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2019 में भाजपा का हारना तय है!

2019 में भाजपा का हारना तय है. जनता भाजपा के फरेब से परिचित हो चुकी है. भाजपा को भी पता है कि लोग अब पहले की तरह बेवकूफ बनने वाले नहीं हैं. इसीलिए वह विकास का मुद्दा छोड़कर अपने मूल हथियार यानी साम्प्रदायिक राजनीति का प्रयोग करने के लिए माहौल बनाने लगी है. इसके लिए लगभग सभी न्यूज चैनल , ट्विटर , व्हाट्सएप और फेसबुक का प्रयोग शुरू हो चुका है. फेक न्यूज और प्लांटेड न्यूज से जनता को साम्प्रदायिक होने के लिए उकसाया जा रहा है. लेकिन इसका भी कोई खास असर होता नहीं दिख रहा है.

प्रो-बीजेपी तमाम न्यूज चैनल्स और शोसल मीडिया ग्रुप्स/पेज पर सरकार की किसी भी योजना की उपलब्धि या खामी का कोई जिक्र नहीं हो रहा है. इसकी वजह यह है कि पिछले साढ़े चार साल में भाजपा के पास बताने के लिए कोई उपलब्धि नहीं है. कुछ है तो सिर्फ खामियां. वो भी काउंटलेस. इस सरकार की थोड़ी बहुत अच्छी छवि मात्र यहां के बिकाऊ और दलाल मीडिया की वजह से है.

इन दिनों आपने कभी भी सांसद आदर्श ग्राम , डिजिटल इंडिया , जनधन योजना , मेक इन इंडिया , पहल , स्टार्टअप इंडिया , स्टैंडअप इंडिया आदि योजनाओं का जिक्र नहीं सुना होगा. कालाधन , भ्रष्ट्राचार निवारण , नोटबन्दी , जीएसटी और सर्जिकल स्ट्राइक का तो नाम लेने से भी बीजेपी के नेताओं की हालात खराब हो जाती है. इन सब की शुरुवात बहुत जोरशोर से शुरू हुई थी. लेकिन आज ये बीजेपी की असफलताओं का स्मारक बन चुके हैं.

इसके अलावा महंगाई , रोजगार की भरमार , महिला सुरक्षा , स्वच्छता अभियान , गंगा की सफाई , गौरक्षा , रक्षा उपकरणों के मामले में आत्मनिर्भरता , बेहतर विदेश नीति , भारत को विश्वगुरु बनाने और वैश्विक व्यापार में भारत का दबदबा स्थापित करने जैसे जुमलों की भी हवा निकल चुकी है.

इसीलिए भाजपा अब अपने मूल हथियार यानी ‘ साम्प्रदायिक राजनीति ‘ की धार तेज करने में लगी है.

गौरतलब है कि इस हथियार के पीछे बीजेपी अपना सबसे बड़ा हथियार यानी इवीएम छुपा रही है. अगर बीजेपी जीती तो समझ जाईयेगा कि उसने साम्प्रदायिकता की आड़ में एवीएम जैसे अचूक हथियार का प्रयोग किया है. साम्प्रदायिक राजनीति का दिखावा वो झुनझुना है जो बीजेपी की जीत के बाद जनता को बहकाने और चुनावी विश्लेषकों के बजाने के काम आएगा. मेरा अनुमान गलत भी हो सकता है. लेकिन इतना तय और सही है कि इस दौर में अगर बीजेपी पर ईवीएम की कृपा नहीं रही तो वो हारेगी और सिर्फ पांच साल ही नहीं अगले कुछ दशक तक सत्ता से बाहर रहेगी.

नोट- ये लेखक के अपने विचार हैं इसमें कोई छेड़छाड़ नहीं किया गया है।

Pradyumna Yadav

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