कन्हैया कुमार झा का ब्राह्मणवादी, जातिवादी और झूठ से लैस चरित्र आया सामने, AISF जेएनयू युनिट के प्रभारी के पत्र में
کی طرف سے: Jayant Jigyasu
सुधाकर रेड्डी जी,
جنرل سیکرٹری,
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया।
प्रिय कॉमरेड,
लाल सलाम!
हमारा जनसंगठन एआइएसएफ और हमारी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कुछ बुनियादी सिद्धांतों व लोकोन्मुखी नीतियों को लेकर वुजूद में आए। जन-अपेक्षाओं, जनाक्रोश व जनदबाव को समझना हमारा फर्ज़ रहा है। वैश्विक हलचल, जहाँ पूंजीवादी ताक़तें इस कदर हावी हैं कि जनपोषित विश्वविद्यालयों को ढाहने का इशारा है, 13 प्वाइंट रोस्टर के माध्यम से आरक्षण को चकनाचूर किया जा रहा है व मुल्क के अंदर लगातार लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमले किये जा रहे हैं; ऐसे दौर में जहां समाजवादी लक्ष्य की ओर बढ़ना था; वहाँ व्यक्तिवादी एजेंडे को लगातार संगठन व पार्टी में बढ़ावा दिया जा रहा है। यह कोई अनायास व अकारण नहीं है कि पूरे तंत्र को ध्वस्त करने में कुछ लोग लगे हुए हैं। यह कोई नेतृत्व के संकट का सवाल भी नहीं है, बल्कि पूरी संरचना ही अपने आप में अभिजात्य सवर्णवादी वर्चस्व के तानेबाने का संकेत देती है।
कॉमरेड, تنظیم اور پارٹی میں ایک مکمل نمونہ نظر آتا ہے کہ استحصال زدہ-نظر انداز-محروم-بدبخت-مظلوم لوگوں کے ساتھ بندھوا مزدوروں جیسا سلوک کیا جاتا ہے۔ کوئی جھنڈا اٹھائے, नेता कोई और बनता है। अपमानित करने के इतने तरीक़े ईज़ाद कर लिए गए हैं कि उनसे निबटना कोई आसान काम नहीं। पिछले तीन वर्षों से बड़े क़रीब से देख रहा हूँ कि चाहे कितना भी समर्पण के साथ आप संगठन के लिए काम कर लें, आपके ऊपर मेडियोकर क़िस्म के लोग को लेगपुलिंग के लिए लगा दिया जाता है। दलित-पिछड़े-आदिवासी-अकलियत किन्हीं के भी नेतृत्व में काम कर लेते हैं, मगर तथाकथित उच्च जातियों के लोगों को पिछड़े-दलित-आदिवासी का नेतृत्व सहज भाव से स्वीकार्य नहीं है। ह्युमिलिएट करने के इतने लेयर्स हैं कि कहाँ-कहाँ से बचा जाए, چلو لڑتے ہیں۔
جب ایک دور دراز گاؤں میں پسماندہ فرقیہ کا فرد جے این یو یونٹ کا سکریٹری بنتا ہے۔, प्रेज़िडेंट सीमांचल के अल्पसंख्यक समाज का कोई शख़्स होता है, तो उनका उपहास उड़ाया जाता है, एक लॉबी बना कर उनके साथ ‘असहयोग आंदोलन’ चलाया जाता है, संगठन को लगातार नुक़सान पहुंचाया जाता है। समझ में नहीं आता कि जो व्यक्ति विगत तीन सालों से बिना इसकी परवाह किए कि कौन नेतृत्व में है; चुपचाप काम करता रहा जो भी संगठन की ओर से उसे सौंपा गया; اس کے ساتھ تنظیم کے اندر دائیں بازو کی خطرناک قوتیں اس طرح کا گھناؤنا کھیل کھیلیں گی۔, तनिक भी अंदाज़ा नहीं था। सीधा-सीधा एक ही एजेंडा है कि संगठन तभी चलने देंगे जब नेतृत्व सवर्ण कहे जाने वाले लोगों के हाथ में होगा या उनके पपेट के हाथों में।
कॉमरेड, लेनिन की एक बात याद आती है, “All our lives we fought against exalting the individual, against the elevation of the single person, and long ago we were over and done with the business of a hero, and here it comes up again: the glorification of one personality. This is not good at all. I am just like everybody else”.
