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Social - State - February 1, 2018

‘स्वरा भास्कर ने योनी और भंसाली की तारीफ के पीछे जातिवाद के मुद्दे को दबा दिया’

रिया सिंह

विमर्श। स्वरा भास्कर का संजय लीला भंसाली के लिए लिखा गया ओपिन लेटर सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है और बहुत सारी महिलाएं उसको शेयर भी कर रही हैं। स्वरा का लेटर बिल्कुल उस प्रकार है जैसे कि संजय लीला भंसाली की फिल्म- ग्लैमर ज्यादा और कंटेंट कुछ भी नहीं। इस लेटर में सिर्फ तीन चीजें है-पहली, संजय लीला भंसाली की तारीफ, दूसरी स्वरा की दिली इच्छा भंसाली की फिल्मों में आने की और तीसरी VAGINA(योनी)। उनके लेटर के शीर्षक से उनके लिखे विचारों का कोई खास मेल नहीं है। लेटर के अंत में कुछ पंक्तियां हैं जिसमें उन्होंने वेजाइना शब्द का इस्तेमाल किया है। लेटर को पढ़कर लगता है कि न तो वो पूरी तरह भंसाली का विरोध करना चाहती है और न ही चुप रहना। मतलब ये है कि वो अपने मन की बात भी कह दें और अगर भविष्य में भंसाली के साथ काम करने का मौका मिले तो वो रास्ता भी खुला रहे। ऐसा हुनर शायद हर किसी में नहीं होता!

भंसाली की फिल्म की तरह ही स्वरा की बात में भी कुछ खास दम नहीं है। वो बहुत सरलता से अपने मतलब की बात कह गयीं और उन्होंने एक मात्र जो मुद्दा उठाया, वो था VAGINA (योनी)। स्वरा भूल गई कि उन्हें भंसाली से यह भी कहना चाहिए था कि उनकी फिल्में बेहद बेकार हैं और उनको समाज की बिल्कुल समझ नहीं है, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं कहा। ये फिल्म रिलीज होने से पहले एक न्यूज पेपर के फ्रंट पेज पे भंसाली ने एक एड छपवाया था, जिसमें लिखा था कि वो राजपूत महिलाओं की मान-मर्यादा के खिलाफ नहीं जाएंगे, वे उनकी इज्जत का पूरा ध्यान रखेंगे, और वो भली-भांती जानते हैं कि राजपूत महिलाओं की इज्जत उनके लिए क्या है। खैर स्वरा के लिए यह जरुरी सवाल है ही नहीं!

स्वरा ने अपने लेख में लिखा “MY IDENTITY WAS REDUCED TO MY VAGINA”, बेहतर होता अगर अपने लेख में हर जगह जहां-जहां उन्होंने अपना पक्ष लिया है वहां वो महिला की जगह राजपूत महिला या सवर्ण महिला लिखतीं। सवर्णों ने सभी महिलाओं को दलित का दर्जा दिया है परंतु यह बात सही नहीं है। एक ब्राह्मण/राजपूत/ठाकुर महिला और एक दलित महिला में कोई समानता नहीं है। समाज में जो दर्जा सवर्ण महिलाओं को खैरात में मिला है वो दलित महिलाओं को नहीं मिला। क्यों स्वरा जैसी महिलाओं के मुंह बंद हो जाते हैं जब फूलन देवी पर, भंवरी देवी पर बेहद ही घटिया फिल्में बनाई जाती हैं। तब कोई क्यों आवाज नहीं आती कि आपने इस फिल्म में उनकी वीरता नहीं दिखाई। जहां से इन महिलाओं के जीवन शुरु होते हैं वहां आपकी बनाई फिल्में खत्म हो जाती है। आपको दिखाना होता है उनका शोषण, उनकी लाचारी, इनकी वीरता और संघर्ष से आपका दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं होता।

