaamgateway.com/en/story/indias_carabeef_exporters_grapple_with_multiple_hal al_certifications-salaam23072017122027/

17.https://www.dailytelegraph.com.au/news/nsw/halal-certification-in-australia-is-big business-andworth-millions-to-certifiers/news-story/621b3f642d22f78a884a365c007e8def

18.https://www.thehindu.com/news/cities/mumbai/business/india-heading-towards-mediumscaledairy-farms/article8444336.ece

19.now undone after the damage has been done as violence against the bahujans in beef, dairy and leather work continue unabated.

20.”Ghani, Ejaz; Kerr, William R.; O’Connell, Stephen D.. 2013. The Exceptional Persistence of India’s Unorganized Sector. Policy Research Working Paper;No. 6454. World Bank, Washington, DC. © World Bank. https://openknowledge.worldbank.org/handle/10986/15593 License: CC BY 3.0 IGO.”

 

(नाज खैर 1993 से हशिये वाले समुदाय और समूहों के साथ काम कर रहे एक Development Professional हैं। उन्होंने पिछले 17 सालों में बच्चों की शिक्षा परियोजनाओं का मूल्यांकन और मुस्लिम शिक्षा से संबंधित बहुत कुछ अध्ययन किया है। वर्तमान में वह सम्पूर्णता पसमांदा-बहुजन परिपेक्ष्य में विकास के मुद्दों को उठा रही हैं।)

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