राहुल गांधी के इस्तिफे से मझधार में कांग्रेस ?

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राहुल गांधी अब कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं.ये आपको सुनकर अचरज सा लगता होगा.आप खुद सोच रहे होगें कि आखिर कांग्रेस परिवार वादी राजनीति छोड़ कैसे रहे हैं…इस खबर को हम आपको विस्तार से और आसान भाषा में बताएगें.लेकिन उससे पहले एक नजर राहुल गांधी के पार्टी में किये काम पर । राहुल गांधी ने बुधवार को चार पन्नों की चिट्ठी सार्वजनिक करते हुए यह साफ़ कर दिया कि वो अब कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं। इससे अब तक अख़बारों और समाचार चैनलों पर जो बातें सूत्रों के हवाले से चल रही थीं।उसकी पुष्टि हो गई कि राहुल गांधी ने इस्तीफ़ा दे दिया है।और वो उसे वापस न लेने पर अडिग हैं।

राहुल गांधी ने अपना इस्तीफ़ा सार्वजनिक इसलिए किया क्योंकि यह फ़लसफ़ा ख़त्म ही नहीं हो रहा था। लेकिन कांग्रेस का संविधान यह कहता है कि ऐसी स्थिति में कांग्रेस का सबसे वरिष्ठ महासचिव अस्थायी तौर पर अध्यक्ष का काम संभाल लेते है। कांग्रेस में मोतीलाल वोहरा सबसे वरिष्ठ महासचिव हैं। कयास ये भी लगाए जा रहे हैं कि वो जल्द ही पार्टी कार्यसमिति की बैठक बुलाकर और उसमें ये तय हो सकता हैं कि पार्टी का अगला क़दम क्या होगा. माना ये भी जा रहा हैं कि क्या प्रियंकागांधी को पार्टी में ये जगह मिल पाएगी या फिर कांग्रेस परिवार वाद की राजनीतिक छोड़ देगी. बहुत से लोग मानते हैं। और मेरी व्यक्तिगत राय भी यही है कि जब उन्होंने पार्टी छोड़ने का मन बना लिया था.तो उनका यह दायित्व भी था कि वो अपना पद तब छोड़ते,जब उनका उत्तराधिकारी मनोनीत हो जाता। भले ही वो उस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका न निभाते लेकिन कम से कम एक उत्प्रेरक की तरह वो प्रक्रिया शुरू कराते। और उसे अंजाम तक पहुंचाते।

लेकिन वस्तुस्थिति अब ये है कि नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य नए नेतृत्व के चुनाव में सक्रिय भूमिका नहीं निभाएगा. ऐसे में इस बात की क्या गारंटी है.कि नया नेतृत्व सर्वसम्मति से चुना जाएगा. और पार्टी को एकजुट रख पाएगा?. बात यही खत्म नहीं होती हैं.राहुल गांधी को जनता प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं. ये सच हैं । क्या उसे मानते भी ये सवाल हैं ? राहुल को सब सुनते हैं.ये सच हैं.क्या उसे मानते भी हैं ये सवाल हैं. राहुल गांधी को युवाओं साथ देते हैं ये सच हैं। क्या उसे पार्टी के जिम्मेंदार के तौर पर मानते भी हैं.ये बड़ा सवाल है। और इसका जवाब राहुल गांधी को देना चाहिए था. राजनीति में हार और जीत लगी रहती है। हार का दायित्व भी नेतागण लेते हैं। लेकिन उसमें भी एक शिष्टता और विवेक होना चाहिए। जो इस तरह पद छोड़ जाने में नहीं है। अगर यह मान लिया जाए कि राहुल को मनाने की कोशिशें नाकाम रहेंगी। तो यह तय है कि अध्यक्ष के तौर पर उनका संक्षिप्त कार्यकाल ख़त्म हो गया है। यह बात तो माननी पड़ेगी कि उनकी अगुवाई में पार्टी हाल ही में तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव जीती। साथ ही यह भी याद रखना पड़ेगा कि 2019 लोकसभा चुनावों में पार्टी की बड़ी हार हुई।लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार के दो-तीन बड़े कारण थे.।

उनमें से एक यह भी था कि बीजेपी ने बालाकोट प्रकरण के बाद नैरेटिव अपने पक्ष में कर लिया…वहीं कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर जो सवाल उठाए गए, वो जनता-जनार्दन के गले से नहीं उतरे। यह बात राहुल को ख़ुद सोचनी चाहिए था. क्या इसमें उनकी चूक नहीं है? जो उस वक़्त पार्टी का नैरेटिव बना था,बहरहाल उसे बनाने में मुख्य योगदान तो पार्टी अध्यक्ष का ही होता है.उन्होंने अपनी ग़लती मानी है.और त्यागपत्र दिया है। लेकिन पद छोड़ने से पहले उन्हें पार्टी को ऐसी जगह स्थापित करना चाहिए था.जहां पार्टी के पास एक नेता होता और रोज़मर्ऱा का काम जारी रहता.और एक नए उद्देश्य से पार्टी आगे बढ़ती।लेकिन किसी बदलाव की प्रक्रिया को शुरू किए बिना बीच में छोड़कर चले गए। मैं क्या पूरी दुनिया समझती  हैं कि यह पार्टी के हित में नहीं है.और आने वाले कुछ महीनों में पार्टी को चुनावों का सामना करना है.हालांकि इस बात से मेरी सहमति नहीं है। कि राहुल गांधी के साथ एक नाकाम कांग्रेस अध्यक्ष की तख़्ती लगा देनी चाहिए। राजनीति में वक़्त बदलता है। कभी कभी बहुत जल्द और कभी कभी इसके पीछे एक लंबी जद्दोजहद होती है. कभी किसी नेता को नगण्य नहीं मानना चाहिए. कई बार एक झटके में बदलाव होते हैं और हमने इतिहास में ऐसा कई बार देखा है…

ये लेखक के अपने विचार हैं । लेखक स्वतंत्र पत्रकार और खुद टिप्पणीकार हैं।

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