ST, SC, OBC और अल्पसंख्यक महिलाओं के साथ रेप की घटनाओं पर क्यों मर जाती हैं सभ्य समाज की संवेदनाएं!

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By: Ankur sethi

दिल्ली के निर्भया कांड की गूंज भारत के साथ- साथ विदेश तक में सुनी गयी थी जिसके बाद आरोपियों की धरपकड़ तेज हुई और उन पर कड़ी कारवाई की गयी. उस घटना के बाद विरोध के सुर काफी तेज हुए थे लगा की इन घटनाओँ में सुधार आयेगा और उतनी भयानक स्थिति कभी सामने नहीं आयेगी. निर्भया कांड को 5 वर्ष बीत गये पर न तो बलात्कार में कमी आयी और न ही उस तरह के भयानक कृत्य में. पर गौर करने वाली बात यह भी है कि जिस तरह से निर्भया कांड का देश भर में विरोध हुआ. उस तरह का विरोध बहुजन समाज की महिलाऐं के साथ होने वाले अत्याचारों के समय भी कभी हुआ है क्या ? इस सवाल पर चुप्पी ही नजर आयेगी और उस चुप्पी के कारण ही बहुजन महिलाऐं लगातार बलात्कार का शिकार हो रही हैं.

ताजा मामला पश्चिम बंगाल में एक 21 वर्षीय आदिवासी युवती के साथ गैंगरेप का है. रिपोर्ट्स के मुताबिक कई अज्ञात व्यक्तियों ने दक्षिणी दिनाजपुर के कुश्मंडी के पास आदिवासी युवती के साथ बलात्कार किया. गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराई गई युवती के निजी अंगों पर गहरी चोटें हैं. घटना 18 फरवरी, रविवार रात की बताई जा रही है. बताया जा रहा है कि युवती मेला देखकर रात में वापस अपने घर लौट रही थी. तभी रास्ते में कुछ लोगों ने उसे घेर लिया और उसे जबरन एक पुल के नीचे ले गए. आरोपियों ने युवती के साथ गैंगरेप किया और उसके बाद प्राइवेट पार्ट में लोहे की रॉड से चोट पहुंचाई. जिससे युवती की आंत का कुछ हिस्सा बाहर आ गया था. डॉक्टरों ने सोमवार को पीड़िता के तीन ऑपरेशन किए. इसके बावजूद युवती की हालत गंभीर है और वह जिंदगी-मौत की जंग लड़ रही है.

सवाल उठता है कि इन भयानक कृत्यों पर लगाम कब लगेगी. पहले यह कांड भारत की राजधानी दिल्ली में घटित हुआ तो अब पश्चिमी बंगाल तक पहुंच गया तो कुछ इस तरह की घटनाएं ऐसी भी सामने आती है जिनकी मीडिया में चर्चा तक नहीं होती चाहे वो बाराबंकी में पति द्वारा दहकती रॉड को प्राइवेट पार्ट में डालने का मामला हो या बिहार की राजधानी पटना में युवक द्वारा रेप में नाकाम रहने पर प्राइवेट पार्ट में लोहे की रॉड डाल देना हो. ऐसी न जाने कितनी घटनाएं हैं जिनमें क्रूरता की हद पार कर दी गयी है.

पश्चिमी बंगाल की उस युवती को मानसिक विक्षिप्त बताया जा रहा है जो आदिवासी समुदाय से आती है. इस तरह की घटनाओं में कस्बों, गांवो में रहने वाली आदिवासी और अनुसूचित जाति की महिलाएं ही दबंगो का शिकार बनती हैं और ऐसा लगातर चल रहा है क्योंकि अक्सर आसान सा शिकार लगने वाली महिलाएं गरीब, पिछड़े व वंचित समुदाय से आती हैं वहीं पश्चिमी बंगाल, झारखंड, बिहार, उड़ीसा जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में आदिवासी महिलाओं की स्थिति पहले से ही कमजोर रही है फिर उसके बाद गैंग रेप, प्राइवेट पार्ट में रोड डालने जैसी घटनाएं रोंगटे खड़े कर देती हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार में भी बहुजन समाज को लगातार निशाना बनाया जा रहा है जिनमें बलात्कार की घटनाएं कभी खेत में मजदूरी करती महिला के साथ होती है तो कभी शौच को जाती महिलाओं के साथ. अनुसूचित जाति- जनजाति की महिलाओं के साथ ये अत्याचार लम्बे समय से चल रहे हैं जिसकी खबरें एक दिन तो मीडिया में दिख जाती है पर उसके बाद उस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता.

भारत को 33 करोड़ देवी-देवताओं वाला देश बताया जाता है जहाँ संस्कार, संस्कृति को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है पर इसी देश में हर घण्टे में 22 बलात्कार की घटनाएं सामने आती है जिनमें कुंठा और गुस्सा दिखता है जिसका परिणाम प्राइवेट पार्ट को क्षतिग्रस्त करने तक के रूप में सामने आ रहे हैं तो आखिर इसका हल किया है क्या !

हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि बढ़ते बलात्कार के मामलों पर हमारा तन्त्र पूरी तरह से बेपरवाह है. सरकार के तीनों अंगों व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एंव न्यायपालिका की तरफ से संज्ञान तो लिया जाता है लेकिन इसके बावजूद भी अभी तक कोई ठोस उपाय नहीं तलाशा जा सका है. ये मुद्दे सरकार के लिए बेहद सोचनीय हैं, जिसके लिए गंभीरता जल्द दिखानी होगी. इस देश में बलात्कार को रोकने के लिए जागरूकता और अच्छी शिक्षा जरूरी है, जिससे इन भयानक कृत्यों पर रोक लग सके.

एक बात यह भी है कि बढ़ते बलात्कारों के वारदातों पर सजग होकर केवल कानून एंव प्रशासन को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता. इस समस्या के प्रति खुद गंभीर होकर समाज मे जागरूकता पर बल देना ही होगा. समाज का आम नागरिक जब तक इन घृणित अपराध से खुद को नहीं जोड़ेगा, दर्द महसूस नहीं करेगा तब तक यह घटनाएं महज कानूनी मामले बनकर कोर्ट और फाइलों में ही घूमते रह जाएंगे और बलात्कारियों के हौसले दिन-वे-दिन बुलंद होते रहेंगे जिसके परिणाम भविष्य में और अधिक भयावह हो सकते हैं.

(लेखक के अपने विचार हैं)

 

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