वो उड़ता रहा, उड़ता रहा, उड़ता रहा
संगठन धंसता रहा, धंसता रहा, धंसता रहा ।

जो भी लोग जेएनयू में चुनाव लड़ लेते हैं, वो ख़ुद को आश्चर्यजनक ढंग से संगठन की गतिविधियों से किनारा कर लेते हैं। कहीं कास्ट एरोगेंस है तो कहीं क्लास एरोगेंस। मुझे आपके साथ हुई एक बैठक याद है जिसमें कॉमरेड कन्हैया ने कहा कि मैं जेएनयू एआइएसएफ युनिट का हिस्सा नहीं हूँ। जब तक कोई अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए है, ऑन रोल है, कोई किसी युनिट का हिस्सा हुए बगैर कैसे डिपार्टमेंट का मेंबर हो सकता है या नेशनल काउंसिल का हिस्सा? इस पर आपने ख़ामोशी ओढ़ ली। आप बेहतर जानते हैं कि मैंने अपना पूरा समय संगठन और पार्टी के निर्देशानुसार इनके साथ बहुत क़रीब से काम करने में लगाया है। यहाँ मैं व्यक्तिगत नहीं, सैद्धांतिक सवाल उठा रहा हूँ। नियम-क़ायदे व्यक्ति विशेष के आगे कैसे बदल जाते हैं?
बतौर प्रेज़िडेंट (जेएनयूएसयू) कन्हैया ने हॉस्टल एलॉटमेंट में ओबीसी रेज़र्वेशन के रिज़ोल्युशन को अपने विवेकाधिकार (Discretionary power) का प्रयोग करके यूजीबीएम में टेबल होने नहीं दिया और ‘नियम’ का हवाला दिया। जब टेबल नहीं होने देने के लिए वीटो लगाया जा सकता है तो टेबल करने के लिए क्यों नहीं? اور جب پورے کیمپس میں اور باہر بھی اس کا چرچا تھا۔, तो गोल-मटोल जवाब दिया गया। मैंने तब सार्वजनिक रूप से कहा कि दलितों-पिछड़ों-आदिवासियों-अकलियतों-पसमांदाओं के हितों के साथ मैं कोई समझौता नहीं करूंगा, भले ही ऑरगेनाइज़ेशलन लाइन का उल्लंघन करना पड़े। अगर कोई लाइन गड़बड़ है, तो उसे ठीक कौन करेगा? इस पर कन्हैया असहज हुए और देर रात तक मुझसे गुफ़्तगू की और तकनीकी मामला बताकर मुझे आश्वस्त करने की कोशिश की कि चूँकि यह रिज़ोल्युशन युनियन की काउंसिल मीटिंग में पास हो चुका था, इसलिए इसे अलग से युनिवर्सिटी जेनरल बॉडी मीटिंग में ले जाने की ज़रूरत नहीं थी। मैंने वीटो पर आपत्ति जताई, तो वो झेंपने लगे। यह पूरी बात केरल विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान पट्टाम्बि सीट पर कॉमरेड मुहसिन के पक्ष में जब हमलोग गए थे, तब एआइएसएफ के हमारे जेनरल सेक्रेटरी कॉमरेड विश्वजीत भाई के पूछने पर उन्हें मैंने बताई थी। उस वक़्त उन्होंने भी मुझसे सहमत होते हुए कहा कि वीटो जैसे शब्द के प्रयोग या अनावश्यक उपयोग से बचते हुए काउंसिल में पास हुए रिज़ोल्युश्न का हवाला देना चाहिए था। अब आपको जानकर उतनी ही हैरत होगी जितनी मुझे हुई जब 2015-16 के युनियन में काउंसलर रहे दिलीप कुमार ने मुझे कुछ महीने पहले बताया कि ऐसा कोई रिज़ोल्युशन काउंसिल मीटिंग में आया ही नहीं था, न पास हुआ। मतलब कन्हैया ने झूठ बोला। इसे क्रॉस चेक भी कर लिया जा सकता है। मसला इंटेंशन का