Home Social Culture कोरोना महामारी में उभरे एक नायक : हेमंत सोरेन

कोरोना महामारी में उभरे एक नायक : हेमंत सोरेन

झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के पिता सोबरन मांझी की हत्या महुआ शराब का धंधा और महाजनी करने वाले हेडबरगा के बनियो ने करवा दी थी. गुरुजी ने टुंडी के पोखड़िया आश्रम को केंद्र बना कर महाजनी शोषण के खिलाफ जिस धनकटनी आंदोलन का नेतृत्व किया, वह आंदोलन नशाखोरी के भी खिलाफ था. उन दिनों गुरुजी स्वयं शराब बनाने के अड्डो पर जाते और वहां तोड़ फोड़ होता, शराब का धंधा करने वालों -पीने और पिलाने वालों- दोनों की पिटायी होती. गुरुजी स्वयं पूरी तरह शकाहारी हैं और किसी तरह के नशे का सेवन नहीं करते. हेमंत सोरेन की भी ऐसी छवि नहीं. उसके बावजूद उन्हें ‘हड़िया वाला मुख्यमंत्री’ कहा गया, तो इसका अर्थ थोड़ा गहरा है.

दरअसल, हड़िया भले ही गर्व की वस्तु नहीं हो, वह आदिवासी संस्कृति का पर्याय जरूर है. और ‘हड़िया वाला मुख्यमंत्री’ का मतलब है आदिवासी मुख्यमंत्री. यह छवि आदिवासी होते हुए कड़िया मुंडा नहीं प्राप्त कर सके. बाबूलाल मरांडी को नहीं मिली. न अर्जुन मुंडा की छवि आदिवासी नेता की रह गयी है. यह छवि तो इसके पहले स्व.जयपाल सिंह मुंडा को प्राप्त थी, या फिर झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन को. आदिवासी नेता की वही छवि अब हेमंत सोरेन प्राप्त कर रहे हैं.

हम जब कहते हैं कि हड़िया आदिवासी अस्मिता और संस्कृति की पहचान है, तो यह बात आज के कुछ प्रगतिशील युवाओं को बुरा भी लग सकता है. लेकिन बुरा लगे या भला, यह एक यर्थाथ है. इसे नकारा नहीं जा सकता.

नीचे दो कोटेशन है. उसे ध्यान से पढ़ियेगा. दोनों फनिश्वरनाथ रेणु के प्रसिद्ध उपन्यास ‘ मैला आंचल’ से लिया गया है. पृष्ठभूमि यह कि आजादी के बाद जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हो रहा है. आदिवासियों को यह समझाया गया कि जिस जमीन पर दो वर्षों से अधिक समय से वे खेती कर रहे हैं, वह जमीन उनकी हो जायेगी. लेकिन गैर आदिवासीबहुल गांव इसके लिए तैयार नहीं. तहसीलदार अपने दरवाजे पर बीज लेने आये लोगों को आदिवासियों के खिलाफ भड़का रहा है.

‘‘ ..जरा विचार कर देखो. यह तंत्रिमा का सरदार है… .. अच्छा, तुम्ही बताओ जगरू, तुम लोग कौन ततमा हो. मगहिया हो न? अच्छा कहो, तुम्हारे दादा ही पश्चिम से आये और तुम्हारी बेटी तिरहुतिया तंत्रिमा के यहां ब्याही गयी. मगहिया चाल चलन भूल गये. अब तिरहुतिया और मगहिया एक हो गये. लेकिन संथालो में भी कमार और मांझी हैं. वे लोग यहां के कमार और मांझी में कभी खप सके? नहीं. वे हमेशा हमलोगों को ही छोटा कहते हैं. गांव के बाहर रहते हैं.. .. कहो तो गाने किसी संथाल को बिदेशिया का गाना या एक कड़ी चैती. कभी नहीं गावेगा. इसका दारू हरगिज नहीं पीयेगा. जब पीयेगा तो पंचाय ही. समझो. सोचो.. ..’’

