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अखबारनामा बिहार का: ये रिपोर्ट BJP सरकार की बिहार चुनाव में नाक में दम कर देगी

संसद में मॉनसून सत्र के पहले ही दिन लॉकडाउन की वजह से विस्थापित मजदूरों की मौत का मामला उठा। सरकार ने जवाब में कहा कि मृतकों की संख्या को लेकर उसके पास कोई आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है। इससे पहले सरकार ने बताया था कि उसके पास साल 2016 के बाद से किसानों की मौत का राज्यवार आंकड़ा नहीं है, क्योंकि गृह मंत्रालय ने इकट्ठा ही नहीं किए।

अभी पूरा देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा है। चिकित्सा और पुलिसकर्मियों के कंधों पर इस महायुद्ध का दारोमदार है मगर केंद्र सरकार को नहीं पता कि इस युद्ध में हमारे ऐसे कितने योद्धा खेत रहे। पिछले दिनों सरकार ने संसद को बताया कि उसके पास कोविड-19 से मरने वाले चिकित्साकर्मियों और पुलिस वालों का कोई डेटा नहीं है। ऐसे ही कृषि कानूनों को लेकर देश भर के किसानों की चिंता है कि उन्हें उनकी फसलों के सही दाम नहीं मिलेंगे। फसलों के सही दाम लगें भी कैसे जब सरकार को यही नहीं पता कि किस राज्य में कितना गन्ना होगा, कहां कितनी उड़द होगी या कहां कितना कपास उगेगा। दरअसल कृषि विभाग फसलों की पैदावार के राज्यवार अग्रिम अनुमान जारी नहीं करता।

ऐसे ही पिछले साल बेरोजगारी पर एनएसएसओ ने पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे के आंकड़े जारी किए। इसमें बताया गया कि पिछले चार पांच सालों में गुजरात सहित पूरे देश में बेरोजगारी दर बहुत बढ़ी है। इन आंकड़ों के जारी होते ही नीति आयोग कहने लगा कि अभी यह रिपोर्ट अधूरी है, इसे सही न माना जाए। इसके बाद जब बारी इस साल की आई तो अभी तक बेरोजगारी का कोई ठोस आंकड़ा सरकार ने नहीं दिया है। पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे के बारे में भी कोई सूचना नहीं है कि बेरोजगारी का असल हाल क्या है। बल्कि, बेरोजगारी दर संभालने का जिम्मा एक प्राइवेट संस्था सीएमआईई उठा रही है। ऐसे ही सरकारी हस्तक्षेप के कारण एनएसएसओ के ‘उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण 2017-18’ के रोजगार व उपभोग के आंकड़े आम नहीं किए गए थे।

प्रख्यात अर्थशास्त्री हैशन फू का कहना है, ‘आंकड़े अर्थपूर्ण नीति निर्माण, संसाधनों के विवेकपूर्ण आवंटन और जन सुविधाओं के निर्माण में आधार स्तंभ का काम करते हैं।’ आंकड़ों से ही पता चलता है कि विकास के पहिए को गति देने के लिए कब, कहां, कितने, कैसे और किन संसाधनों की जरूरत है। अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के लिए समुचित आंकड़ों की उपलब्धता अनिवार्य शर्त है।

मौजूदा दौर में ‘एविडेंस बेस्ड पॉलिसी’ लोकनीति का नया आधार है। साक्ष्य-आधारित नीति का यही मतलब है कि नीतियों का निर्माण उनकी प्रासंगिकता, व्यावहारिकता और सफलता के सबूतों पर आधारित होना चाहिए। अभिजीत बनर्जी, एस्थर डफ्लो और माइकल क्रेमर को पिछले वर्ष का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार ‘वैश्विक गरीबी उन्मूलन की प्रायोगिक पद्धति’ के लिए दिया गया। इन अर्थशास्त्रियों का काम साक्ष्य-आधारित नीति के दायरे में आता है। जाहिर है साक्ष्य के लिए डेटा चाहिए, यदि डेटा ही नहीं होगा तो नीतियों का निर्माण और इनका मूल्यांकन कैसे होगा।

भारत विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है। इतनी बड़ी आर्थिकी में डेटा संग्रहण करने वाली विभिन्न संस्थाओं और विभागों के बीच तालमेल और सामंजस्य बड़ी चुनौती है। मसलन, देश का एक-तिहाई भूभाग सूखा-संभावित क्षेत्र है। हर साल लगभग साढ़े तीन करोड़ लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं। देश में 5 हजार से अधिक मध्यम और बड़े बांध भी हैं। इसके बावजूद, देश को सूखा और बाढ़ का सामना करना पड़ता है। जान-माल की भारी क्षति होती है। इन समस्याओं से मुक्ति के लिए एक समग्र नीति की जरूरत है। इसीलिए सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 में प्रावधान है कि प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण अपने सभी रिकॉर्डों को विधिवत सूचीबद्ध और अनुक्रमणित करके रखेगा।

इसका इलाज यही है कि ब्लॉक से लेकर प्रांतीय स्तर तक जरूरी डेटा इकट्ठा करने का प्रबंध हो और एक डेटाबैंक बने। सरकार ने राष्ट्रीय आंकड़ा साझेदारी एवं अभिगम्यता नीति (एनपीडीएसए) 2012 के तहत ऑनलाइन ‘गवर्नमेंट डेटा प्लैटफॉर्म’ बनाया था, लेकिन अब यह भी अपडेट नहीं होता क्योंकि सरकार के पास मेटाडेटा ही नहीं है। कोविड-19 में जिस तरह एक-एक पैसे की तंगी सभी को है, आंकड़ों की जरूरत और भी बढ़ जाती है।

यह लेख वरिष्ठ पत्रकार नवल किशोर कुमार और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण मनीषा बांगर के निजी विचार है ।

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