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Opinions - April 3, 2018

पत्नी की इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाना रेप नहीं तो क्या है ?

By: Ankur sethi

सरकार बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ से लेकर नारी हित की खूब बात करती है पर जब वास्तविकता नजर आती है तो इनकी नारी विरोधी स्थिति कई जगह साफ हो जाती है, इसी तरह का एक फैसला गुजरात हाई कोर्ट के हवाले से सामने आया है जिसे न्यायालय का फैसला बताकर, सरकार हाथ खड़े कर सकती है।

ताजा मामला वर्तमान सरकार के गढ़ गुजरात का है जहाँ हाईकोर्ट का फैसला आया है कि पति मर्जी के बिना भी संबंध बनाए तो वो बलात्कर की श्रेणी में नहीं आएगा। जिसका मतलब साफ है कि पत्नी को पति का उत्पीड़न किसी भी हाल में सहना होगा, अगर पति जबर्दस्ती करे तो उसे सहमति देनी होगी या जबर्दस्ती करने के लिए छूट दे देनी है।

भारत में शादी के बाद घरेलू उत्पीड़न से लेकर शारीरिक शोषण के हजारों से लाखों मामले कोर्ट में पड़े हैं और हर दिन नए मुकदमे आ ही रहे हैं जिनमें 80% से अधिक मामले महिला उत्पीड़न के साफ हो जाते हैं। ऐसे में उच्च न्यायालय का यह फैसला महिलाओं को सुरक्षा, न्याय देने के वजाय उनके लिए खतरे की घड़ी पैदा कर रहा है।

यह मामला गुजरात का है जहाँ एक महिला चिकित्सक ने अपने पति के खिलाफ दुष्कर्म व यौन शोषण के आरोप का मामला दर्ज कराया था। उस महिला का पति भी चिकित्सक है।

न्यायालय ने इसी मामले में अपना फैसला दिया है जिसमें न्यायालय ने कहा है कि पति द्वारा पत्नी की असहमति के वावजूद शारीरिक संबंध बनाना दुष्कर्म में नहीं आएगा पर न्यायालय ने यह भी कहा है कि अप्राकृतिक संबंध को क्रूरता की श्रेणी में रखा जाएगा बाकी जबर्दस्ती या असहमति को भारत दंड संहिता की धारा 375 में नहीं लाया जाएगा।

कोर्ट का फैसला आ चुका है पर यह किस हद तक सही है। अगर महिला का पति हर रोज टॉर्चर करके संबंध बनाए, जोर-जबर्दस्ती, मारपीट करे तब उस केस में महिला को वह अपमान लगातार सहना क्यों चाहिए? ऐसे में महिला विरोध ही करेगी और जोर- जबर्दस्ती पर केस भी करेगी पर इस फैसले के आने के बाद लग रहा है कि महिला पर पुरुष का अधिकार हो गया है और वह उसे किसी भी तरह से यूज कर सकता है।

अगर कोर्ट के सामने इस तरह के फैसलों का हनन सामने आया है तो दोषी महिला को सजा देनी चाहिए और आगे इसका दुरुपयोग न हो उसके लिए बड़ा फैसला देकर मिशाल कायम करनी चाहिए।

2 अप्रैल 2018 को गुजरात उच्च न्यायालय का यह फैसला महिलाओं में रोष पैदा करेगा और उन्हें असहज महसूस कराएगा जिसके बाद शादीशुदा महिलाओं के साथ अपराधों में बढ़ोतरी होगी। इसलिए हाईकोर्ट को इस फैसले पर पुर्नविचार की जरूरत है।

 

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