ઘર સામાજિક શિક્ષણ જેએનયુ જેવી સંસ્થાઓ સેવ શા માટે તે મહત્વનું છે?

જેએનયુ જેવી સંસ્થાઓ સેવ શા માટે તે મહત્વનું છે?

जेएनयू में मेरे कई दोस्त हैं जो बहुजन, ओबीसी और मुस्लिम समाज से आते हैं. ‘बहुजन साहित्य संघमें जब मैं पैनलिस्ट के तौर पर गई थी, तो वहां कई ऐसी बहुजन लड़कियों से मुलाक़ात हुई, जो हजारों साल से हो रहे अन्याय के खिलाफ़ मुखर होकर बोल रही थीं. वो सुना रही थी अपने साथ हुई उन कहानियों को, जिनमें संघर्ष ही संघर्ष था और जो बदस्तूर अभी भी जारी है. ज्यादातर लड़कियां मेरी ही तरह अपने घर-परिवार की पहली पीढ़ी थी, जो पढ़-लिखकर और संघर्ष कर यहां तक पहुंची थी. अब ये लड़कियां ना केवल बोल रही थीं, बल्कि ख़ुद के लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बन रही थीं.

कविता पासवान, आफ़रीन, रजनी अनुरागी, अनिता भारती, रेणु चौधरी, नीतिशा खलखो, सरिता माली, कनकलता यादव, जैसी कई बहुजन महिलाएं सदियों से हो रहे अन्याय के ख़िलाफ़ जेएनयू में दहाड़ रही थीं. जहां तक मुझे महसूस हुआ, वहां मौजूद महिलाओं में से ज्यादातर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. बाबा साहब अंबेडकर से साहस पाकर और मंडल साहब की संघर्ष की बदौलत वे लड़कियां जेएनयू तक का सफ़र तय कर पाने में सफ़ल हो पाई हैं.

जिन जातियों से ये महिलाएं थी उनकी जाति सुनकर आपकी भौहें जरूर सिकुड़ जाती हैं. लेकिन जेएनयू-जामिया ने उन्हें बोलने की हिम्मत दी है क्योंकि इन लोगों की बहस का हिस्सा ना कोई बनना चाहता है और ना कोई इनपर बात करना चाहता है (हां अपना नाम और चैनल चमकाने के लिए थोड़ा बहुत प्रोग्रेसिव जरूर दिख जायेंगे).

ये सभी लड़कियां अपने गांव-घर की पहली पीढ़ी से हैं, जो जेएनयू और जामिया जैसे संस्थानों में पहुंच पा रही हैं. सिर्फ फीस कम होना ही जेएनयू में दाख़िले की वज़ह नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय के लिए लड़ने का रास्ता इन संस्थानों से होकर गुजरता है.

अगर बाबा साहेब को एक समय पर पढ़ने से रोक दिया जाता तो क्या आज का भारत ऐसा होता? बेइंतहां तकलीफ़ और धिक्कार के बाद बाबा साहेब ने पढ़ाई नहीं छोड़ी और भारत को कैसे एक करना है उसका रास्ता ना केवल खुद ढ़ूढ़ा बल्कि हम जैसों के लिए बनाकर भी गए.

हम लड़कियां जो आज लिख-बोल पा रही हैं वो जेएनयू और जामिया जैसे संस्थानों की वजह से ही संभव हो पाया है. सरकार आज इन संस्थानों को कमजोर नहीं कर रही, बल्कि लोकतंत्र को कमजोर कर रही है.

इनके संघर्ष को अगर समझना है तो हमारे साथ आओ और साथ में काम करके दिखाओ. मैं आपको ये नहीं कहूंगी कि आपको डोम, મોચી, धोबी, मुसहर, पासी की बस्ती में रहना है तभी कुछ समझ पाओगे. ना आपको बिल्कुल ऐसा नहीं करना. बस आप इतना कर दीजिए तथाकथित सवर्ण कॉलोनी में डोम, મોચી, मुसहर, पासी, दुसाध जैसा कुछ बनकर रहना है और ऐसा ही सरनेम लगाना है. फिर हक़ीकत और संघर्ष आपके सामने होगा, जहां आपको गरीबी के आधार पर नहीं आपकी जातिय पहचान के आधार पर आपको दुत्कारा जायेगा. गरीबी आप मेहनत कर के दूर कर सकते हैं, जाति का क्या करोगे साहेब!

एक बार सवर्ण से चमार बनो और निकल पड़ो एक नई नौकरी की तलाश में. और अगर किसी ने डायवर्सिटी के नाम पर आपको रख भी लिया तो अपने ख़िलाफ़ होने वाले अन्याय के लिए आवाज़ उठा कर दिखाओ, फिर देखो कैसे तुम्हें भीड़ से अलग-थलग कर दिया जायेगा. गरीबी और जातिय भेदभाव का संघर्ष सामने दिख जायेगा.

સારું, अभी वक्त है जेएनयू जैसे संस्थान को बचाने का. आख़िर में, हमारे लिए लिखते और बोलते तो आप सब बहुत हैं और इस पर वाह-वाही भी खूब बटोरते हैं. लेकिन पीछे से हमारे लिए क्या सोचते हैं और कैसे गाली देते हैं, आपके इस षडयंत्र को सोचने और समझने की शक्ति भी जामिया और जेएनयू जैसे संस्थान की ही देन है. इसलिए इन संस्थानों को बचाइए ताकि लोकतंत्र बचा रह सके और बाबा साहेब का सपना साकार हो सके.

( यह लेख मीना कोटवाल के फेसबुक से लिया गया हैતેના બદલે ધર્મમાં. હું તેમને હવે નેશનલ ઇન્ડિયા ન્યૂઝ સાથેફેસબુકTwitter પર અનેYouTube તમે કનેક્ટ કરી શકો.)

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