है, उन्हें यह भी कहते हुए सुना गया कि रेज़र्वेशन चाहिए इन्हें (او بی سی), क्या रेज़र्वेशन हम अपने पॉकेट से देंगे? इन बातों से हमारे संगठन व पार्टी के बारे में दोहरे चरित्र का संदेश बाहर जाता रहा। अन्य संगठनों की नजर में संगठन आरक्षणविरोधी साबित हुआ जिसके कारण हम जैसे बहुत से कार्यकर्ताओं को अभी भी बार-बार शर्मसार होना पड़ता है। “कमरे के बाहर साम्यवादी, कमरे के अंदर जातिवादी” का सिद्धांत बहुतेरे लोगों ने अपना रखा है, जिसके ये अपवाद नहीं हैं।
कॉमरेड, आपके संज्ञान में यह बात एआईएसएफ के शीर्ष नेतृत्व द्वारा लाई गई या नहीं, मुझे नहीं मालूम, पर जिस व्यक्ति के साथ हुई ज़्यादती के ख़िलाफ़ पूरा जेएनयू और देश का प्रगतिशील व सामाजिक न्यायपसंद धड़ा साथ खड़ा था, उसी कन्हैया ने जेएनयू स्ट्युडेंट कम्युनिटी के साथ धोखा किया। प्रशासन द्वारा थोपे गए कंपलसरी अटैंडेंस के बखेड़े के खिलाफ़ जब सारे संगठन जूझ रहे थे, छात्रसंघ व सारे छात्र संगठन अटैंडेंस का बहिष्कार कर रहे थे, چنانچہ کنہیا سب سے پہلے حاضری پر دستخط کرنے والوں میں شامل تھا۔ یہ واضح طور پر تحریک کے ساتھ دھوکہ تھا جس کی وجہ سے وہ مودی کے مرض کے ماہر کے طور پر اپنی تعریف اور تعصب پر فخر کرتے ہوئے ملک بھر میں گھوم رہے ہیں۔ ان کے اس گھناؤنے فعل کی جے این یو ایس یو کے سابق صدر لینن سمیت کئی تنظیموں کے کارکنوں نے کھل کر تنقید کی تھی۔ جب اس کے لیے ہمارا مذاق اڑایا گیا۔, तो हमें चुप हो जाना पड़ता था। ऐसे कई मौक़ों पर संगठन को आज भी शर्मसार होना पड़ता है।
आपको यह भी मालूम होगा कि बेगूसराय से भाजपा सांसद भोला सिंह से कन्हैया भेंट करते हैं और अगले दिन भोला सिंह उन्हें भगत सिंह करार दे देते हैं। क्या पार्टी को अब भाजपा के सर्टिफिकेट की ज़रूरत पड़ गई या यह नैसर्गिक अवसरवादी जातीय गठजोड़ का अश्लील प्रदर्शन है? माफ़ कीजिएगा, यह भगत सिंह का भी अपमान है। क्या यही सीपीआई की विरासत है? यह भी अचरज की ही बात है कि बिना ज़िला कमिटी के निर्णय के कन्हैया की उम्मीदवारी की घोषणा कॉमरेड के. नारायणा द्वारा की जाती है। अब कॉमरेड नारायणा को राज्य कमिटी ने कैसे गफ़लत में डाल कर यह सब कराया या फिर पूरे पार्टी स्ट्रक्चर को नेस्तनाबूद करने की साज़िश कहाँ से चल रही है, यह सब गंभीर पड़ताल की मांग करता है। किसी व्यक्ति विशेष की उम्मीदवारी से किसी को कोई एतराज़ नहीं हो सकता, मगर थोड़ा-बहुत तो पार्टी की इंटरनल डेमोक्रेसी का भ्रम बना रहने दिया जाए कॉमरेड। पिछले चुनाव में भी विचित्र क़िस्म का उल्लंघन हुआ, ज़िला कमिटी के पूरे वुजूद पर कुठाराघात हुआ। यहाँ जॉनाथन स्विफ्ट प्रासंगिक प्रतीत होते हैं: Laws are like cobwebs, which may catch small flies, but let wasps and hornets break through.
