ज़मीनों से बेदखल किए जाएंगे लाखों आदिवासी!

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Published By- Aqil Raza
By- सुदीप ठाकुर   ~

युद्धोन्माद और राष्ट्रवाद के उफनते दौर में यह खबर शायद सनसनी पैदा न करे। सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक आदेश से 16 राज्यों में दस लाख से भी अधिक आदिवासियों और अन्य वनवासियों को जंगल से बेदखल किया जा सकता है, क्योंकि केंद्र सरकार वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत उनके अधिकारों की रक्षा करने में नाकाम रही है। बिजनेस स्टैंडर्ड (https://goo.gl/qY1Eqm)

केंद्र सरकार ने आदिवासियों को तकरीबन 80 साल बाद मिले इस महत्वपूर्ण अधिकार से संबंधित वनाधिकार कानून का बचाव करना जरूरी नहीं समझा। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व वनाधिकारियों और कुछ एनजीओ की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए संबंधित राज्यों को 12 जुलाई तक ऐसे आदिवासियों को बेदखल करने के आदेश दिए हैं, जिनके दावे खारिज कर दिए गए हैं। कोर्ट ने देहरादून स्थित फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया को अतिक्रमण हटाने से संबंधित सैटेलाइट तस्वीरों पर आधारित रिपोर्ट जमा करने के लिए भी कहा है।

यूपीए सरकार के समय 2006 में आदिवासियों और पीढ़ियों से वनों में रह रहे अन्य वनवासियों को अधिकार देने के लिए वनाधिकार अधिनियम अस्तित्व में आया था। इसने औपनिवेशक काल के 1927 के वनाधिकार अधिनियम की जगह ली थी, जिसे अंग्रेजों ने प्राकृतिक संपदा से अकूत भारतीय वनों के अपने हित में दोहन के लिए बनाया था।

अंग्रेजों ने सबसे पहले भारतीय वन अधिनियम 1865 बनाया था,जो दरअसल भारत में औपनिवेशक शासन के विस्तार का जरिया ही था और इसके जरिये उन्होंने भारत के जंगलों पर कब्जा किया। बस्तर की जनश्रुतियों में यह कहानी सुनने को मिल जाएंगी कि किस तरह से अंग्रेजों की नजर बैलाडीला की लोहे की खदानों पर थी! आजादी के बाद यह काम सरकारों ने किया और फिर कॉरपोरेट ने या कह सकते हैं कि कॉरपोरेट की मिलीभगत से सरकारों ने।

यह जो विकास की मुख्यधारा है, दरअसल वह जंगलों से होकर ही गुजरती है और उसका सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है आदिवासियों को। 1998 में प्रकाशित Tribal Studies of India Series के खंड एक Antiquity to Modernity In Tribal India के एक अध्याय में वाल्टर फर्नांडीस ने विस्तार से बताया है कि किस तरह से विकास परियोजनाओं के कारण पूर्वी भारत में बड़ी संख्या में आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल होना पड़ा था। वह लिखते हैं कि संकुचित नजरिये से भी आकलन किया जाए, तो छठी पंचवर्षीय योजना तक 1.5 करोड़ लोग विस्थापित किए जा चुके थे! हालांकि इसके एवज में मुआवजे भी दिए गए, लेकिन वह पर्याप्त नहीं थे। मगर यहां तो मामला और भी गंभीर है। वनाधिकार अधिनियम के तहत आदिवासियों के अधिकारों का बचाव करने में खुद सरकार ही कोई रुचि नहीं दिखा रही है।

वनाधिकार अधिनियम, 2006 जब अस्तित्व में आया था, तो इसे आदिवासियों और अन्य वनवासियों के अधिकारों के संघर्ष में एक मील के पत्थर की तरह देखा गया था। ध्यान रहे, संविधान में पांचवी और छठी अनुसूची में आदिवासियों के अधिकार संरक्षित किए गए हैं, मगर यह विशेष क्षेत्रों में ही लागू हैं। वनाधिकार अधिनियम ने इसे और व्यापक बनाया है, लेकिन अब इस कानून का अस्तित्व ही खतरे में है।

वनाधिकार कानून को आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक के सेवानिवृत्त वनाधिकारियों और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया, द नेचर कंजरवेशन सोसाइटी, द टाइगर रिसर्च ऐंड कंजरवेशन ट्रस्ट और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने अलग-अलग अदालतों में चुनौती दी और इस कानून को अवैधानिक करार देने की मांग की। जनवरी, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने ये सारे मामले अपने पास मंगा लिए। डाउन टू अर्थ ( https://goo.gl/ZtwHmT)

केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ( Ministry of Tribal Affairs) ने अक्टूबर, 208 की अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 यानी वनाधिकार अधिनियम के तहत वनभूमि पर अधिकार को लेकर एक दशक के दौरान 42.1 लाख दावे प्राप्त हुए, जिनमें से सिर्फ 40 फीसदी को मंजूरी दी गई। रिपोर्ट के मुताबिक भू स्वामित्व से संबंधित दावों को या तो ग्राम सभा ने या फिर जिला स्तरीय समिति ने खारिज कर दिया।

अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 में कहा गया है, “वन में निवास करने वाली ऐसी अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को, जो ऐसे वनों में पीढ़ियों से निवास कर रहे हैं, किंतु उनके अधिकारों को अभिलिखित नहीं किया जा सका है, वन अधिकारों और वन भूमि में अधिभोग को मान्यता देने और निहित करने, वन भूमि में इस प्रकार निहित वन अधिकारों को अभिलिखित करने के लिए संरचना का और वन भूमि के संबंध में अधिकारों को ऐसी मान्यता देने और निहित करने के लिए अपेक्षित साक्ष्य की प्रकृति का उपबंध करने के लिए अधिनियम।”

विभिन्न राज्यों में लाखों की संख्या में आदिवासियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के जंगल की जमीन के दावों को निपटारा करते हुए बड़ी संख्या में दावों को खारिज किया गया है। इस पर कोर्ट ने संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों को निर्देश दिए हैं कि वे हलफनामा देकर बताए कि जिनके दावे खारिज किए गए हैं उनकी बेदखली क्यों नहीं की गई है और यदि की गई है, तो उसकी स्थिति क्या है। इस मामले में अगली सुनवाई 27 जुलाई को होनी है।

ऐसे समय जब लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने में महीने भर भी नहीं रह गए हैं, लगता नहीं कि केंद्र या राज्य सरकारें आदिवासियों के अस्तित्व से जुड़े इस मामले पर गौर फरमाएंगी। सियासत ने जैसी शक्ल ली है, उसमें देश की आबादी में आठ फीसदी की हिस्सेदारी करने वाले आदिवासी आप्रासंगिक हो गए हैं, यह घटनाक्रम उसका ताजा उदाहरण है।

~सुदीप ठाकुर 

(लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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