बेगुसराय में सीपीआई की प्रति क्रांति चल रही है…

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Published by- Aqil Raza
By- संजीव चन्दन   ~

बेगुसराय से सीपीआई के कैडर होते थे भोला सिंह, जिनकी जाति-यात्रा राजनीतिक यात्रा में तब्दील होते हुए आखिरी तौर पर भाजपा तक पहुंची। उनका पांव छूने भूमिहार-बलकरण कन्हैया पहुंचा ही था। यह ऐतिहासिक दृश्य रहा ब्रह्मो-कम्युनिस्ट आन्दोलन का। उन्ही भोला सिंह के ऊपर मुसहर जाति से आने वाली सांसद और तत्कालीन विधायक भागवती देवी का एक भाषण पढा जाने लायक है। (कोशिश होगी स्त्रीकाल में उसे पढवाये) समझ में आयेगा कि जहां भी जायें जाति हड्डी तक धंसी हुई ले जाते हैं परशुराम के वंशज लोग।

कन्हैया कुमार में इसी ऐश्वर्य को देखने वाला ब्रह्मो-कम्युनिस्ट समुदाय आज हाय-हाय कर रहा है। आय हाय यह तो क्रांति ही रुक गयी। चक्का ही थम गया।

भारत के कम्युनिस्ट दरअसल एक विचित्र मायालोक में जीते हैं। एक कहानी सुना था अपने एक विचारक से कि कैसे वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भाजपा की हार के बाद भाषण दिया था उसी पाटलिपुत्र में, जहां कम्युनिस्ट अंधकार छाया है आज, कि ‘धार्मिक फासीवादियों का रथ रुक गया है और अब जातिवादी फासीवादियों का रथ रोकना है।’ यह बात अलग है कि धार्मिक फासीवादियों का रथ किसी ने रोका था तो वह ब्रह्मो-वाम-बुद्धिजीवियों की नजर मे दिखने वाले ‘जातिवादी फासीवादी’ ही थे-यही क्लासिक समझ है ब्रह्मो वामपंथियों की कि वास्तविक बदलाव में वे जातिवाद की तलाश करते फिरते हैं।

सीपीआई के सवर्ण नेतृत्व के लोग अपने सभी सवर्ण उम्मीदवारों के कन्धे पर वाम क्रांति का ख्वाब रचते हैं, उनकी क्रांति वहां भी थम जाती है जहां से किसी महिला का वास्तविक आँचल शुरू होता है। नारों में तो आँचल का परचम वे खूब बनवाते रहे हैं। बिहार जैसे राज्य में एक महिला उम्मीदवार भी नहीं मिलती भारत के सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी को। इस बार भी ‘बुर्जुआ’ पार्टियां ही महिला उम्मीदवारों को टिकट देने में आगे हो रही हैं देश भर में। बाजी मार ले गयी है बीजद और तृणमूल कांग्रेस।

कन्हैया को राष्ट्रीय नेता मानने वाला सीपीआई का सवर्ण चेतन-अचेतन आज दुखी है, जबकि समझ में नहीं आता कि मोदी-माया का प्रत्युत्पाद और टीवी स्क्रीन का उत्पाद उनका नेता किन कारणों से राष्ट्रीय हो गया? परिस्थितियों का सटीक आकलन करने का अकादमिक अभ्यास रखने वाले ब्रह्मो-वामी क्या यह नहीं समझते कि मोदी-विरोधियों के प्रतिरोध का स्क्रीन-आश्रय भर रहा कन्हैया।

ये ज्ञानी यह भी नहीं समझ पाते कि मल्लाहों के बीच काम करने वाला नेतृत्व हो या मुसहरों के बीच काम करने वाला यदि वह जगह पाता है तो यह क्रांति है और भूमिहार, ब्राह्मण राजपूत अस्मिता के बीच से उभरने वाले को तरजीह दी जाती है तो वह प्रतिक्रांति है। खासकर तब जब वह समान जाति-आधार से ताकत पा रहा हो। इनकी कलई खुल जाती है तब जब पिछले दो चुनावों से लगभग डेढ़ लाख वोट पाने वाला समूह एक भूमिहार बलकरण को साढ़े तीन लाख वोट पाने वाले अल्पसंख्यक नेता पर तरजीह देने को कहता है-इनका सेकुलरिज्म भी तब इन्हें ठहरकर विचार करने को नहीं प्रेरित करता है।

पूरा सीपीआई का सवर्ण स्फीयर आज व्यथित है। यह व्यथा इन्हें तब नहीं सताती जब ये एकमत होने के नाम पर एक बीमार कॉमरेड को चार बार महासिचव चुनकर चले आते हैं, एक दलित नेता का महासचिव न होना उन्हें सामान्य लगता है। और एक बलकरण जो किसी भी मोर्चे पर खुद को सिद्ध नहीं कर सका है उन्हें भावी क्रांति का अपरिहार्य नेता लगता है। और तो और एक महिला पत्रकार को जाति के सवाल पर उसके जेंडर को टारगेट कर कन्हैया द्वारा दिये गये जवाब में भी कुछ असामान्य नहीं दिखता इन्हें। इसलिए कि बच्चा तो अपना ही है, तो क्या हुआ थोड़ा-बहुत भटक ही जाता है तो।

~ संजीव चंदन 

 

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