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अखबारनामा : बिहार में पेड न्यूज की बाढ़

दोस्तों, वह जमाना लद गया जब राजनेता लोगों के दिलों में रहते थे। तब वजह भी होती थी। राजनेता लोगों से सीधे मिलते थे, उनकी समस्याएं सुनते थे और निराकरण करते थे। पटना के एक सांसद हुए राम अवतार शास्त्री। वे यादव जाति के थे और वामपंथी थे। सांसद के रूप में जो उन्होंने छाप छोड़ी है, वह अलहदा ही है। वह पटना रेलवे स्टेशन पर किताबों की दुकान पर बैठते थे और लोगों से सीधे संवाद करते थे। कर्पूरी ठाकुर का जनता से सीधा जुड़ाव होता था। पटना के वीरचंद पटेल पथ पर नंदलाल का होटल उनका अस्थायी कार्यालय रहता। जनता दरबार का आइडिया तो लालू प्रसाद का था। वे जबतक सीएम रहे, उनका आवास हमेशा लोगों के लिए खुला रहा। पहले राजनेता आज के जैसे न थे। एक पाकिस्तानी शायर ने नेताओं के काफिले और सुरक्षा दस्ते को लेकर क्या खूब लिखा है

खंजर बकफ खड़े हैं गुलामिन-ए-मुंतजिर,

आका कभी तो निकलोगे अपने हिसार से।

खैर, अखबार भी तब अखबार थे। नैतिकवान अखबार। अखबारों के अपने इथिक्स होते थे। अभी हाल ही में दैनिक जागरण ने पहले पन्ने पर हाथरस कांड को लेकर खबर प्रकाशित की। यह खबर गिरफ्तार आरोपियों के पत्र पर आधारित था और अखबार ने पूरे मामले में मृतका मनीषा वाल्मीकि(बदला हुआ नाम) के परिजनों को कटघरे में खड़ा कर दिया। यह न केवल इथिक्स के लिहाज से गलत था बल्कि तकनीकी आधार पर भी।

खैर, दैनिक जागरण की इमेज ही संघ के अखबार की है। लिहाजा इसके बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं। बात उन अखबारों की होनी चाहिए जो छद्म रूप से इथिकल होने का दावा करते हैं। बिहार के चुनाव में सब अपने इथिक्स की धज्जियां उड़ा रहे हैं।

शुरूआत दैनिक हिन्दुस्तान से करते हैं। आज इसके पहले पन्ने पर पूरे पृष्ठ का विज्ञापन है सो पहला पन्ना आज के संस्करण में तीसरे पन्ने पर है। दूसरा पन्ना राजनीतिक पन्ना है जिसमें चुनाव की खबरें हैं। इस पन्ने पर सबसे अधिक महत्व जिस राजनीतिक बयान को दिया या है, उसका शीर्षक है – कुछ लोग परिवार उत्थान के विशेषज्ञ : नीतीश।

इस राजनीतिक बयान में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद पर हमला बोला है। वैसे यह अस्वाभाविक नहीं है। लालू प्रसाद अब भी बिहार की राजनीति के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। नीतीश कुमार के पास उनके उपर हमला करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

दूसरी खबर जिसे अखबार ने प्रमुखता दी है, वह उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का बयान है। उन्होंने कहा है कि लोजपा एनडीए का हिस्सा नहीं है। उनका यह बयान भी अखबार के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अखबार भी चाहता है कि लोगों के मन में कंफ्यूजन न रहे। वैसे बिहार की राजनीति को लेकर मेरी अपनी समझ है कि सुशील मोदी वही कहते हैं जो नीतीश कुमार उनसे कहलवाना चाहते हैं। लिहाजा इस खबर में नाम भले ही सुशील मोदी का है, लेकिन बयान तो नीतीश कुमार का ही है।

बहुत दिनों के बाद हिन्दुस्तान ने लालू प्रसाद के बयान को प्रकाशित किया है। लेकिन नीतीश कुमार नाराज न हो जायें, इसका भी उसने खास ख्याल रखा है। मतलब यह कि नीतीश कुमार के बयान को अखबार ने चार कॉलम में प्रकाशित किया है तो लालू प्रसाद की खबर को केवल दो कॉलम में और वह भी एक छोटी खबर के रूप में। हेडिंग का भी अखबार ने ध्यान रखा है कि नीतीश कुमार नाराज न हो जायें। लालू के बयान का शीर्षक है – नीतीश के भूतकाल में जिये के आदत बन गइल बा। दूसरे पन्ने पर अन्य खबरों में जे पी नड्डा, लोजपा और चुनाव आयोग की खबर है। इन सबको अखबार ने लालू प्रसाद से अधिक प्रमुखता दी है।

खैर, अब आगे बढ़ते हैं। पहले पन्ना जो कि आज के अखबार में तीसरे नंबर पर है, पर भी नीतीश कुमार के बयान को पहली खबर बनाया गया है। यह भी दूसरे पन्ने पर प्रकाशित बयान का विस्तार है। वहीं अखबार ने पहले पन्ने पर जिस खबर को सबसे अधिक प्रमुखता दी है, उसका शीर्षक है – जदयू में भगवान और पहलवान समेत 15 नपे। मीडिया के अध्येताओं के लिए आज इस पन्ने को जरूर देखना चाहिए कि कैसे कोई अखबार पॉलिटिक्स करता है। पहले पन्ने पर 70 फीसदी जगह अखबार ने नीतीश कुमार को दिया है। यह बेवजह नहीं।

दरअसल, नीतीश कुमार की राजनीति अखबारों के आसरे रही है। वे बिहार की राजनीतिक इतिहास में पहले मुख्यमंत्री हुए जो अखबारों की वफादारी को इंच और स्केल से मापते हैं। वे इसका ध्यान रखते हैं कि उनकी और उनकी पार्टी के बयानों को कितने वर्ग सेमी में प्रकाशित किया गया है और विरोधियों को कितना स्पेस मिला। खैर, बिहार की राजनीति देश की राजनीति से अलग नहीं है। जब नरेंद्र मोदी अखबारों को गुलाम बना सकते हैं, उन्हें अपने इशारों पर नचा सकते हैं तो बिहार में नीतीश कुमार यही काम क्यों नहीं कर सकते? रही बात पेड न्यूज की तो इसकी कोई परिभाषा न तो अखबारों ने तय की है और न ही अखबारों के लिए कोई आदर्श संहिता चुनाव आयोग ने बनाया है।

लेकिन मेरा मानना है कि चुनाव आयोग अखबारों के लिए भी आचार संहिता बनाए। लोगों को दिग्भ्रमित करने के प्रयास बंद होने चाहिए। कल फिर हम अखबारों के कुछ और पहलुओं पर चर्चा करेंगे। खासकर विज्ञापन और जाति के सवाल पर।

यह लेख वरिष्ठ पत्रकार नवल किशोर कुमार और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण मनीषा बांगर के निजी विचार है ।

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