Home Social सेना की आलोचना पर शेहला रशीद पर देशद्रोह का केस :सेना को पवित्र गाय, घोषित करने के निहितार्थ
Social - September 12, 2019

सेना की आलोचना पर शेहला रशीद पर देशद्रोह का केस :सेना को पवित्र गाय, घोषित करने के निहितार्थ

By-डा.सिद्धार्थ रामू

सेना की आलोचना पर शेहला रशीद पर देशद्रोह का केस :सेना को पवित्र गाय, घोषित करने के निहितार्थ चीजों को पवित्र गाय घोषित कर उन्हें संदेह और तर्क से परे मानने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। इसमें पारलौकिक और लौकिक दोनों चीजें शामिल हैं।

आजकल सेना को पवित्र गाय साबित करने की पूरे देश में होड़ लगी हुई है। इसके कृत्यों- कुकृत्यों पर कोई, चाहे वे कितने ही जघन्य क्यों न हो, प्रश्न उठाना सबसे बड़ा जुर्म बन चुका है, प्रश्न उठाने का मतलब अपने को देश-द्रोहियों की कतार में शामिल कर लेना और सड़क छाप संघी देश भक्तों से लेकर भारत सरकार के कोप का शिकार होना। आजकल तो देश भक्ति का सर्टिफिकेट हर संघी (RSS) और भाजपाई अपनी जेब में लेकर घूम रहा है।

भारतीय सशस्त्र सेनाओं की पवित्रता की वास्तविकता पर थोड़ी निगाह डाल ली जाए। देश में कुल 14 लाख 81 हजार 953 की संख्या में सशस्त्र सेनाएं हैं। यह आम धारणा है कि ये सैनिक विदेशी शक्तियों से देश की सुरक्षा में लगे हुए हैं जबकि सच्चाई यह है कि सशस्त्र सेनाओं का बड़ा हिस्सा ( लगभग 5 लाख) पूर्वोत्तर के छः राज्यों ( सिस्टर स्टेट ) और जम्मू- कश्मीर में अपने ही देश के भीतर लगी हैं क्योंकि यहां की जनता से देश की एकता- अखण्ता को खतरा है। तथ्थों और साक्ष्य की थोड़ी भी जानकारी रखने वाला व्यक्ति यह जानता है कि भारत के इन राज्यों में कहने के लिए नागरिकों के मूल अधिकार हैं और वे लोकतांत्रिक शासन से संचालित होते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि यहां एक प्रकार की सैनिक तानाशाही है, स्पेशल पावर एक्ट के तहत सेना को यह अधिकार है कि वह किसी भी मौलिक- लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकती है, बिना अदालती वारंट के किसी को गिरफ्तार कर सकती है,किसी के घर में तलाशी के नाम पर जब चाहे घुस सकती है, किसी को आधी रात को उठा सकती है, हो सकता है कि वह व्यक्ति फिर कभी वापस न आए,लापता हो जाए। यहां तक की इनकाउंटर के नाम पर किसी की हत्या कर सकती है। इस एक्ट के तहत सशस्त्र सेनाओं को सुरक्षा प्राप्त है कि उनकी किसी भी कार्रवाई के लिए उन पर देश की अदालतों में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और उन्हें अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। इस सब का तो उन्हें कानूनी अधिकार प्राप्त है, लेकिन सेना इन कानूनी अधिकारों से परे क्या-क्या कुकत्य करती है, यह जगजाहिर हो चुका है। इसका एक प्रमाण तब सामने आया, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के ही सेवानिवृत न्यायाधीश संतोष हेगड़े के नेतृत्व में 2013 में एक समिति बनाई ( जिसमें पूर्व चुनाव आयुक्त लिंगदोह और उच्चपदस्थ पुलिस अधिकारी थे) इस समिति ने मणिपुर में सेना द्वारा किए गए छः इनकाउंटरों की सच्चाई की जांच की। इस जांच में पाया गया कि सभी इनकाउंटर फर्जी थे। इन राज्यों में तथाकथित पवित्र सेना देश की एकता-अखण्डता की रक्षा के नाम पर क्या- क्या करती है, कैसे निर्दोषों को फर्जी इनकाउंटर में मार गिराती है, महिलाओं के साथ बलात्कार करती है,इस बात को भी मणिपुर की ही महिलाओं के नग्न प्रदर्शन और ‘ आओ हमारे साथ बलात्कार करो’ के ह्दयविदारक नारों और ईरोम शर्मिला के लंबे संघर्ष से समझा जा सकता है या कश्मीर की औरतें सेना की असली हकीकत बता सकती है, उन पर क्या बीत रही है वही जानती हैं, क्योंकि दूर बैठे तथाकथित देश भक्त और देश भक्ति की मांग करने वाले को वाह सेना, वाह सेना करने के अलावा क्या करना है।
बात सिर्फ इतनी नहीं है, हथियारों की दलाली में सेना अधिकारियों की संलिप्तता को कौन नहीं जानता है। सेना के अधिकारियों ने मकान एलाट कराने से लेकर कितने तरह के गैर कानूनी फायदे उठाते हैं, यह आए दिन उजागर होता रहता है। सेना के बारे में मीडिया, नेताओं और तथाकथित देशभक्तों का यह कहना कि लोग देश सेवा के लिए सेना में भर्ती होते हैं यह सबसे बड़े झूठों में से एक है, सेना में शामिल होने वाले अधिकांश सैनिक गांव- कस्बों में रहने वाले किसानों और निम्न मध्यम के बेरोजगार नौजवान है जो बेरोजगारी- कंगाली से बचने के लिए सेना में जाते हैं इनके पास इससे बेहतर रोजगार का कोई अवसर हो तो, इनमें से अधिकांश सेना की ओर झांके भी न। एक प्रतिष्ठित पत्रकार से शब्द उधार लेकर कहें तो ये युद्धकर्मी हैं।


