नीतीश को अब एनडीए के साथ ‘मियाऊँ’ बनकर रहना होगा

26 जुलाई 2017 से अभी तक दहाड़ने वाला नीतीश खामोश है उसकी सिर्फ इतनी सी आवाज़ निकलती है कि मोदी ग्रेट हैं…मोदी महान हैं और 2019 में फिर पीएम बनेंगे. क्या दूसरी बार एनडीए का हिस्सा बने नीतीश की पहले जैसी ‘दहाड़’ सुनाई देगी या फिर ‘मियाऊँ’ बनकर रह जाएंगे. वह 17 साल एनडीए का हिस्सा रहे. 2013 में उससे अलग होने के बाद 26 जुलाई 2017 को एक बार फिर से एनडीए में शामिल हो गए. सियासी पंडितों का मानना है कि अब ऐसा नहीं होगा क्यूंकि ये वो एनडीए नहीं जिसमें भाजपा मजबूर और बेबस थी.आज पूरी ताक़त के साथ भाजपा सत्ता में है इसलिए नीतीश कुमार की शख्सियत उसके सामने कुछ भी नहीं है. और वैसे भी भाजपा का असल मकसद किसी भी तरह उस महागठबंधन के प्रयोग को तोड़ना था जो 2019 के मद्देनजर राष्ट्रीय स्तर पर आकार लेने की संभावना में दिख रहा था, दूसरी वजह नीतीश कुमार की शक्ल में उस चेहरे को भी खत्म करना था जो प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के लिए चुनौती बन सकता था.
नीतीश कुमार को अब वैसा दबदबा हो हासिल करना मुश्किल है. भाजपा अब 1996-2013 वाली नहीं रही.ये अलग बात है कि 2015 में वह बिहार विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पाई थी लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी ऐसे स्थान पर जा पहुंची है, जहां उसे राज्यों में जीत हासिल करने को पराए नाम या चेहरे की अब जरूरत नहीं है. 1996 से 2013 के मध्य में भाजपा के लिए नीतीश कुमार मजबूरी थे. उसकी मजबूरी को इस बात से समझा जा सकता था कि नीतीश ने 2010 के विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में एनडीए का हिस्सा होते हुए भी मोदी को शामिल करने से मना कर दिया था लेकिन अब 2017 में भाजपा नीतीश के लिए मजबूरी है.यह सवाल हो सकता है कि अगर नीतीश भाजपा के लिए मजबूरी नहीं हैं तो भाजपा ने उन्हें समर्थन देने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई.
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Maulana Abul Kalam Azad, also known as Maulana Azad, was an eminent Indian scholar, freedo…






