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Social - State - September 5, 2017

शिक्षक दिवस: जानिए कैसे स्कूल की दहलीज तक पहुंची महिलाएं ?

शिक्षक दिवस के अवसर पर दायित्व है एक ऐसी महानायिका को याद करने का जिन्होंने अपने साहस के बल पर आधी आवादी की तकदीर बदल डाली। जिनके जज्बे की बदौलत आज देश की लड़कियां किसी लड़के से कम नहीं है, चाहे वो कोई भी क्षेत्र हो, कदम से कदम मिलाकर चलने का हौसला दिया माता सावित्री बाई फुले ने।

 

देश की पहली शिक्षिका, मराठी कवियत्री माता सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव नामक गांव में हुआ था। 9 साल की उम्र में उनकी शादी पूना के ज्योतिबा फुले के साथ हो गई। विवाह के समय सावित्री बाई फुले की कोई स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी।

एक बार सावित्री अंग्रेजी की एक किताब के पन्ने पलट रही थी, तभी उनके पिताजी ने यह देख लिया और फौरन किताब को छीनकर बाहर फैंक दिया, क्योंकि उस समय शिक्षा का हक केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही था, दलित औऱ महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करना पाप था।

 

सावित्रीबाई फुले एक दलित परिवार से थी, जब ज्योतिबा फुले ने उनसे शादी की तो ऊंची जाति के लोगों ने विवाह संस्कार के समय उनका अपमान किया तब ज्योतिबा फुले ने दलित वर्ग को गरिमा दिलाने का प्रण लिया.

वह मानते थे कि दलित और महिलाओं की आत्मनिर्भरता, शोषण से मुक्ति और विकास के लिए सबसे जरूरी है शिक्षा और इसकी शुरुआत उन्होंने सावित्रीबाई फुले को शिक्षित करने से की. ज्योतिबा को खाना देने जब सावित्रीबाई खेत में आती थीं, उस दौरान वे सावित्रीबाई को पढ़ाते थे लेकिन इसकी भनक उनके पिता को लग गई और उन्होंने रूढ़िवादिता और समाज के डर से ज्योतिबा को घर से निकाल दिया. फिर भी ज्योतिबा ने सावित्रीबाई को पढ़ाना जारी रखा और उनका दाखिला एक प्रशिक्षण विद्यालय में कराया.

जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे। सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। समाज द्वारा इसका बहुत विरोध होने के बावजूद सावित्रीबाई ने अपना अध्ययन पूरा किया. पढ़ाई पूरी होने के बाद सावित्री बाई ने सोचा कि शिक्षा का उपयोग अन्य महिलाओं को शिक्षित करने में किया जाना चाहिए. उन्होंने ज्योतिबा के साथ मिलकर 1848 में पुणे में बालिका विद्यालय की स्थापना की. जिसमें 9 लड़कियों ने दाखिला लिया.

1 जनवरी 1848 से लेकर 15 मार्च 1852 के दौरान सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने बिना किसी आर्थिक मदद और सहारे के लड़कियों के लिए 18 विद्यालय खोले. उस दौर में ऐसा सामाजिक क्रांतिकारी की पहल पहले किसी ने नहीं की थी. 10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया।

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