گھر رائے کیا شکشا متروں نے مجھے ایم پی منتخب کیا ہے؟? منتخب ایم ایل اے? آپ ان سے کیوں نہیں پوچھتے جنہیں آپ نے پہلے منتخب کیا ہے؟?- رنجیدہ کمار
رائے - سماجی - اگست 3, 2017

کیا شکشا متروں نے مجھے ایم پی منتخب کیا ہے؟? منتخب ایم ایل اے? آپ ان سے کیوں نہیں پوچھتے جنہیں آپ نے پہلے منتخب کیا ہے؟?- رنجیدہ کمار

شکشا متروں کے خلاف سپریم کورٹ کے فیصلے کے بعد اتر پردیش میں حکومت کے خلاف مظاہرے ہو رہے ہیں۔. جس کو لے کر شکشا مترا مختلف طریقوں سے اپنے احتجاج کا اظہار کر رہے ہیں۔. کچھ شکشا متروں نے اپنا مسئلہ این ڈی ٹی وی کے سینئر صحافی رویش کمار کو بتایا، جس کے جواب میں رویش کمار نے فیس بک پر شکشا متروں کو جواب دیتے ہوئے ایک پوسٹ لکھی ہے۔ رویش کمار کی پوسٹ پڑھیں۔-

’’یوپی کے اساتذہ کے دوستو، میری بھی سنو۔-
صبح سے ہی یوپی کے شکشا متروں نے میرے فون پر چھاپہ مارا ہے۔ میرے پاس ایک طریقہ ہے۔ جب مہم چلا کر دباؤ ڈالنے کی کوشش کی جاتی ہے تو میں دو تین ماہ ٹھہرتا ہوں۔ کہانی نہیں کرتا۔ میں آپ کے درد اور تکلیف کو سمجھتا ہوں۔ کچھ ساتھیوں کی خودکشی کی دل دہلا دینے والی خبریں دیکھی ہیں۔ میں بھی مشغول ہوں۔ میں بھی کچھ کرنے کا سوچ رہا تھا۔ میں اکیلا آدمی ہوں اور اس موضوع کو پڑھنے اور سمجھنے میں اہلیت کے معیار جیسے خبر کی آخری تاریخ ختم ہو جاتی ہے، تب بھی میرے ذہن میں یہ بات تھی۔

बात ये है कि किस हक से फोन पर धावा बोला गया? کیا شکشا متروں نے مجھے ایم پی منتخب کیا ہے؟? منتخب ایم ایل اے? जिनको चुना है उनसे क्यों नहीं पूछते पहले। मैंने तो नहीं देखा इनमें से कभी किसी को मेरे लिए बोलते हुए। बल्कि ज़्यादातर गाली ही देते होंगे या जब गालियों से मुझे धमका कर चुप कराया जा रहा था तब चुप रहते होंगे। इस तरह से आप जनता ने ही पहले इस लोकतंत्र को कमज़ोर किया। सरकार से पूछने पर जब आप मुझे कमज़ोर करेंगे तो जब आप सरकार से पूछेंगे तो आपको कोई कमजोर कैसे नहीं करेगा।

पूरा जीवन लगाकर मैं यही कहता रहा कि सरकार चुनने के बाद मतदाता बन जाइये। किसी चिरकुट का फैन मत बनिये। न पत्रकार का न नेता का। आप किसी नेता का फैन बनकर खुद का विलय सरकार और विचारधारा में करेंगे तो जनता नहीं रह जाएंगे। आपका जनता के रूप में सरकार पर प्रभाव और दबाव ख़त्म हो जाता है। जैसे ही आप सरकार के समक्ष खड़े होंगे, आपको अल्पसंख्यक बना दिया जाएगा। अल्पसंख्यक होना धर्म से मुसलमान या सिख होना नहीं है। यह प्रक्रिया है उस आवाज़ को कुचलने की, जो अपनी मांग को लेकर सरकार के सामने खड़ी होती है।

बार-बार कहा मगर आप या आप जैसे लोग नहीं माने। गाय बकरी को लेकर जनता तेज़ी से जनता होने की अपनी पहचान छोड़ कर पार्टी विचारधारा में समाहित होती चली गई। जनता अल्पसंख्यक बनती चली गई । इसी के लिए अब विचारधारा की सरकार का मॉडल चलाया जा रहा है। पार्टी और सरकार की विचारधारा एक हो गई है।

इस मॉडल में जनता के पास विचारधारा से अलग होने का अवसर नहीं रहता। गुजरात में जब पटेल समाज को पुलिस ने पीटा तो बाकी जनता इसलिए चुप रही कि विचारधारा की सरकार कमज़ोर न हो जाए। पटेल के पैसे और समर्थन से भाजपा ने राज ज़रूर किया मगर वे पुलिस से इसलिए पीट गए क्योंकि वे जनता नहीं रहे। वो पीटने के बाद भी विचारधारा में ही रहेंगे। जैसे ही आप मेजारिटी की ताकत कायम करते हैं, माइनॉरिटी बन जाते हैं।

इसलिए सूरत के कपड़ा व्यापारियों का आंदोलन बड़ी संख्या के बाद भी संघर्ष का मनोरंजन बन गया और बेअसर रहा। वो विरोध की जगह भजन करने लगे। सविनय अवज्ञा की जगह अनुनय-विनय करने लगे। आप समझते हैं कि हिंदू हिंदुत्व के लिए गोलबंद हो रहे हैं लेकिन असलीयत में आप जनता होने की पहचान खो रहे हैं।

जब जनता अपनी हैसियत खो देती है तो सरकार को अथॉरिटेरियन बनने की छूट मिल जाती है। सेवक सेवक बोल कर सरकार मास्टर हो जाती है। पिछले तमाम आंदोलन और आवाज़ की यही हालत हुई है। सूरत के कपड़ा व्यापारी हों या मंदसौर के किसान या यूपी के शिक्षा मित्र। सब लड़कर थक गए मगर मिला कुछ नहीं।
मेरे पास कोई सीएमओ पीएमओ नहीं है।

अकेले ही आपके फोन उठाता हूँ, रोज़ बीस पत्रों के जवाब देता हूं और इतने ही पत्र पढ़ता हूँ। गोदी मीडिया का विज्ञापन भकोस कर आपने मुझे और सवाल पूछने की पंरपरा को कमज़ोर होने दिया। जब आपकी बारी आई तो कोई मीडिया आपके लिए नहीं है। यह कैसा समाज है कि लोग मुझ पर हंस रहे हैं कि अब तुम्हारी नौकरी चली जाएगी? आप क्यों तब चुप रहते हैं ?

मैं आपके मसले को समझने में लगा हूँ । मैं ही उम्मीद हूँ, कहकर मेरा भावनात्मक शोषण न करें । मुझे आपकी पीड़ा का अहसास है। जो बात कह रहा हूँ पहले समझिये। अगर आप वाक़ई एक लाख हैं तो सड़क पर आकर दिखाइये। लड़िए। हिन्दू मुस्लिम टापिक पर लड़ लड़ कर आपने समाज को पगला दिया है, उसे ठीक कीजिए। मुझे फोन करने से कुछ नहीं होगा।”

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