कॉमरेड, पार्टी कांग्रेस में कन्हैया ने सीपीआई को कन्फ़्युज़्ड पार्टी ऑफ़ इंडिया कहा, क्या आप भी इस बात से सहमत हैं? सब जगह इस तरह के बेतुके व दंभ भरे अहमकाना बयान के चलते संगठन व पार्टी की भद्द पिट रही है, मगर जब पार्टी ने ख़ुद को व्यक्तिवादी अपसंस्कृति के हवाले सुपुर्द कर देना स्वीकार कर लिया है, तो वहाँ किसी तरह के मुख़्तलिफ़ आवाज़ के लिए किसी जगह की गुंजाइश क्षीण दिखती है। लोक कल्याणकारी नीतियों व आरक्षण के सवाल पर जिस मुखरता के साथ बात रखने व संघर्ष करने की ज़रूरत है, वहाँ भी पार्टी इफ-बट-ऑलदो-हाउएवर के शब्दजाल में गोल-गोल घुमाती है।
कॉमरेड, एक ही संगठन के अंदर कई मसलों पर अलग-अलग राय रखने वाले लोग हो ही सकते हैं, और यही जम्हूरियत की ख़ूबसूरती भी है। वोल्तेयर कहते हैं, “I may disagree with everything that you say, but I will defend, to the last drop of my blood, your right to say so”. जब महिला आरक्षण का सवाल आता है, तो वहाँ मुझ जैसे अनेक व्यक्ति का यह मत है कि उसमें क़ोटे के अंदर क़ोटे का प्रावधान होना चाहिए और ओबीसी वर्ग की महिलाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए। जब लालू-शरद-मुलायम जैसे नेता इस बात की वकालत करते हैं, तो उसमें कोई बात अतार्किक नहीं लगती या महिला आरक्षण विधेयक को लटकाने की मंशा नज़र नहीं आती, बल्कि मौजूदा स्वरूप में इस विधेयक का लागू हो जाना रिग्रेसिव होगा। इस पर भी पार्टी ने अपना ढुलमुल रवैया ही जनता के सामने रखा। हम चाहते हैं कि संसद की शोभा न सिर्फ़ सुषमा स्वराज व स्मृति ईरानी जैसी महिलाएं बढ़ाएं, बल्कि सदन में पत्थर तोड़ने वाली भगवतिया देवी एवं पितृसत्ता की घिनौनी करतूतों व ज़ुल्मतों की शिकार और मुख़ालफ़त की ज़बर्दस्त, अद्भुत व अपूर्व आवाज़ फूलन देवी का हुंकार भी न्यायप्रिय जनता को सुनाई दे।
कॉमरेड, जिन मज़दूर-किसान-नौजवान की हम बात करते हैं, वह व्यवहार में अपेक्षित ढंग से बरती नहीं जा रही है। सिद्धांत और व्यवहार में दूर-दूर तक कोई साम्य नहीं है। पार्टी के मुख्य दफ़्तर में सफाईकर्मियों का मेहनताना इतना कम है कि उनके बच्चों की ठीक से परवरिश व पढ़ाई-लिखाई नहीं हो सकती। लोहिया की बात हम दुहराते ज़रूर हैं, लेकिन बगैर वंचितों को सामाजिक सम्मान दिए व उनके साथ आर्थिक न्याय किए कैसे समतामूलक समाज की स्थापना हो सकेगी? “राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी की हो संतान/ बिड़ला या ग़रीब का बेटा, सबको शिक्षा एक समान” महज चुनावी नारा या जुमलेबाजी नहीं है, बल्कि एक संकल्प और लक्ष्य है, जो आज तक पूरा नहीं हो पाया है।
आज भी पार्टी किसी दलित को अपना महासचिव बनाने में इतना क्यों सकुचाती-शर्माती है, यह भी समझ से परे है। हर महत्वपूर्ण कार्यक्रम, सर्वदलीय बैठक, विपक्षी जमावड़े के मौक़े पे डी. राजा नज़र आते हैं, राष्ट्रीय सचिव हैं; मगर वो पार्टी को चला सकें, उस अपेक्षित विवेक का दर्शन पार्टी उनमें क्यूं नहीं कर पा रही है, यह एक रहस्य है। 