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Politics - Social - State - February 10, 2019

क्या एक सिक्के के दो पहलू हैं बीजेपी और कांग्रेस?

Published by- Aqil Raza
By- Aqil Raza ~

क्या राजनीति का नाम सत्ता और विपक्ष तक ही सीमीत है, क्या सत्ता में बैठी सरकार की अलोचना महज़ इस बजह से की जाती है जिससे विपक्ष में बैठी पार्टी फिर से सत्ता पर काविज हो सके। क्या सरकार पर सवाल खड़े करने का मकसद समाज में बहतर सुधार करने से प्रेरित होना नहीं चाहिए।

यह सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं इसको समझने की ज़रूरत है। देशभर में गौहत्या और मॉवलिंचिग की पिछले बीते सालों से लेकर अब तक कई घटनांए एक के बाद एक हमार सामने आई हैं। जिनमें SC/ST और मुस्लिम समुदाय के लोग ज्यादातर शिकार हुए हैं या कहें कि कथिततौर पर शिकार बनाया गया है। जिसको लेकर काफी अलोचना भी हुई है। यहा तक कि विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी ने भी गोहत्या के नाम पर मॉवलिंचिंग को लेकर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की। मॉवलिंचिंग की सबसे ज्यादा घटनांए जहां हुई हैं उनमें राजस्थान मध्यप्रदेश छत्तीसगढ, और हरियाणा शामिल है।

राजस्थान मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में यानी इन तीनों राज्यों में बीजेपी को इसका खामयाज़ा उठाना पड़ा और अब इनमें कांग्रेस की सरकार है। लेकिन सरकार तो बदल गई पर सवाल यह है कि क्या हालात बदले हैं। क्या वो सोच बदली है जिस सोच के सहारे अल्पसंख्यक और SC/ST को शिकार बनाया जाता रहा है।

तो इसका जवाब हालहि में आई एक खबर से मिल जाएगा। खबर थी कि मध्य प्रदेश के खंडवा में गोहत्या के मामले में तीन लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) की धाराएं लगाते हुए गिरफ्तार किया गया है.

रासुका किन केसों में लगाई जाती है यह आप बाखूवी जानते होंगे, कि जब किसी कि गतिविधि से राष्ट्र को खतरा हो, या देश को नुकसान पंहचाना चाह रहा हो तो उसपर NSA यानी NATIONAL SECURITY ACT लगाया जाता है।

मध्यप्रदेश में कमलनाथ की सरकार ने यह धारा क्यों और किस पर लगाई है अब यह जान लेते हैं। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, नदीम, खलील और आज़म पर गौकशी में संलिप्त होने के आरोप में गिरफ्तार कर रासुका लगाई गई है। पुलिस ने बताया कि नदीम और खलील को खुफिया जानकारी मिलने पर गिरफ्तार किया जबकि आज़म को बजरंग दल के विरोध प्रदर्शन करने की धमकी के बाद गिरफ्तार किया गया। यह वही बजरंग दल है जिससे जुड़े शख्स की बुलंदशहर हिंसा में अहम भुमिका थी और पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर पाई थी। बहरहाल नदीम, शकील और आज़म नामक अभियुक्तों पर पहले मध्य प्रदेश गोहत्या निषेध अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज किया गया था.

पुलिस अधीक्षक की सिफारिश पर जिला कलेक्टर ने एनएसए लगाने की मंजूरी दी, जो अधिकतम एक साल के लिए हिरासत में रखने की अनुमति देता है. जब मध्यप्रदेश गोहत्या निषेध अधिनियम बना हुआ है तो रासुका जैसी धारा लगाना कितना वाजिब है।

लेकिन हो सकता है कि कमलनाथ सरकार को लगता हो कि इस तरह कि कार्रवाई से दूसरे समुदाय के लोग खुश हो जाएं और उनका वोटबैंक बढ़ जाए, क्योंकि वैसे भी सब कुछ तो राजनीति ही है। आपने देखा होगा कि चुनाव के दौरान किस तरह से बीजेपी और कांग्रेस दोनों में अपने आप को कट्टर हिदुं दिखाने की बहस चल रही थी। मुद्दो को भूलकर हिंदुत्व चमकाने में लगे हुए थे। जो सिलसिला बीजेपी राज में इन राज्यों में चल रहा था वहीं सिलसिला कांग्रेस राज में भी जारी है, तो क्या सिर्फ सत्ता का बदलाव हि सबकुछ है।

मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार में गोहत्या के आरोप में रासुका लगाने का पहला मामला है, इससे पहले 2007 से 2016 के बीच भाजपा की शिवराज सरकार में गोहत्या के मामले में 22 लोगों को रासुका के तहत गिरफ़्तार किया गया था।

कांग्रेस सरकार की इस कारर्वाई को लेकर जनता के साथ साथ उनकी पार्टी के विधायक आरिफ मसूद ने भी नराज़गी जताई है। मसूद ने कहा कि अगर पार्टी गौहत्या को लेकर सख्त कार्रवाई करना चाहती है तो गोरक्षा के नाम पर हिंसा फैलाने वालों के खिलाफ भी एक्शन लेना चाहिए।

गोरक्षा के नाम पर हिंसा फैलाने वालों पर किस तरह कि कार्रवाई होती है इसका उद्हारण यूपी से मिल जाएगा।

बुलंदशहर मामले में कथित गोकशी की घटना के संबंध में गिरफ्तार तीन लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा दिया जाता है. लेकिन हिंसा फैलाने में जो मुख्य आरोपी हैं उनपर रासुका जैसी कोई धारा नहीं लगाई जाती है।

अजहर, नदीम उर्फ नदीमुद्दीन और महबूब अली पर रासुका लगाया गया, जिन्हे गौ-हत्या अधिनियम, 1955 की धारा 3,5 और 8 के तहत गिरफ्तार किया गया था.

बुलंदशहर पुलिस ने मुख्य आरोपी योगेश राज और शिखर अग्रवाल सहित इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की कथित हत्या के लिए 35 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया, लेकिन दंगा और हत्या के आरोपियों के खिलाफ अभी तक रासुका नहीं लगाया गया।

अब सवाल वही की क्या तीन राज्यों में सरकार बदलने से हालात बदले, क्या जो कार्रवाई पहले होती थी अब सही से होने लगी है, अगर नहीं तो फिर क्या यह मान लिया जाए की दोनों की नियत एक हि है। तो क्या राजनीतकि का नाम सत्ता और विपक्ष हि है? हम क्यों नहीं, चुनाव आने वाला है समझिए हालातों को और अपने विवेक से सरकार को चुनिए।

~ आकिल रज़ा

(एंकर एंड मैनेजिंग हेड, नेशनल इंडिया न्यूज़)

 

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