گھر حالت دہلی قومی دارالحکومت علاقہ ماتا ساویتری بائی فول جس کی جدوجہد نے خواتین کے لئے تعلیم کے دروازے کھول دیئے
ماتا ساویتری بائی فول جس کی جدوجہد نے خواتین کے لئے تعلیم کے دروازے کھول دیئے
صرف دشمن خود ہے,
ہم مل کر اسے باہر پھینک دیں گے,
उसके सिवा कोई शत्रु नहीं,
बताती हूँ उस शत्रु का नाम,
सुनो ठीक से उस शत्रु का नाम,
वो तो है अविद्यारूपी ‘अज्ञान’
देश की प्रथम महिला शिक्षिका माता सावित्री बाई फुले की उपरोक्त लाइन यह बताने के लिए काफी हैं कि महिला शिक्षा के क्षेत्र में उनका कैसा योगदान रहा! भारत में सदियों से पुरुषों द्वारा महिलाओं को गुलाम बनाकर उनका शोषण होता रहा है। हमारे धार्मिक ग्रथों में भी महिलाओं की स्थिति को अत्यंत ही दयनीय रुप दर्शाया गया है। तुलसीदासजी ने तो यहां तक लिखा है कि ढोल, गंवार, شودر, पशु, नारी ये सब है ताड़न के अधिकारी। मनुस्मृति में बताया गया है कि महिलाओं की रक्षा बचपन में पिता, युवास्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र करते हैं। महिला स्वतंत्र रहने योग्य नही है। महिलाओं की इस तरह की स्थिति 18वीं सदी तक जारी रही। महिलाओं की इस दयनीय स्थिति को उभारने का कार्य सर्वप्रथम महाराष्ट्र के पुना में जन्में महामना ज्योतिबा फूले और उनकी पत्नि आयुष्यमती सावित्रबाई फूले ने किया।
उस वक्त महिलाओं और बहुजनों का पढ़ना मर्दवादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ माना जाता था, लेकिन अशिक्षा के घोर अंधकार में महिलाओं के लिए शिक्षा की पैरवी करने वाली कवि, महान समाज सेविका, और देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले ने यह व्यवस्था पूरी तरह बदलने का निर्णय लिया और आगे चलकर उनके सपनों को संविधान में मूलरुप देकर साकार किया बाबा साहेब डॉ बीआर अंबेडकर ने, बाबा साहेब ने हर क्षेत्र में महिलाओं को संविधान में बराबर हक, अधिकार देने का प्रावधान किया। जिसकी बदौलत आज हमारे देश में जो महिलाएं सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित मानी जाती थीं, वो देश के ऊंचे से ऊंचे पदों पर आसीन हुईं, महिलाएं पत्रकार, वकील, डॉक्टर, प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं बल्कि इस देश का हुक्मरान भी बनीं, प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री से लेकर राष्ट्रपति जैसे पदों तक पहुंची।
महिलाओं को ऐसी शक्ति और शिक्षा के लिए द्वार खोलने वाली माता सावित्री बाई फुले का आज जन्मदिन है। 3 جنوری 1831 को क्रांतिज्योति राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले का जन्म हुआ था। इस दिन को हम “नारी मुक्ति दिवस” के रूप में भी मनाते हैं। 1 جنوری, 1848 को सावित्री फुले ने पुणे में पहले गर्ल्स स्कूल की स्थापना की थी। भारत की इस महान नायिका ने अपना पूरा जीवन दबे- कुचले, استحصال- पीड़ित, दीन-हीन लोगों को शोषण से मुक्ति और अविद्या रूपी अंधकार को मिटाने में लगा दिया। माता सावित्री बाई जब कन्या पाठशाला में लड़कियों को पढ़ाने जातीं थी तो शूद्रों और नारी शिक्षा के विरोधी उन पर पत्थर और गोबर फेंका करते थे। भारत की शोषित पीड़ित और अधिकारों से वंचित महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के कार्य में उनका अग्रिम और शीर्ष स्थान है। अज्ञान को मिटाकर ज्ञान की ज्योति जलाने वाली माता सावित्री बाई का एक ही मूलमंत्र था सबको मिले शिक्षा का अधिकार यही है मानव की तरक्की का आधार। उन्होंने विधवा विवाह की परंपरा शुरु की। 29 جون 1853 में बाल-हत्या प्रतिबन्धक गृह की स्थापना की, इसमे विधवाएँ अपने बच्चों को जन्म दे सकती थी और यदि शिशु को अपने साथ न रख सकें तो उन्हें यहीं छोड़कर भी जा सकती थीं। इस अनाथालय की सम्पूर्ण व्यवस्था माता सावित्री बाई फुले खुद संभालती थीं और बच्चों का पालन पोषण माँ की तरह करती थी। इस प्रकार माता सावित्री बाई फुले ने महिला शिक्षा की अलख जगाकर सबके लिए शिक्षा के द्वार खोल दिए।
-سشیل کمار
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