1925 में स्थापित पार्टी ने जैसे जय भीम कहने में इतने साल गुज़ार दिए, वैसे ही आने वाला वक़्त इससे जय मंडल भी कहलवाएगा। पिछड़ों-पसमांदाओं-दलितों-आदिवासियों-अक़लियतों को दरकिनार कर इस देश में कोई भी पार्टी, इस मुल्क की नीतियाँ निर्धारित नहीं कर सकती। यहाँ जब मंचीय व्याकरण भी देखेंगे, तो चंद जातीय समूहों के चेहरे ही आपको नज़र आएंगे। वक्ता विशेषाधिकार प्राप्त लोग, और श्रोता दबे-कुचले लोग। यह ब्राह्मणवादी सिलसिला कब उलटेगा या अनंतकाल तक कुछ ख़ास लोगों को ही विद्वान व सर्वगुणसंपन्न समझा जाता रहेगा? जिनके पास सदियों से न सोशल कैपिटल है न कोई और कैपिटल, उनके हाथों में बागडोर कब आएगी, कब तक साज़िशन उन्हें नेपथ्य में धकेला जाता रहेगा? शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना के साथ प्रतिनिधित्व के मामले में अगर सही मायने में ईमानदारी बरती जाए, तो यह भी तय होना चाहिए कि बोलने वाले बस बोलेंगे नहीं, सुनेंगे भी और अरसे से शालीन श्रोता बने मूकनायक मंच पर बोलेंगे भी और बोलते चले आ रहे लोग बिना ऊधम मचाए, नाक-भौं सिकोड़े सुनेंगे भी।
संगठन व पार्टी का विस्तार हो, इसके लिए प्रयास कम किया जाता है, लेकिन सुप्रशिक्षित व समर्पित लोगों को बाहर होने के लिए मजबूर किए जाने में ज़्यादा दिलचस्पी दिखाई जाती रही है। पिछले वर्षों में बिहार में पार्टी के कई ज़िले के सचिवों ने इस्तीफ़ा दिया, दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर और राज्य स्तर पर (लगभग पूरी स्टेट लीडरशीप) एआईएसएफ के नेतृत्वकारी भूमिका में रहे लोगों ने बड़ी संख्या में इस्तीफ़ा दिया। पार्टी की पूरी संरचनात्मक व्यवस्था में खोट है जहाँ विरोध के स्वर नाक़ाबिले-बर्दाश्त हैं और संगठन व पार्टी को खोखला करने वाले वाले लोगों को प्रोन्नति व प्रोत्साहन दिया जाता रहा, उनकी पीठ थपथपाई जाती रही। नेतृत्व में बैठे लोगों ने “छोटा परिवार, सुखी परिवार” की नीति अपना रखा है। जब संगठन की दो महिला साथियों – राहिला परवीन और रूबी सिंह के साथ देश के हमारे तथाकथित लोकप्रिय छात्र नेता द्वारा 2016 में बदतमीज़ी की गई, अपमानजनक शब्द कहे गए, तो लैंगिक न्याय के प्रति हमारी पूरी संकल्पना हिलने लगी, जेंडर जस्टिस कोई रेटरिकल कमिटमेंट नहीं है।
कॉमरेड, मौजूदा हालात में जबकि ‘ज्ञानी-ध्यानी’ लोगों ने पूरे तंत्र को हाइजैक कर रखा है, पूरा संगठन वन मैन शो बन के रह गया है, शक्ति-संतुलन के नाम पर मुझे धमकी दिलवाई गई, इन गुंडों से मेरी जान पर ख़तरा है, बहुत घुटन का माहौल है; एकोsहं द्वितीयोनास्ति के छिछले रंगढंग से संगठन चलाया जा रहा है, सेक्रेटेरिएट को बाइपास करके डिक्टेशन कहीं और से दिया जा रहा है, अव्यवस्था फैलाई जा रही है, پسماندہ اور جاہل لوگوں کی قیادت نام نہاد اونچی ذات اور ایلیٹ کلاس کے کامریڈوں کو قابل قبول نہیں۔ اعلیٰ ذات کی لابی کی طرف سے حقارت اور حقارت کی نگاہ سے دیکھا جاتا ہے۔; ऐसे में मेरा अपने पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। मैं अपने मान-सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं कर सकता और न ही उपर्युक्त ब्राह्मणवादी संरचनात्मक गड़बड़ियों को बर्दाश्त करने की स्थिति में हूँ। अतः मैं एआइएसएफ, میں جے این یو یونٹ کے سکریٹری کے عہدے اور تنظیم اور پارٹی کی بنیادی رکنیت سے استعفی دے رہا ہوں۔ مجھے تنظیم اور جماعت کی ہر قسم کی ذمہ داریوں سے آزاد سمجھا جائے۔
جینت کمار,
جے این یو یونٹ
12/08/2018
کاپی:
قومی جنرل سیکرٹری/صدر, اے آئی ایس ایف
قومی انچارج, طالب علم ونگ, cpi
ریاستی سکریٹری/صدر, اے آئی ایس ایف, دہلی
राज्य सचिव, cpi, دہلی
शाखा सचिव, جے این یو
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