बाबा साहेब की 127वीं जयंती और आज का भारत
By- Aqil Raza
बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की आज 127वीं जयंती है. इस मौके पर देश भर में तमाम कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं. एक ऐसे समय में जब देश के अंदर पूरी तरह से नफरत का बीज बोया जा रहा है, आस्था..धर्म…मंदिर और मस्जिद के नाम पर लोगों में सांप्रदायिक ज़हर भर दिया गया है..डॉ भीमराव अंबेडकर के जन्म दिन को सेलिब्रेट करने से ज्यादा जरूरी है कि उनके विचारों को देश भर में फैलाया जाए।
क्योंकि जिस भारत की कल्पान डॉ अंबेडकर ने की थी वो आपस में टूटता हुआ दिखाई दे रहा है.. और इस बिखरते भारत पर राजनेता अपनी गंदी राजनीति की रोटिया सैंक रहे हैं… जो सविंधान इस देश को दिया गया है उसी को बदलने के लिए अवाज़ उठने लगी है… घिनोने अपराध करने वाले आरोपियों को सज़ा दिलाने की वजाए…सविंधान कि शपथ लिए नेता आरोपियों के समर्थन में उतरने लगे हैं। अगर एक बेटी इंसाफ पाने के लिए खड़ी होती है तो सत्ता का संक्षण पाकर पिता की हत्या कर वा दी जाती है…
एक मासूम के साथ हैवानियत और दरिंदगी को उसके धर्म के आधार पर देखा जाता है…जय श्रीराम और तिरंगे का सहारा लेकर कानून की कमर तोड़ने की कोशिश की जाती है। अब आप सोचिए क्या ये वहीं भारत है जिस भारत का बाबा साहेब ने सपना देखा था। आज बीजेपी, कांग्रेस, सपा, बसपा सभी राजनीतिक दल इस जयंती के मौके पर विशेष आयोजन करा रहे हैं. अंबेडकर जयंती पर सियासी दल बहुजनों को रिझाने की कोशिश में लगे हैं. इस अवसर पर हमें अंबेडकर को समझना बेहद जरूरी है।
समाज सुधारक और संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती के मौके पर तमाम दलों के नेताओं ने ट्वीट कर बाबा साहेब को याद किया है. डॉ भीम राव अंबेडकर को बाबा साहेब के नाम से भी जाना जाता है. वो स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री और भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार थे. उन्होंने बहुजन बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और बहुजनों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाया. श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का भी समर्थन किया.
देश के संविधान को आकार देने वाले डॉ अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल साल 1891 में हुआ था. बाबा साहेब को भारतीय संविधान का आधारस्तंभ माना जाता है. उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त छूआछूत, बहुजनों, महिलाओं और मजदूरों से भेदभाव जैसी कुरीति के खिलाफ आवाज बुलंद की और इस लड़ाई को धार दी. वो महार जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे हिंदू धर्म में अछूत माना जाता था. उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से उन्हें कई मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा था.
आर्थिक मुश्किलों के साथ ही उन्हें हिंदू धर्म की कुरीतियों का सामना भी करना पड़ा और उन्होंने इन कुरीतियों को दूर करने के लिए हमेशा प्रयास किए. उसके बाद अक्टूबर, 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया, जिसके कारण उनके साथ लाखों बहुजनों ने भी बौद्ध धर्म को अपना लिया. उनका मानना था कि मानव प्रजाति का लक्ष्य अपनी सोच में सतत सुधार लाना है.
बीआर अंबेडकर को आजादी के बाद संविधान निर्माण के लिए 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया. फिर उनकी अध्यक्षता में 2 साल, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ. कहा जाता है कि वो नौ भाषाओं के जानकार थे. उन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं. इनके पास कुल 32 डिग्रियां थीं. साल 1990 में, उन्हें भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था.
अंबेडकर जिस ताकत के साथ बहुजनों को उनका हक दिलाने के लिए उन्हें एकजुट करने और राजनीतिक-सामाजिक रूप से उन्हें सशक्त बनाने में जुटे थे, उतनी ही ताकत के साथ उनके विरोधी भी उन्हें रोकने के लिए जोर लगा रहे थे. लंबे संघर्ष के बाद जब अंबेडकर को भरोसा हो गया कि वो हिंदू धर्म से जातिप्रथा और छुआ-छूत की कुरीतियां दूर नहीं कर पा रहे तो उन्होंने वो ऐतिहासिक वक्तव्य दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि मैं हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं.
आजादी के बाद पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में डॉक्टर अंबेडकर कानून मंत्री बने और उन्होंने हिंदू कोड बिल तैयार किया, लेकिन इस बिल को लेकर भी उन्हें जबर्दस्त विरोध झेलना पड़ा. खुद नेहरू भी तब अपनी पार्टी के अंदर और बाहर इस मुद्दे पर बढ़ते दबाव के सामने झुकते नजर आए. इस मुद्दे पर मतभेद इस कदर बढ़े कि अंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया.
बाबा साहेब ने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी जहां सभी धर्म जात के लोग समान अधिकार के साथ रह सके, और इस समाज में सभी को बराबरी का हक मिल सके। एक ऐसे दौर में जब बहुजनों को अछूत समझा जाता था बाब सैहेब ने सबको समान अधिकार दिलाया और यही वजह है जो कि बहुजन समाज बाबा साहेब को अपना मसीहा मानता है।
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