(पूर्णिया फारबिसगंज के इलाके में हड़िया को पंचाय कहते हैं आदिवासी.)

अब इसी क्रम का एक दूसरा कोटेशन उसी उपन्यास से.

‘‘ संथालों को सब मालूम है.
अभी बलदेवजी, बाबनदासजी और कालीचरन जी सब एक हो गये. संथाल लोग अच्छी तरह जानते हैं. कोई साथ देने वाला नहीं. इसलिए बड़े-बूढ़े ठीक कह गये हैं- यहां के लोगों का विश्वास मत करना. संथाल संथाल है और दिक्कू दिक्कू. पांचाय देह को पत्थल की तरह मजबूत करता है और पीकर देखो यहां का दारू, पत्थल को गला देगा. हरगिज नहीं. दिक्कू आदमी, भट्ठी का दारू, इसका विश्वास नहीं… . अरे तीर तो है. यही सबसे बड़ा साथी.’’

यह उपन्यास 1954 में सबसे पहले प्रकाशित हुआ था. जाहिर है, उस समय की पृष्ठभूमि में है. जमाना बदल गया. करीबन 75 वर्ष बीत चुके हैं. लेकिन हड़िया या पंचाय आज भी आदिवासी व गैर आदिवासी समाज के बीच की एक खिंची रेखा है.

इसलिए जब हेमंत सोरेन को ‘हड़िया वाल मुख्यमंत्री’ कहा किसी ने, तो प्रकारांतर से उसने एक बड़े सच को अभिव्यक्त कर दिया. हेमंत आदिवासियों के एक सर्वमान्य नेता बन गये हैं. यह छवि गिने चुने आदिवासी नेताओं को ही मिली है. स्व. जयपाल सिंह को मिली थी. गुरुजी आदिवासीयत के उसी आभामंडल से घिरे हैं. हेमंत अपने पिता के उस आभामंडल के बीच अपनी एक छवि बना रहे हैं, यह एक बड़ी उपलब्धि है और आदिवासी राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़.


लेकिन इसके अपने खतरे भी हैं. लालू यादव और शिबू सोरेन अभिजात समाज को कभी नहीं स्वीकार्य हुए. क्योंकि वे सवर्ण राजनीति को चुनौती देते हैं. उन्हें बाबूलाल, अर्जुन मुंडा या नीतीश कुमार स्वीकार्य हैं, शिबू और लालू नहीं. और इसीलिए अभिजात राजनीति को हेमंत भी स्वीकार्य नहीं होंगे. लेकिन आदिवासियों के नायक से वंचित समूह के नायक बनने का उनका रास्ता प्रशस्त है.

और अल्पअवधि के अपने शासन में उन्होंने दिखा दिया कि ‘हड़िया वाला मुख्यमंत्री’ में कितना दम है.
-सत्ता की बागडोर संभालते ही देशद्रोह और जल, जंगल, जमीन बचाओ आंदोलन से जुड़े तमाम मूकदमे वापस लेने की घोषणा
-जन विरोध और भावना को समझते हुए इचा डैम के काम को रोकने का फैसला.
-कोरोना संकट को काबू में करने की हर चंद कोशिश
-प्रवासी मजदूरों की वापसी के लिए ठोस कदम
-मनरेगा श्रमिकों की मजदूरी बढ़ाने के लिए केंद्र पर दबाव
-श्रमिक कानून में बदलाव का विरोध
-कृषि, जलछाजन एवं वानिकी से जुड़ी विकास योजनाओं की शुरुआत
-कोयला खदानों के निजीकरण के खिलाफ पुरजोर आवाज

फेम इंडिया ने देश के पचास शक्तिशाली व्यक्तियों में उन्हें शुमार किया है और वे शीर्ष 12 लोगों में शामिल हैं. लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह कि आदिवासी-मूलवासी जनता को उनका एक युवा नायक मिल गया है..

इस लेख को विनोद कुमार के FB वॉल से लिया गया है, यें उनके नीजी वीचार है।

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