घर सामाजिक एससी-एसटी वर्ग के छात्रों को यूनिवर्सिटी जानबूझकर बना रही है निशाना ?

एससी-एसटी वर्ग के छात्रों को यूनिवर्सिटी जानबूझकर बना रही है निशाना ?

करून: अंकुर सेठी

देश में इतने सारे मुद्दे और उन सबमें खास मजहबी मुददों पर लंबी-लंबी डिवेट और बहस होती रहती है लेकिन मैंने एक ऐसे मुद्दे को लेकर यह लेख लिखा है जिसमें सैकड़ों हजारों बहुजन छात्रों की जिंदगी आज इन बहुजन विरोधी सरकारों और युनिवर्सिटी मालिकों की वजह से बर्बादी की कगार पर है!

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद मंडल की एक बहुत बड़ी यूनिवर्सिटी है जिसका नाम है तीर्थाकांर महावीर युनिवर्सिटी। जहां कम आय वाले परिजनों के बच्चों व गरीब एससी-एसटी छात्रों को स्कॉलरशिप के नाम पर फ्री एडमिशन कराया गया। कॉलेज प्रशासन के द्वारा छात्रों से कहा गया कि यदि उनके परिजन की दो लाख रुपये से कम आय है तो उनसे कोई फीस नहीं ली जाएगी, पूरी पढ़ाई फ्री में कराई जाएगी। B-tech, Mass comm, polytechnic, Bsc, Bca आदि तरह के कोर्स में एडमिशन दिलाया गया। 2013-16, 2012-16, 2011-15 तक के बैच में सैकड़ों छात्रों ने एडमिशन लिया और आखिरी सेमिस्टर तक अपनी पढ़ाई पूरी कर ली फिर उसके बाद असली खेल शुरू हुआ। उनको स्नातक डिग्री देने के नाम पर उनसे कोर्स के हिसाब से 50,000 पासून 2,00,000- 3,00,000 रुपये तक की मांग की गई। उन सभी एससी-एसटी छात्रों में कोई गरीब किसान का बेटा है तो कोई मजदूर का। कुछ तो ऐसे हैं जिनके खानदान से कोई पहली बार बड़ी यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने, डिग्री पूरी करने गया था।

तो क्या वे इतनी मोटी रकम चुका पाएँगे? वर्ष 2018 तक उनके हाथों में डिग्री नहीं आयी। वे यूनिवर्सिटी के आगे गिड़-गिड़ा कर थक गए। पचासों चक्कर लगाए, दूसरे प्राइवेट-सरकारी कॉलेजों से आगे मास्टर डिग्री की पढ़ाई के लिए दुहाई की पर उन्हें हर बार उनके (छात्रों) द्वारा साइन किये हुए फॉर्म को दिखा कर टरका दिया गया जो एडमिशन के समय उनसे भरवा लिया गया था कि सरकार छात्रवृत्ति नहीं भेजेगी तो हम आपसे पैसा वसूलेंगे। तो इस तरह सरकार और यूनिवर्सिटी ने इन छात्रों को अपने इस खेल में पीस कर मसल दिया। बहुजन छात्रों के साथ के तमाम छात्रों ने मास्टर डिग्रियाँ पूरी कर लीं, तो कुछ पीएचडी की भी तैयारी में लग गए, पर दूसरी ओर उन छात्रों का गरीब, मजलूम छात्रों का दर्द किसी राजनेता, एक विचारवंत, वृत्तपत्र, मैग्जीन या न्यूज़ चैनल को नहीं दिखा। जिनको 6 साल बाद भी स्नातक की डिग्री नहीं मिली।

न जाने कितने छात्र अवसाद में हैं तो कितने बंद कमरों में रो रहे हैं। उनमें से अधिकतर छात्र डिग्री न होने के कारण न तो आगे की पढ़ाई कर पाए न ही नॉकरी, सिर्फ 10% का आँकड़ा होगा जिन्हें छोटी-मोटी जॉब मिल गयी हो! और इस का हाल दूसरी युनिवर्सिटी में भी देखा जा रहा है जहां एससी-एसटी के छात्रों की स्कॉलरशिप रोककर उनकी जिंदगी से खिलबाड़ किया जा रहा है। यह तो जाहिर कि घटनाक्रम में सरकार और कॉलेज प्रशासन की मिलीभगत से यह गेम खेला जा रहा है।

न जाने कितने छात्र- छात्राएं सरकार की इस उपेक्षा की वजह से काल के गाल में समाने पर मजबूर हैं। भविष्य में यह संख्या हजारों से लेकर लाखों तक में हो सकती है, अगर यह अन्याय नहीं रुका तो बर्बादी और बढ़ेगी, बढ़ती ही चली जाएगी। इसलिए सरकारों को चाहिए कि उन छात्रों का दर्द महसूस करें और उनकी रोकी गई स्कॉलरशिप को भेजा जाए जिससे वो अपने जीवन कामयाब बना सकें। साथ ही इस संबंध में यूनिवर्सिटी प्रशासन को सरकार से छात्रों की रोकी गई स्कॉलरशिप को लेकर मांग करनी चाहिए।

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