मुझे ये नहीं मालूम था, मोदी जी निवाला भी छीन लेंगे

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By-डा.सिद्धार्थ रामू

मेरी जिंदगी का बड़ा हिस्सा मारक गरीबी में गुजरा है। दाल, चावल, रोटी-सब्जी सब एक साथ तभी मिलता था, जब कोई मेहमान आता था या त्योहार होता था या शादी या कोई अन्य समारोह। जिंदगी में बहुत बाद में जाना कि ओढ़ना ऐसा भी होता है कि जिसमें ठंड नहीं लगती है। कुछ एक वर्ष पहले से ऐसे घर में रहने लगा हूं, जिसमें बरसात में चूने का डर नहीं सताता, गोरखपुर जैसे शहर में 10 वर्ष खपरैल के एक कमरे में रहा, जो बरसात में खूब चूता था। बहुत बार खाना बनाने के लिए स्टोप में डालने के लिए एक पाव मिट्टी का तेल लाया हूं, आधा किलो आटा भी बहुत बार उधार खरीदा हूं। इसलिए गरीब क्या बला है खूब जानता हूं। गरीबी के चलते, जाति के चलते और स्त्री होने के चलते अपमान को बहुत नजदीक से देखा-समझा हूं।

यह इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि दो बातें मुझे सबसे ज्यादा बेचैन करती है, पहली यह कि खुद के लिए, पत्नी-बच्चों के लिए और बूढ़े मां-बाप के लिए भरपेट भोजन,जरूरी कपड़ा, जाड़े के लिए ओढ़ना-विछौना और एक ऐसा घर जिसके चूने एवं गिरने का डर न हो, मुझे सबके लिए बहुत जरूरी लगता है। बीमार पड़ने पर इलाज होना ही चाहिए। यह भी अत्यन्त आवश्यक लगता है।

आज जिस नरेंद्र मोदी जी की जय-जयकार देश का बड़ा हिस्सा कर रहा है, उन्होंने देश के एक बड़े हिस्सा का सम्मानजनक रोजी-रोटी ( निवाला ) छीन लिया है। नोटबंदी के बाद करीब 3 करोड़ लोगों से एक हद तक सुनिश्चित और थोड़ा सम्मानजनक रोजी-रोटी मोदी जी ने छीन लिया है। तीन करोड़ मतलब करीब 15 करोड़ लोग। एक रोजी-रोटी करने वाला आदमी इस देश करीब 5 लोगों को निवाला उपलब्ध करता है। इसमें 8 हजार से 18 तक पाने वाले लोग शामिल हैं। हां कुछ 80 हजार तक के भी हैं। पिछले दिनों इन तथ्यों की जमीनी सच्चाई पता लगाने मैं लेबर चौराहों पर गया। कुछ फैक्ट्रियों के मजदूरों से मिला, कुछ ढेले-खोमचे वालों से बात किया और कुछ अन्य कामगारों से । कुछ गांव में शहरों से लौटकर आए मजदूरों से। इनकी बाते सुनकर कलेजा फट सा गया।

मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो मुझे यह तो लगा था कि ये आदमी हिंदुओं के मन में मुसलमानों, ईसाईयों और कश्मीरियों के प्रति खूब जहर बोयेगा। बहुसंख्यक लोगों को भारत माता, गऊ माता और जै श्रीराम के नारे लगाती ऐसी भीड़ में तब्दील कर देगा, जो धार्मिक घृणा के जहर से भरे होगें, जिनका कोई भी इस्तेमाल किया जा सकता है। मुझे यह भी पता था कि यह तथाकथित उच्च जातियों के भीतर यह अहंकार फिर से भर देगा कि दलित-बहुजनों को उनकी औकात में रहना चाहिए। यह थोड़ा कमजोर पड़ रहे उच्च जातीय वर्चस्व को और बढ़ा देगा। मुझे यह भी पता था कि यह चंद कार्पोरेट घरानों से ( अंबानी-अड़ानी जैसे) से सांठ-गांठ करके देश संपत्ति, सार्वजनिक धन और प्राकृतिक संसाधनों को उनको सौंप देगा। उसके बदले उनसे अपने चुनावी अभियान और पार्टी के लिए बड़े पैमाने पर धन उगाही करेगा। उनकी मीडिया को अपना भोंपू बना लेगा।

लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि यह आदमी हिंदुत्व के जहर का इस्तेमाल करके करीब 15 करोड़ से अधिक लोगों का निवाला छीन लेगा। यह नोटबंदी, जीएसटी और अन्य-अन्य तरीकों से करोड़ों लोगों का रोजगार छीन कर उन्हें इतना विवश कर देगा कि वे अपने परिवार की बुनियादी जरूरते भी नहीं पूरा कर पाये। दर-बदर भटकने को विवश हो जाएं और जिनसे बात कर किसी भी संवेदनशील आदमी का कलेजा फट जाए।

1. एक आम आदमी की चाह

मैं अदना-सा आम आदमी हूँ

वर्षों से अपनी नियति बदलने का इंतज़ार कर हूँ

मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए

मैं चाहता हूँ

मेरे बच्चे जब सोएँ, तो उनका पेट भरा हो

साड़ी बिना मेरी घरवाली का तन न उघड़ा हो

अपने बूढ़े पिता को एक ऐसा कंबल दे पाऊँ

जिसे ओढ़कर ठंड की रात में

वे चैन से सोएँ

एक घर चाहता हूँ

जिसके चूने का डर

बरसात भर न सताए

साल-दो-साल में एक बार

ससुराल से आने वाली बहन को

विदाई में एक नई साड़ी देना चाहता हूँ

घर आए मेहमान को

दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी

सब एक साथ खिलाना चाहता हूँ

साल में तीज-त्योहार पर

अपने बच्चों को नये कपड़े

घरवाली और माँ के लिए नई साड़ी

पिता के लिए नया कुर्ता लाना चाहता हूँ

इस सबके साथ मैं

थोड़ी-सी इज़्ज़त चाहता हूँ

मैं चाहता हूँ

कोई मुझे अबे-तबे

रे-टे कहकर न बुलाए

क्या मेरा यह महान् देश

मुझे इतना भी नहीं

दे सकता?

~डा.सिद्धार्थ रामू

वरिष्ठ पत्रकार

संपादक-फारवर्ड प्रेस

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