Home Opinions रिपोर्ट में खुलासा, आप मेहनत करके खुद को खपा रहे हो और मलाई देश के अमीर लोग खा रहे हैं?
Opinions - Social - State - February 1, 2018

रिपोर्ट में खुलासा, आप मेहनत करके खुद को खपा रहे हो और मलाई देश के अमीर लोग खा रहे हैं?

रजत ~

विमर्श। अंतर्राष्ट्रीय अधिकार समूह ऑक्सफैम के एक नए सर्वेक्षण के मुताबिक, 2017 में भारत की कुल आय का 73% हिस्सा भारत के सबसे धनी 10% लोगों के पास है। रिपोर्ट के निष्कर्षों जिनमें पिछले साल प्रसिद्ध अर्थशास्त्री लुकास चांसल और थॉमस पेक्टेटी द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट भी शामिल है। इसमें वह मजबूती से कहते हैं कि अमीरों ने उदारीकरण,निजीकरण और वैश्विकरण की नीतियों से असमान्य लाभ अर्जित किया है। जबकि अन्य मेहनतकशों को संघर्ष में छोड़ दिया गया है। इन दो अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रकाशित शोध पत्र भारतीय आय असमानता, 1922-2014: ब्रिटिश राज से अरबपति राज के नाम से पता चला है कि 1922 के बाद भारत में आय असमानता 2014 में सबसे अधिक रही। इसके अनुसार, 2014 में केवल 10% भारतीयों के पास भारतीय राष्ट्रीय आय का 56% हिस्सा था। पिछले 3 वर्षें में यह हिस्सा बढ़कर 73% हो गया है। पिछले साल के सर्वेक्षण में यह पता चला था कि भारत के सबसे धनी 1% देश की कुल संपत्ति का 58% हिस्सा थे जोकि लगभग 50% के वैश्विक आंकड़े से ज्यादा था। इस साल के सर्वेक्षण में यह भी पता चला है कि 2017 में भारत के सबसे धनी 1% की संपत्ति 20.9 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है जो वर्ष 2017-18 में केंद्र सरकार के कुल बजट के लगभग बराबर है।

रिवार्ड वर्क, नॉट वेल्थ नामक रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने अमीर वर्ग को विशाल पूंजी इकट्ठी करने में सक्षम बना दिया है, जबकि सैकड़ों करोड़ लोग आज भी गरीबी से संघर्ष कर रहे हैं। 2010 से अब तक अरबपतियों की संपत्ति में औसतन 13% की वार्षिक वृद्धि हुई है लेकिन साधारण श्रमिकों की औसत आय में सिर्फ 2% वार्षिक वृद्धि हुई है। आंकडे दिखाते हैं कि भारत में एक अग्रणी भारतीय परिधान फर्म के मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा एक वर्ष में की गई कमाई के बराबर कमाने के लिए एक मजदूर को 941 वर्ष का समय लगेगा। अमेरिका में यह असमानता और भी ज्यादा है,वहां एक सीईओ एक कार्यदिवस में एक साधारण कार्यकर्ता की वार्षिक आमदनी जितना कमाता लेता है। यह वैश्विक उदारवादी और पूंजीवादी नीतियों का नतीजा है।

ऑक्सफ़ैम ने 10 देशों में किए गए 70,000 लोगों के वैश्विक सर्वेक्षण के परिणाम का हवाला देते हुए कहा कि यह परिणाम असमानता के खिलाफ करवाई की जरूरत दिखाता है।

इसमें दो-तिहाई उत्तरदाताओं का मानना है कि अमीर और गरीबों के बीच के अंतर के प्रति तत्काल ध्यान देने की जरुरत है। अमेरिका, ब्रिटेन और भारत जैसे देशों के सर्वेक्षण उत्तरदाताओं ने सीईओ के लिए 60% वेतन में कटौती का भी समर्थन किया है। श्रमिक अधिकारों और पर्यावरण को ताक पर रखकर कॉरपोरेट बॉस के लिए पुरस्कार देना, सरकारी नीतियों पर बड़े कारोबार का अत्यधिक प्रभाव और शेयरधारकों को प्रभावित करने के लिए अधिक मुनाफे की होड़ ने इस असमानता को पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां दी हैं।

ऑक्सफैम इंडिया ने भारत सरकार से यह सुनिश्चित करने के लिए आग्रह किया कि देश की अर्थव्यवस्था हर किसी के लिए काम करे, न कि केवल कुछ पूंजीपतियों के लिए। आज सरकार को श्रमिक क्षेत्रों को प्रोत्साहित करके समग्र विकास को बढ़ावा देने की जरूरत है,जो अधिक नौकरियां पैदा करेगा। कृषि में निवेश करना और मौजूद सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने की भी जरूरत है। जानकार लंबे समय से टैक्स चोरी के खिलाफ कड़े कदम उठाने, अमीरों पर अधिक कर लगाने और कॉरपोरेट टैक्स रोक हटाने की मांग कर रहे हैं।

ऑक्सफैम के मुताबिक भारत में पिछले वर्ष 17 नए अरबपतियों बने हैं और अरबपतियों की कुल संख्या 101 हो गई। इनमें से 37% भारतीय अरबपतियों को परिवार की संपत्ति विरासत में मिली है।

ऑक्सफैम इंडिया की सीईओ निशा अग्रवाल कहतीं है कि ”यह चिंताजनक है कि भारत में आर्थिक विकास का लाभ कम हाथों में केंद्रित होना जारी है। अरबपति बूम एक संपन्न अर्थव्यवस्था का संकेत नहीं है, बल्कि असफल आर्थिक व्यवस्था का एक लक्षण है जो सिर्फ अमीरों के लिए काम कर रही है”। सवाल है कि क्या मेहनतकाश लोग सिर्फ चंद पूंजीपतियों के ऐशो-आराम के लिए अपने आप को खपा रहे हैं? खैर आंकड़े यही दिखाते हैं।

मोदी सरकार ने नोटबन्दी करते समय अमीरों के काला धन पकड़ने की बात कही थी लेकिन नोटबन्दी और अन्य योजनाओं के बावजूद ये असमानता अप्रत्याशित रूप से 2013 के 49% से बढ़कर 2017 में 73% हो गयी है। ये वर्तमान की उन पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के असफल होने की परिचायक है जो हर नागरिक को 6 आधारभूत सुविधाओं- रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थय और सम्मान से महरूम रखती है। स्तिथि चिंताजनक है और सरकार को जल्द संज्ञान लेना होगा। अन्यथा आर्थिक विषमता और सरकारी दमन के विरोध में हुई कालजयी क्रांतियों से सभी परिचित हैं।

डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। लेखक रजत आईआईएमसी में मीडिया के छात्र हैं। इस लेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति National India Newsउत्तरदायी नहीं है। इस लेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।

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