گھر حالت بہار & جھارکھنڈ BBC اور مینا كوٹوال: بہوجن خاتون صحافی کے ذات پات تشدد کی کہانی, پارٹ -3

BBC اور مینا كوٹوال: بہوجن خاتون صحافی کے ذات پات تشدد کی کہانی, پارٹ -3

میں اور بی بی سی- 3

ट्रेनिंग खत्म हो चुकी थी. दो अक्टूबर को मैं और मेरे साथ जॉइन करने वाले सभी ऑफ़िस पहुंच चुके थे. न्यूज़रूम में ये हमारा पहला दिन था. बीबीसी के लिए ये दिन बहुत ख़ास था क्योंकि इस दिन बीबीसी हिंदी का टीवी बुलेटिन शुरू हो रहा था, जिसके उपलक्ष्य में बीबीसी के डायरेक्टर जनरल टॉनी हॉल दिल्ली ऑफिस आए थे. ऑफिस में माहौल किसी त्यौहार से कम नहीं था.

टॉनी हॉल ने सभी से एक-एक कर हाथ मिलाया. उनका इस तरह मिलने का अंदाज अच्छा लगा. न्यूज़रूम में माहौल एकदम ‘कूल’ बनाया हुआ था. सभी जगह हाहा-हीही की आवाज सुनाई पड़ रही थी. देखने में तो लग रहा था कि सब लोग कितने अच्छे हैं, बॉस के साथ भी माहौल को हल्का बनाया हुआ है. इसी बीच परिचय का सिलसिला भी चल रहा था.

अब धीरे-धीरे सबकी शिफ्ट लगनी शुरू हो गई थी. कोई रेडियो में गया तो कोई टीवी में. किसी को मनोरंजन और खेल मिला तो किसी को कुछ. मेरे हिस्से आया डेस्क.

यहीं से वो सब शुरू हुआ जो मुझे बेहद अज़ीब लगा. बीबीसी आने से पहले यहां के बारे में बहुत सुना भी था और पढ़ा भी था. बीबीसी के लिए एक सेट और सकारात्मक सोच बनी हुई थी. लेकिन वो समय के साथ-साथ धुंधली होने लगी. वो लोग जिन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी एक अच्छी पहचान बना रखी है, जिन्हें बहुत लिबरल/प्रोग्रेसिव समझा जाता था, जिन्हें पढ़कर लगता था कि ये हर किसी के लिए कितना अच्छा सोचते हैं. मुझे भी इनके जैसा पत्रकार बनना है. मैं भी अपने जीवन में उन लोगों के काम आना चाहती थी जिन्हें कहीं जगह नहीं मिलती. उनकी आवाज़ बनना चाहती थी जिनकी कोई नहीं सुनता.

वंचित और शोषितों के लिए पत्रकारिता करने वाला बीबीसी अंदर से मुझे कुछ और ही लगा. यहां भी वे लोग मौजूद थे, जो इनके नाम पर अपना पेज़ और नाम तो चमकाना चाहते हैं लेकिन न्यूज़रूम में इन्हें बर्दाश्त नहीं करना चाहते थे.

यहां महिला विरोधी, दलित विरोधी टिप्पणी भी होती थी और उनका मज़ाक भी बनाया जाता. कई बार इस तरह की टिप्पणी वो इतनी आसानी से कर देते कि मैं सोच में पड़ जाती कि कितना कुछ है इनके मन में. शायद एक मर्यादा के तहत बंधे होने के कारण ये अपने लेखन में वो बाते ना ला पाते हो, पर उसे जुबां पर लाने से रोक पाना इनके बस में नहीं था.

इनके लिए वो सब एक मज़ाक होता, माहौल को हल्का करने का साधन लेकिन उस मज़ाक में उन सबकी सोच की बू आती थी. जिन्हें आदर्श समझा था वो तो कुछ और ही निकले. और इस दरमियां शुरू हुआ मेरी जिंदगी का एक नया अध्याय.

جاری ہے…اگلے مضمون میں اس مزید مضمون کو پڑھیں, जो पार्ट-4 करके होगा।

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