क्यों जहरीले तीर की तरह सर्वणों के दिलों में चुभते हैं, डॉ. आंबेडकर!

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By- सिद्धार्थ

सहारनपुर से सटे गांव बादशाहपुर पिंजोरा में आंबेडकर की मूर्ति तोड़ दी गई है। बहुजनों में गहरा आक्रोश है। गांव में पीएसी तैनात कर दी गई। इस देश में सबसे ज्यादा यदि किसी व्यक्ति से सवर्ण नफरत करते हैं तो वह आंबेडकर हैं और सबसे ज्यादा किसी की मूर्ति तोड़ी जाती हैं, तो वह भी आंबेडकर की। आखिर सवर्णों को डॉ. आंबेडकर जहरीले तीर की तरह चुभते क्यों हैं? इसके निम्न कारण हैं-

 

● पहला सवर्णों का यह मानना है कि डॉ. आंबेडकर की आरक्षण की व्यवस्था के चलते उनके बेटों -बेटियों के करीब 50 प्रतिशत नौकरियों का हिस्सा एससी-एसटी और ओबीसी ने छीन लिया। जिसके चलते उनके बेटे-बेटी बेरोजगार हैं और ‘अयोग्य आरक्षण’ वाले नौकरी पा गए हैं। जबकि यह हकीकत यह है कि आरक्षण लागू होने के बावजूद नौकरियों में सबसे ज्यादा सवर्ण ही हैं!

 

● इसी आरक्षण के चलते लोकसभा और विधानसभाओं की 22-23 प्रतिशत सीटों पर उन्हें ऐसे एसटी-एसटी को वोट देना पड़ता है और जिताना पड़ता है। जिन्हें वे वोट देना या जिताना पसंद नहीं करते।

 

● इन दोनों तरह के आरक्षण का परिणाम के चलते सवर्णों के साथ ऐसे लोग बराबरी के आधार पर बैठते हैं, बात करते हैं और कभी-कभी उनके बॉस होते हैं, जिन्हें वे अपने पांव की धूल समझते रहे या समझते हैं। ये वे लोग है, जो कल तक उनके हरवाहे-चरवाहे थे। आज भी इन समुदायों के बहुत सारे लोग उनके खेतों में काम करते हैं। जबकि बहुजन समाज का कोई भी व्यक्ति चाहे कितना भी उच्चपद पर हो लेकिन वो कभी सवर्णों पर अत्याचार नहीं करता है!

 

● तीसरी बात यह है कि जिस हिंदू धर्म पर सवर्ण इतना गर्व करते हैं डॉ. आंबेडकर वर्ण-जाति के विनाश के लिए उस हिंदू धर्म के विनाश की बात करते हैं और उन सभी हिंदू धर्मशास्त्रों को बारूद से उड़ा देने की बात करते हैं, जो किसी भी तरह से वर्ण-जाति व्यवस्था का समर्थन करते हैं।

 

● जिन हिंदू धर्मग्रंथों को सवर्ण महान ग्रंथ मानते हैं। उन सभी धर्मग्रंथों से डॉ. आंबेडकर तीखी नफरत करते हैं और उन्हें जलाने लायक मानते है। इन धर्मग्रंथों में वेदों, पुराणों, स्मृतियों के साथ गीता शामिल है। जिसे सवर्ण राष्टीय ग्रंथ बनाने की चाह रहते हैं। डॉ. आंबेडकर गीता को प्रतिक्रांति का दर्शन कहते हैं, दो बौद्ध धर्म को पराजित करने और वर्ण-व्यवस्था का समर्थन करने के लिए लिखी गई थी। मनुस्मृति को स्वयं उन्होंने अपने हाथों से जलाया था।

 

● सवर्णों को जो नायक सबसे प्रिय है। जिन्हें वे ईश्वर का दर्जा देते हैं या नायक-महानायक कहते हैं। उन ईश्वरों और नायकों- महानायकों की असली सच्चाई को डॉ. आंबेडकर ने उजागर कर दिया। उनके असली चेहरे को बेनकाब कर दिया। उन्हें ईश्वर या नायक मानने से पूरी तरह इंकार कर दिया। इन नायकों में ब्राह्मा, विष्णु और महेश भी शामिल हैं। इन्हें तो डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब रिडल्स ऑफ हिंदुज्म में बलात्कारी तक कहा है। डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,15 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं थी जिनमें तीन निम्न है-

 

1-मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा

2-मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, उनमें कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा

● सवर्णों का मानना है कि हिंदू कोड़ बिल पेश करके डॉ. आंबेडकर ने हिंदू जाति व्यवस्था और परिवार व्यवस्था पर कुठाराघात किया। उन्होंने इसमें यह व्यवस्था कर दी कि किसी जाति के लड़के-लड़की आपस में शादी कर सकते है। वह भी बिना अपने माता-पिता की इजाजत के। इसका मतलब हुआ कि सवर्णों की लड़कियां भी बहुजनों के लड़कों से शादी कर सकते हैं, जो हो भी रहा है। हम सभी जानते हैं कि सवर्णों और उनके संगठनों ने इस बिल का कितना विरोध किया था। जिसमें प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से लेकर आरएसएस तक शामिल थे।

 

● संविधान को सवर्ण पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाते हैं, उनको लगता है कि इस संविधान जो भी ऐसी व्यवस्था है, जो उनके खिलाफ है। उसके जिम्मेदार डॉ. आंबेडकर हैं।

 

हालांकि सच यह कि डॉ. आंबेडकर किसी भी समुदाय विशेष के खिलाफ नहीं थे। उन्होंने जाति का विनाश किताब में साफ शब्दों में कहा कि उनका आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित होगा। वे हर उस चीज के खिलाफ थे, जो स्वतंत्रता, समता और भाईचारे के मार्ग में अवरोध हो और उस चीज के पक्ष में खड़े थे, जिससे स्वतंत्रता, समता और भाईचारे की स्थापना होती हो। वे पूरी तरह से वर्ण-जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के खिलाफ थे। इसके लिए ब्राह्मणवाद को जिम्मेदार मानते थे। वे आजीवन ब्राह्मणवाद के विनाश के लिए संघर्ष करते रहे।

 

लेखक-सिद्धार्थ, हिंदी संपादक, फॉरवर्ड प्रेस

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