सरस्वती को आराध्य देवी न मानने के चलते बहुजन प्राचार्य को जेल, क्या है, सरस्वती का सच ?

‘ज्ञान की देवी सरस्वती’ को शूद्रों-अतिशूद्रों और स्त्रियों से घृणा और सवर्ण पुरूषों से ही प्रेम करती थीं।

0
Want create site? With Free visual composer you can do it easy.

By- Sidharth ~

फुले और आंबेडकर ‘रिडल्स ऑफ हिंदुज्म’ में भी सरस्वती को देवी मानने से इंकार करते हैं और उनके बहुजन विरोधी चरित्र को उजागर करते हैं। क्या शूद्रों-अतिशूद्रों को सरस्वती से मुक्ति पा, सावित्रीबाई फुले को नहीं अपनाना

क्या प्राचार्य डॉ. एस.एस. गौतम ने सरस्वती को देवी मानने से इंकार करके कुछ गलत किया। ऐसा करके उन्होंने क्या फुले-पेरियार और डॉ. आंबेडकर के विचारों का ही पालन नहीं किया है?

आज के इंडियन एक्सप्रेस की सूचना के अनुसार मध्य प्रदेश के दतिया जिले के राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य को सरस्वती का अपमान करने के आरोप में 15 दिनों के लिए जेल भेज दिया गया है। उनके साथ एक अन्य प्रोफेसर पर सरस्वती संबंधी विडियों प्रसारित करने का आरोप लगाया गया है। कहा जा रहा है कि प्राचार्य डॉ. एस. एस. गौतम ने सरस्वती पर कुछ टिप्पणी की। जिसका वीडियो बनाकर प्रसारित किया गया। इसके अलावा उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने विभाग से सरस्वती की तस्वीर हटा दी। इस विषय में प्राचार्य डॉ. एस.एस. गौतम का कहना है कि कॉलेज में गांधी और आंबेडकर का फोटो लगाने के अलावा किसी का फोटो लगाने का कोई नियम नहीं है।

क्या यह सच नहीं है कि ‘ज्ञान की देवी सरस्वती’ को शूद्रों-अतिशूद्रों और स्त्रियों से घृणा और सवर्ण पुरूषों से ही प्रेम करती थीं। द्विजों की ज्ञान परंपरा में सरस्वती ज्ञान और शिक्षा की देवी हैं। वे ब्रह्मा की मानसपुत्री हैं जो विद्या की अधिष्ठात्री देवी मानी गई हैं। इनका नामांतर ‘शतरूपा’ भी है। इसके अन्य पर्याय हैं, वाणी, वाग्देवी, भारती, शारदा, वागेश्वरी इत्यादि। ये शुक्लवर्ण, श्वेत वस्त्रधारिणी, वीणावादनतत्परा तथा श्वेतपद्मासना कही गई हैं। कहा जाता है कि इनकी उपासना करने से मूर्ख भी विद्वान् बन सकता है। माघ शुक्ल पंचमी को इनकी पूजा की परिपाटी चली आ रही है। देवी भागवत के अनुसार ये ब्रह्मा की पत्नी हैं।सरस्वती को अन्य नामों में शारदा, शतरूपा, वीणावादिनी, वीणापाणि, वाग्देवी, वागेश्वरी, भारती आदि कई नामों से जाना जाता है।

आज भी वे भारतीय शिक्षा संस्थानों में ज्ञान और शिक्षा की देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं, हर शिक्षक और विद्यार्थी से यह उम्मीद की जाती है, वह उनकी आराधना और पूजा करे। प्रश्न यह उठता है कि जिस देवी की महानता, ज्ञान, करूणा और कृपा हिंदू धर्मशास्त्रों , महाकाव्यों, ऋषियों, साहित्यकारों, शास्त्रीय संगीतकारों आदि ने इतनी भूरी-भूरी प्रशंसा किया है, जिनका गुणगान करने के लिए कितने श्लोक, गीत और कविताएं लिखी गई हैं, उस देवी की कृपा शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं पर क्यों नहीं होती थी? क्यों वे इन तबकों के पास नहीं आती थीं,क्यों ये देवी सवर्ण पुरूषों की जीभ पर तो वास करती थीं, लेकिन इन तबकों की जीभ से वे इतनी नफरत क्यों करती थीं? क्यों हजारों वर्षों तक ये तबके अशिक्षित रहे?

