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देशभर में विरोध के बावजूद CAA लागू, सरकार ने जारी की अधिसूचना

नागरिकता संशोधन कानून को केंद्र की मोदी सरकार ने आज से पूरे देश में लागू कर दिया है. देर शाम 10-01-2020 को सरकार ने इसे लेकर नोटिफिकेशन जारी किया. पांच दिसंबर 2019 को सबसे पहले केंद्रीय दल की बैठक के बाद 10 दिसंबर को नरेंद्र मोदी सरकार की कैबिनेट ने नागरिक संशोधन बिल को लोकसभा में पेश किया था, उसके बाद से ही देशभर में इसे लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहा है. देश के सभी यूनीवर्सिटी के छात्र नागरिकता संसोधन कानू के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और शाईन बाग में लगभग एक महीने से महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे धरने पर बैठे हैं. आज

नागरिकता संशोधन बिल के जरिए ‘अंबेडकर’ के सपनो को चूर-चूर कर देना चाहते हैं: संजय सिंह

नागरिकता संशोधन बिल के लोकसभा से पास होने के बाद से बात हो रही है कि भारत को बदल दिया गया है. कुछ कहते हैं कि भारत पाकिस्तान की मिरर इमेज बन रहा है. भारत के संविधान के मुताबिक, किसी भी नागरिक से भेदभाव नहीं किया जा सकता. इसलिए जानकार आर्टिकल 14 पर चर्चा कर रह हैं और कह रहे हैं कि सिटिजन अमेंडमेंट बिल बराबरी के अधिकार पर चोट करता है. बिल में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भारत की नागरिकता हासिल कर सकते हैं. इस बिल में मुस्लिमों को नागरिकता देने का जिक्र नहीं है.

नागरिकता संशोधन विधेयक का असल मक़सद

By- गिरीश मालवीय~ बहुत कम लोगों को मालूम है कि इस नए नागरिकता संशोधन विधेयक का सबसे कड़ा विरोध पूर्वोत्तर में हो रहा है, लेकिन हमारा मीडिया इतना बिका हुआ है कि इस बारे में कोई खबर भी नही दिखा रहा है। वह इस नए नागरिकता संशोधन विधेयक के दुष्परिणाम क्या होंगे उसके बारे में जरा सी बात करने को तैयार नही है! पूर्वोत्तर भारत में इसके खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। लेकिन शेष भारत का मीडिया इन प्रदर्शनों को नजरअंदाज कर रहा है। सेवन सिस्टर्स कहे जाने वाले पूर्वोत्तर के हर राज्य में इसके खिलाफ व्यापक असन्तोष है। नगालैंड

संविधान से अधिक महत्वपूर्ण उमर खालिद या कुछ और?

विमर्श। भारतीय मीडिया अपने सामाजिक ताने-बाने के साथ काम करती है। उसके लिए कौन सी बात महत्वपूर्ण है या फिर किस बात को कितना महत्व देना है, यह सब खबर से अधिक खबर की सामाजिक पृष्ठभूमि मायने रखती है। उसके शब्द और शब्दों की परिभाषा भी इसी हिसाब से बदलती रहती है। यह कोई नई बात नहीं है। यह होता रहा है। लेकिन आश्चर्य तो तब होता है जब स्वयं को प्रगतिशील कहने वाले मीडिया संस्थानें भी ऐसे मौकों पर मुंह छिपाकर चुप बैठ जाती हैं। संभवत: उनकी कोशिश यह होती है कि वे अपनी प्रगतिशीलता का प्रदर्शन निर्बाध रूप से करते रहें और वह भी जो परोक्ष…