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अखबारनामा : चुनाव मतलब अखबारों की कमाई का सीजन

दोस्तों, बिहार में विधानसभा चुनाव अब अपने चरम की ओर अग्रसर है। बीजेपी और जदयू ने चुनावी सभाओं का आयोजन शुरू कर दिया है। हेलीकॉप्टर हवा में उड़ने लगे हैं। अखबारों में भी बयानबाजी अब बढ़ गई है। इस बार के चुनाव में बिहार के अखबार कंफ्यूजन में हैं। वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि करें तो क्या करें।

दरअसल, इस बार का चुनाव है ही इतना दिलचस्प कि अखबारों को पसीने छूटने लगे हैं। भाजपा लोजपा के कंधे पर बंदूक रखकर नीतीश कुमार पर निशाना साध रही है। तो नीतीश कुमार के पास यह कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है कि वे सबके हैं। इस बार उनकी पार्टी ने यही चुनावी नारा दिया है – नीतीश सबके हैं। और खास बात यह कि अपने पोस्टरों में उन्होंने किसी और को शामिल नहीं किया है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उन्होंने तौबा की है। मतलब यह कि वे चाहते तो हैं कि भाजपा उनका साथ दे लेकिन वे नरेंद्र मोदी से अपनी दूरी बढ़ा रहे हैं।

यह तो हुई नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के बीच दोस्ती-दुश्मनी की बात। अब अन्य पार्टियों पर भी निगाह डालते हैं। अखबारों ने अब कांग्रेस को भी महत्व देना शुरू कर दिया है। यह बदलाव इस कारण है कि कांग्रेस को इस बार लड़ने को 70 सीटें मिली हैं। बिहार के अखबारों की मानें तो इस बार 1990 के बाद कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा मौका है। कांग्रेस ने इसका जमकर लाभ भी उठाया है। वहीं विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस को महागठबंधन के नेताओं के अलावा जमीनी कार्यकर्ताओं का साथ मिल गया तो वह इस बार किंगमेकर की भूमिका में होगी।

भाजप, जदयू और कांग्रेस के अलावा अखबारों में तेजस्वी यादव हॉट केक हैं। उनसे जुड़ी तमाम खबरें छोटी ही सही प्रकाशित की जा रही हैं। आज के अखबारों में उनके बयानों को प्रमुखता दी गयी है। खासकर उनका यह बयान कि सरकार बनते ही दस लाख युवाओं को नौकरियां देंगे। वहीं नियोजित शिषकों को समान काम-समान वेतन देने संबंधी घोषणा को भी अखबारों ने हाईलाइट किया है।

आज दैनिक हिन्दुस्तान ने अपने राजनीतिक पन्ने पर एक विश्लेषण छापा है। इस विश्लेषण में बताया गया है कि इस बार बिहार में मुख्यमंत्री पद के दावेदार कौन-कौन हैं। इसके तहत सबसे पहले नीतीश कुमार के जीवन व अनुभवों को दिखाया गया है। वहीं दूसरे नंबर पर तेजस्वी यादव हैं। अखबार ने नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की तस्वीरों को एक आकार का रखा है। यानी अखबार भी यह मानता है कि टक्कर तो इन दोनों के बीच ही है। इस सूची में चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा, पप्पू यादव और पुष्पम प्रिया चौधरी शामिल हैं।

खैर, यह तो सामान्य बात है। लेकिन खास बात यह है कि पहले जहां अखबारों को लगता था कि बिहार में नीतीश कुमार का कोई विकल्प नहीं है, अब वे मानने लगे हैं कि बिहार की धरती अभी भी ऊर्वर है। हालांकि यह औपचारिकता भी हो सकती है। अभी पेड न्यूज का दौर आना बाकी है।

पेड न्यूज से एक बात याद आयी। बिहार के अखबारों में खास तरह के स्कीम चलते हैं और इसके एजेंट होते हैं पत्रकार। वे पत्रकार जो जिलों में हैं, प्रखंडों में हैं, उन्हें अखबार की ओर से स्कीम उपलब्ध कराया जाता है। यह चुनाव के समय कमाई का अवसर होता है। पत्रकारों के लिए भी और अखबारों के लिए भी। सबसे महत्वपूर्ण यह कि इस कमाई का कोई हिसाब-किताब नहीं होता। बस स्पेस के हिसाब से पैसे देने होते हैं।

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बहरहाल, इस बार के चुनाव में इस तरह की कोशिशें शुरू हो गई हैं। देखना यह है कि यह किस स्तर को प्राप्त करता है। मतलब यह कि अखबार अपनी ही बनायी नैतिकता को कितना नीचे गिराते हैं। तो देखते रहिए हमारा यह खास कार्यक्रम। हम अखबारों के तहखाने में चल रही पॉलिटिक्स और इथिक्स दोनों को आपके सामने रखते जाएंगे।

यह लेख वरिष्ठ पत्रकार नवल किशोर कुमार और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण मनीषा बांगर के निजी विचार है ।

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