क्यों अंग्रेंजों के आने के बाद ही शिक्षा का दरवाजा इन तबकों के लिए खुला? क्या सरस्वती भी वर्ण व्यवस्था में विश्वास करती थीं? क्या वे भी स्मृतियों के इस आदेश का पालन करती थीं कि,

‘स्त्रीशूद्रौ नाधीयाताम्’ यानी स्त्री तथा शूद्र अध्ययन न करें।

इसका कारण यह तो नहीं था कि वे उस ब्रह्मा की मानस पुत्री या कुछ हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार पत्नी है, जिन्होंने वर्ण व्यवस्था की रचना की है। एक स्त्री होते हुए भी उन्हें स्त्रियों से इतनी घृणा क्यों थी? क्या वे इस हिंदू शास्त्रों की इस आदेश का पालन करती थीं कि .’पतिरेको गुरु: स्त्रीणाम्’ यानी पति ही एकमात्र स्त्रियों का गुरू होता है। यानी उसे अलग से शिक्षा लेने की कोई जरूरत नहीं है।

भले ही सरस्वती की प्रशंसा में श्लोक लिखे गए हों, महाकवि निराला ने उनकी गुणगान करते हुए ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे’ जैसी कविता लिखी हो, लेकिन सच यह है कि सरस्वती पूरी तरह वर्ण व्यवस्था की रक्षा करती रही हैं और शूद्रों-अतिशूद्रों और स्त्रियों के अशिक्षित बनाये रखने की योजना में शामिल रही हैं। अकारण तो नहीं है कि ज्ञान और शिक्षा की देवी के रूप में सरस्वती का गुणगान करने वाले अधिकांश व्यक्तित्व सवर्ण पुरूष ही थे। शायद ही किसी दलित-बहुजन रचनाकार ने सरस्वती को ज्ञान या शिक्षा की देवी मानते हुए कोई गीत या कविता लिखी हो।

क्या समय नहीं आ गया है कि सरस्वती को शिक्षा संस्थानों से बाहर कर उनकी जगह ज्ञान और शिक्षा के प्रेरणास्रोत के रूप में सावित्री बाई फुले(3 जनवरी 1831-10 मार्च 1897) को स्थापित किया जाय। जिन्होंने 1848 में शू्द्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए पहला स्कूल खोला था।

भारत के वामपंथी प्रगतिशीलों के एक हिस्से का भी सरस्वती से लगाव रहा है, वे तरह-तरह उनके पक्ष में तर्क देते रहे हैं। लेकिन सचेत दलित-बहुजनों ने सरस्वती को सवर्ण पुरूषों पर ही कृपा करने वाली देवी के रूप में ही देखा है। इस पूरे प्रसंग में मैं अपने शिक्षक प्रोफेसर जनार्दन जी को नहीं भूल सकता। प्रोफेसर जनार्दन जब गोरखपुर विश्विद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष हुए, तो उन्होंने विभागाध्यक्ष के अपने कमरे से सरस्वती की प्रतिमा को बाहर निकलवा दिया। पूरे विश्वविद्यालय में हड़कंप मच गया। उन्होंने कहा मुझे पढ़ने और विभागाध्यक्ष होने का अवसर सरस्वती की कृपा से नहीं, संविधान से मिला है। मेरे कमरे उस सरस्वती के लिए कोई जगह नहीं, जिनकी कृपा केवल उच्च जातियों पर होती है।

सबके लिए शिक्षा और ज्ञान के समर्थक हर व्यक्ति को सरस्वती से मुक्ति पा लेनी चाहिेए और ज्ञान एवं शिक्षा के प्रेरणास्रोत के रूप में सावित्री बाई फुले को अपनाना चाहिए।

~ सिद्धार्थ
हिंदी संपादक, फोरवर्ड प्रेस

Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

शयद आपको भी ये अच्छा लगे लेखक की ओर से अधिक