टाइम मैगजीन ने अपने कवर पेज पर ‘India’s Divider In Chief’ शीर्षक से PM मोदी को नवाज़ा

मैगजीन ने लिखा है - नाकाम हैं, तभी ले रहे राष्ट्रवाद का सहारा...

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मैगजीन का मानना है कि 2014 में लोगों को आर्थिक सुधार के बड़े-बड़े सपने दिखाने वाले मोदी अब इस बारे में बात भी नहीं करना चाहते. अब उनका सारा जोर हर नाकामी के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराकर लोगों के बीच राष्ट्रवाद की भावना का संचार करना है. भारत-पाक के बीच चल रहे तनाव का फायदा उठाने से भी वह नहीं चूक रहे हैं.

मैगजीन का दावा – 2014 में थे मसीहा, अब सिर्फ राजनेता…

मैगजीन का कहना है कि बेशक मोदी फिर से चुनाव जीतकर सरकार बना सकते हैं, लेकिन अब उनमें 2014 वाला करिश्मा नहीं है. तब वे मसीहा थे. लोगों की उम्मीदों के केंद्र में थे. एक तरफ उन्हें हिंदुओं का सबसे बड़ा प्रतिनिधि माना जाता था तो दूसरी तरफ लोग उनसे साउथ कोरिया जैसे विकास की उम्मीद कर रहे थे. इससे उलट अब वे सिर्फ एक राजनीतिज्ञ हैं, जो अपने तमाम वायदों को पूरा करने में नाकाम रहा है.

मोदी के कार्यकाल में अविश्वास का दौर शुरू हुआ…

मैगजीन का कहना है कि यह जरूर है कि लोगों को एक बेहतर भारत की उम्मीद थी, लेकिन मोदी के कार्यकाल में अविश्वास का दौर शुरू हुआ. हिंदु-मुस्लिम के बीच तेजी से सौहार्द कम हुआ. गाय के नाम पर एक वर्ग विशेष को निशाना बनाया गया. सबसे अहम यह कि सरकार ने इस पर कोई ठोस कदम उठाने की बजाए चुप रहना ही बेहतर समझा. मैगजीन का कहना है कि अपनी नाकामियों के लिए अक्सर कांग्रेस के पुरोधाओं को निशाना बनाने वाले मोदी जनता की नब्ज को बेहतर समझते हैं. यही वजह है कि जब भी फंसा महसूस करते हैं तो खुद को गरीब का बेटा बताने से नहीं चूकते.

मोदी ने राजनीति को अपने इर्द-गिर्द घुमाने की कोशिश की…

उन्होंने राजनीति को अपने इर्द-गिर्द घुमाने की कोशिश की है. तभी उनके एक युवा नेता तेजस्वी सूर्या कहते हैं कि अगर आप मोदी के साथ नहीं हैं तो आप देश के साथ भी नहीं हैं. तीन तलाक को खत्म करके उन्होंने मुस्लिम महिलाओं का मसीहा बनने की कोशिश भी की, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले में भारत को सबसे निचले पायदानों में से एक पर रखा जा रहा है. सांप्रदायिक खाई के साथ जातिवादी खाई तेजी से बढ़ती जा रही है.

नोटबंदी की मार नहीं झेल पाया है देश…

टाइम ने लिखा है कि मोदी ने लगभग हर क्षेत्र में अपने मन मुताबिक फैसले लिए. हिंदुत्व के प्रबल समर्थक स्वामीनाथन गुरुमूर्ति को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के बोर्ड में शामिल किया. उनके बारे में कोलंबिया के अर्थशास्त्री ने कहा था- अगर वह अर्थशास्त्री हैं तो मैं भरतनाट्यम डांसर. मैगजीन का कहना है कि गुरुमूर्ति ने ही कालेधन से लड़ने के लिए नोटबंदी का सुझाव दिया था. इसकी मार से भारत आज भी नहीं उबर सका है. मोदी को लगता है कि सत्ता में बने रहने के लिए राष्ट्रवाद ही बेहतर विकल्प है. वह भारत-पाक के बीच चल रहे तनाव का फायदा लेने से नहीं चूक रहे. इसीलिए आर्थिक विकास पर वह राष्ट्रवाद को तरजीह दे रहे हैं.

मैगजीन का मानना है कि मोदी को दूसरा कार्यकाल मिलने में ज्यादा अड़चनें नहीं हैं, लेकिन लोगों को उस स्थिति के लिए खुद को तैयार रखना होगा, जहां मोदी अपनी तमाम नाकामियों के लिए सारी दुनिया को सजा देने से पीछे नहीं हटेंगे.

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