स्वरा को एहसास नही है कि भारत में हर चीज के साथ जाति जुड़ी होती है सो फिर वो वेजाइना से भी जुड़ी है। बाबा साहेब ने अपने लेख में लिखा था “women are the gateways of caste” यही बात उमा चक्रवती ने भी 1993 में कही थी। इसका मतलब समझना बहुत आसाना है और शायद स्वरा भास्कर के लिए इतनी कठिन बात नहीं होगी। एक तरफ एक सवर्ण फिल्म मेकर जो कि बड़ा फिल्म मेकर है- राजपूत महिलाओं से माफी मांगता है वो भी जौहर जैसी क्रूर प्रथा के लिए। वहीं कुछ महिलाओं को उनके शरीर को सवर्ण जाति के पुरुष अपनी जागीर समझते हैं, ना उनके लिए दलित महिलाओं का बलात्कार एक जुर्म है, ना देवदासी प्रथा एक घिनौना अपराध। दूसरी तरफ अगर रिश्ता बनाने की बात हो तो हम दलित महिलाएं अछूत और गंदी हो जाती है जो शादी करने लायक तो नहीं होती पर अपनी हर प्रकार की वासना शांत करने, बलात्कार और शोषण करते वक्त उनको हम अछूत और गंदी नहीं दिखाई पड़ती हैं।

स्वरा जैसी हजारों महिलाएं हैं हमारे देश में जो न जाने क्या-क्या सोचती है, उनकी प्रोग्रेसिव सोच सेक्स, लिव इन रिलेशनशिप, बॉडी-शेमिंग, VAGINA(योनी) इत्यादी से आगे नहीं बढ़ पाती। पुरुषवाद को बनाए रखने वाली ब्राह्मणवादी संस्कृति और जाति-व्यवस्था के खिलाफ उनके मुंह से कभी कुछ नहीं निकलता है और यहीं पे इनके फेमिनिज्म और प्रोगेसिव सोच का खोखलापन दिख जाता है। वो अपने अनुसार अपने फायदे और नुकसान की बात करती हैं, अपने तरीके से महिला आंदोलन चलाती है, अपने पुरुषों और अपनी जाति बनाए रखने के लिए खूब जोर लगाती हैं। वो सब कुछ पाना चाहती है जो उनके लिए जरुरी है बिना समाजिक ढांचे को तोड़ते हुए क्योंकि सवर्ण जाति का प्रिविलेज तो बनाये रखना उनके फायदे में ही है न।

ऐसे लोग सहूलियत की राजनीति और आंदोलन चलाने के लिए माहिर होते हैं। वैसा ही कुछ स्वरा ने भी किया, जहां उनको सीधे-सीधे कहना चाहिए था कि भंसाली जी आपकी फिल्में बकवास हैं और महिलाओं को ऐसी फिल्में पूरी तरह बॉयकॉट करनी चाहिए। वहां उन्होंने बहुत ही चालाक तरीके से भंसाली की तारीफ करते हुए, बार-बार उनके हुनर को सराहते हुए धीमी सी आवाज में अपनी बात कह डाली। ताकि वो फेमिनिस्ट भी कहलाएं, प्रोफेशनली भी अपने आप को बचाये रखें और साथ ही में जाति के मुद्दे को VAGINA(योनी) की आढ़ में दबा दें। भारत में समाज की हर समस्या जातिवाद से जुड़ी है और अगर कोई ऐसे मुद्दे उठाता है पर जाति की बात करने से बचता है तो समझ लीजिए की या तो वो नासमझ और मूर्ख है या फिर अव्वल दर्जे का धूर्त है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। लेखक रिया दाकिनी सामाजिक कार्यकर्ता और पीएचडी स्कॉलर हैं। इस लेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति National India Newsउत्तरदायी नहीं है। इस लेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। साथ ही लेख में इस्तेमाल किए गया ‘दलित’ शब्द गैरसंवैधानिक होने की वजह से नेशनल इंडिया न्यूज इस्तेमाल नहीं करता है लेकिन चलन में होने की वजह से नहीं हटाया है।

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