सच तो यह है कि भारत-पाकिस्तान के शासक वर्ग अपने-अपने स्वार्थों और राजनितिक हितों के लिए गांव- जवार के गरीबों-किसानों के बेटों को कुछ चंद रूपए देकर युद्धकर्मी के रूप में भर्ती करते हैं,मारने और मरने के लिए तैयार करते हैं,चंद रूपयों के लिए हुई उनकी मौत को गरिमामण्डित करने के लिए शहीद आदि के तमगे प्रदान करते हैं और सैनिक की मौत का किसानों की आत्महत्या की तरह मुआवजा देते हैं। दुनिया भर के शासक यही करते है। अगर सैनिक बनना इतना बड़ी देशभक्ति और देश सेवा है तो यह काम करने 99 प्रतिशत किसानों और निम्नमध्यमवर्गीय लोगों के बेटे ही क्यों जाते हैं अमीरजादों के बेटे अपने घरों में एय्याशी क्यों करते रहते हैं और मध्यवर्ग से कुछ एक जाते भी हैं तो अफसर बनकर, जो शायद ही किसी संघर्ष में मारे जाते हों, ऐसी घटनाएं तो कभी- कभार ही होती हैं। तथाकथित शहीद तो ज्यादातर गरीबों के बेटे ही होते हैं। हर पवित्र गाय की तरह सेना को भी पवित्र गाय बनाने की कोशिश का मुख्य उद्देश्य यथार्थ को छिपाना ही है।
( राजकिशोर जी के संपादन में आधुनिक पवित्र गायें शीर्षक से प्रकाशित रविवार डाईजेस्ट पत्रिका में प्रकाशित मेरे लेख ( 2017) का एक अंश)

~डा.सिद्धार्थ रामू

वरिष्ठ पत्रकार

संपादक-फारवर्ड प्रेस

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Check Also

The Rampant Cases of Untouchability and Caste Discrimination

The murder of a child belonging to the scheduled caste community in Saraswati Vidya Mandir…