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अखबारनामा : बिहार के अखबारों का जातिवाद

BY_नवल किशोर कुमार , डॉ मनीषा बांगर

दोस्तों, बहुत पहले एक फिल्म आयी थी। फिल्म का नाम था कालाबाजार। इस फिल्म का एक गीत तब खूब लोकप्रिय हुआ था। गीत में पंक्ति थी – पैसा बोलता है। बिहार की राजनीति अलग है। यहां पैसा भी बोलता है और जाति भी। अक्सर द्विज बहुजन समाज के लोगों पर यह आराेप लगाते हैं कि जाति संबंधी विश्लेषण कर वे जातिवाद कर रहे हैं। लालू प्रसाद पर जातिवाद करने का आरोप भी इसी आधार पर लगाया जाता रहा है। सामाजिक न्याय को मानने वाले इस नेता को तो देश भर की मीडिया ने केवल मुसलमान और यादवों का नेता घोषित कर दिया। जबकि अपने शासनकाल में केवल कुर्मी और सवर्णों को महत्व देने वाले नीतीश कुमार बिहार की द्विजवादी मीडिया की नजर में कभी जातिवादी नहीं रहे।

खैर, राजनीति में सब चलता है। ठीक वैसे ही जैसे जंग और प्यार में सब जायज है। लेकिन मेरा मानना है कि राजनीति को न तो जंग समझा जाना चाहिए और न ही प्यार। लोकतंत्र में राजनीति सबसे उपर है। जब आप राजनीति करते हैं तो आप लोगों की भावनाओं, उनकी समस्याओं, उनके मुद्दों की बात करते हैं। जबकि जंग और प्यार दोनों एक तरह से व्यक्तिगत बाते हैं।

दरअसल, मैं आपको वह बताना चाहता हूं जो आज पटना से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान ने किया है। यह अखबार किस तरह नीतीश कुमार के पराजय व भाजपा की विजय के लिए षडयंत्र कर रहा है, इसका प्रमाण आज उसने स्वयं दिया है। सामान्य पाठकों को यह एक नया प्रयोग लग सकता है। लेकिन इसका मतलब बहुत खास है। कल एनडीए की ओर सीटों का एलान कर दिया गया। सुशील मोदी भाजपा की ओर से और नीतीश कुमार अपनी पार्टी की ओर से चेहरा बने। मंच पर महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी थे। घोषणा हुई कि जदयू 122 और भाजपा 121 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे। जदयू ने अपने कोटे में से 7 सीटें जीतनराम मांझी को देने का एलान किया। इन सात सीटों में से 5 सीटों पर मांझी ने स्वयं और अपने परिजनों को मैदान में उतारा है। वहीं भाजपा ने कहा है कि वह अपने कोटे में से कुछ सीटें मुकेश सहनी को देगा।

यह सारी खबर विस्तृत रूप से आज बिहार से प्रकाशित सभी अखबारों के पहले पन्ने पर है। नीतीश कुमार और सुशील मोदी की तस्वीर भी है। हिन्दुस्तान ने आज ही एक विश्लेषण प्रकाशित किया है। शीर्षक है – भाजपा के 60 प्रतिशत टिकट सवर्णों को। इस शीर्षक को देखकर ही समझा जा सकता है कि अखबान ने क्या संदेश देने की कोशिश की है। इसके संदेश में छिपा है, इसकी चर्चा हम आपसे आगे करेंगे। पहले यह समझते हैं कि छापा क्या गया है।

खबर में साफ कहा गया है कि पहले चरण के लिए भाजपा ने 27 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी गई है। अखबार ने सभी उम्मीदवारों की जाति के बारे में बताया है। अखबार के मुताबिक 27 में 16 उम्मीदवार सवर्ण हैं। लिहाजा यह साफ हो जाता है कि भाजपा सवर्णों की पार्टी है। इन 16 में 7 राजपूत, 6 भूमिहार और 3 ब्राह्मण हैं। चूंकि प्रथम चरण में भाजपा के हिस्से में तीन सुरक्षित क्षेत्र हैं तो तीन अनुसूचित जाति के और तीन यादव जाति के उम्मीदवारों को मौका दिया गया है। इनके अलावा एक आदिवासी, एक बिंद, एक दांगी और चंद्रवंशी जाति का प्रत्याशी है। मुसलमान कोई नहीं है।

मतलब मुट्ठी भर सवर्णों को भाजपा ने 60 फीसदी से अधिक सीटें दी है और बहुसंख्यक बहुजनों को 40 फीसदी। यह अंतर साफ-साफ दिखाता है कि भाजपा क्या है और हिन्दुस्तान अखबार उसे किस रूप में पेश करना चाहता है।

अब बात इस खबर में छिपी साजिश की। दरअसल, तेजस्वी यादव ने इस बार के चुनाव में रोजगार और गरीबी का सवाल उठाया है। वे इन्हीं दो सवालों पर नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की सरकार दोनों को डबल इंजन की सरकार कहकर घेर रहे हैं। उनकी यह अपील युवाओं में असर भी कर रही है। उनके सवालों से नीतीश कुमार की तिलमिलाहट कल पटना में संवाददाता सम्मेलन में साफ-साफ दिखी जब उन्होंने पत्रकारों के सवालों का सीधे मुंह जवाब नहीं दिया और इस दौरान वे केवल लालू प्रसाद के 15 वर्षों के शासनकाल को कोसते रहे। आज हिन्दुस्तान अखबार ने एक नंदकिशोर यादव का बयान छापा है जिसमें उन्होंने बताया है कि बिहार लालू प्रसाद के 15 वर्षों के कारण पिछड़ा।

खैर, भाजपा और नीतीश कुमार के पास सिवाय लालू प्रसाद को राजनीतिक गालियां देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हिन्दुस्तान अखबार ने साठ प्रतिशत सीटें सवर्णों को देने संबंधी खबर को छापकर राजनीति में जाति का तड़का लगा दिया है। यह बेवजह नहीं है। इसके पीछे कांग्रेस है। कांग्रेस भी सवर्णों की पार्टी है। उसके भी अधिकांश उम्मीदवार सवर्ण हैं। लेकिन अखबार को केवल भाजपा का सवर्णवाद चाहिए। इसके पीछे भी बड़ा कारण है। अखबार के द्विज यह मानते हैं कि यदि बिहार में सवर्णों का राज लौटना है तो इसका कारण भाजपा ही होगी। उन्हें इस बार यह मौका दिख भी रहा है। वैसे भी सीट बंटवारे में 122 और 121 का आंकड़ा यह साफ करता है कि नीतीश कुमार को भाजपा ने घुटनों के बल बैठा दिया है।

बहरहाल, रहिए न बेखबार। हम अखबारों पर आधारित इस कार्यक्रम के जरिए बिहार की राजनीति से जुड़े कुछ अहम बातों पर आपका ध्यान आकर्षिक करते रहेंगे।

यह लेख वरिष्ठ पत्रकार नवल किशोर कुमार और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण मनीषा बांगर के निजी विचार है ।

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