Home Uncategorized मजदूर आत्मनिर्भर है लेकिन बीजेपी के नेता गरीबों के हक पर निर्भर है ?
Uncategorized - May 13, 2020

मजदूर आत्मनिर्भर है लेकिन बीजेपी के नेता गरीबों के हक पर निर्भर है ?

17 तारीख नजदीक है और एक बार फिर पीएम मोदी ने कल देश फिर संबोधित किया । समय वही था रात 8 बजे, हर किसी के मन में एक ही सवाल था ।पीएम मोदी क्या बोलेंगे।क्या ताली थाली मोमबत्ती की तरह कोई नया टास्क देंगे, लाकडाउन बढेगा या नही औऱ अगर बढेगा, तो क्या पहले की तरह ही.. सरकार के अवव्सथा का शीकार गरीब जनता बनेगी। या फिर सरकार नींद से जगके कुछ गरीबो के लिए करेगी। लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ, उन्होने एक नए रकम का पैकेज का ऐलान कर दिया और बातो में ऐसा घुमाया की जनता को लगा अब ये सारा पैसा 15 लाख की तरह हमारे खाते में आएगा, लेकिन देश के गरीब जनता को भी पता है ऐसा कुछ होना वाला नही है, अगर सच में पीएम मोदी गरीब मजदूरों के लिए कुछ करना चाहती तो पहले ट्रेन का किराया माफ करती। आपको बता दे की जो ट्रेने चल रही है,वह गरिबो के लिए नही बल्की अमिरो के लिए है।

क्योकि ट्रेन का किराया इतना है कि मजदूर चाह कर भी नही दे सकता ..राजधानी से भी ज्यादा किराया है…जो मजदूर जनरल में जाते थे, क्योकी उनके पास पैसा नही होता था, व भी उस समय जब वह देहाडी पर काम करके पैसे कमा रहे थे।अपना पेट खुद पाल रहे थे..तो आप ही बताईये की इस समय काम भी बंद है औऱ 2 रोटी के लिए मजदूर तड़प रहा, तो कैसे इतने महंगे टीकट वह बुक कर पाएगा। क्या सरकार को एक बार भी ख्याल नही आया कि एक लिस्ट बना के उन मजदूरो का टीकट ही बस फ्री करा दे। क्या हो रहा पीएम फंड का पैसा ? क्या बस मजदूरो के मौत का दाम लगाने के लिए है वह पैसा ? कब तक बेचारे मजदूरो का शोषण होंगा। दुख होता है, घुस्सा आता है, मजदूरो पर हो रहे अन्याय को देख कर।

आपने देखा होगा कि फिल्मी स्टाइल में पीएम मोदी ने जनता कर्फ्यू और लॉकडाउन की घोषणा टीवी पर आकर किया था,शायद एक बार भी एक्सपर्ट की रॉय मशविरा और तैयारियों का जायजा लेना उचित नहीं समझा, उस वक्त तक उन्हें कोरोना के बारे में कोई निर्णायक समझ नहीं थी। शायद यही वजह था कि उन्होंने मोटेरा स्टेडियम में लाखों की भीड़ नमस्ते ट्रंम्प के नाम पर बुला दी, थाली और ताली बजवाई, फिर मोमबत्ती जलवाई, बड़े बड़े बीजेपी नेता उनसे हाँ में हाँ मिलाने के लिए ‘गो कोरोना गो’ के नारे लगाते हुए पाए गए।लेकिन मुझे ताज्जुब हुआ जब पिछली बार लॉकडाउन बढ़ाने के लिए मोदी जी टीवी पर नहीं आये। अंदर ही अंदर लॉक डाउन की अवधि बढ़ा दी गयी, इस बार शायद उनको आभास हो गया था कि पब्लिक इस बार गुस्से में है और पिछले फैसलों की अपार असफलता के फलस्वरूप। उनके किसी भी ट्रिक या चतुराई से जनता में आक्रोश फूट सकता है। शायद यही वजह है कि इस बार बड़ी सावधानी से जनता की नजरों से किन्नी काटते हुए वह राज्य के मुख्यमंत्रियों से ऑनलाइन मशविरा कर रहे हैं कि चौथी बार लॉकडाउन की अवधि बढ़ाया जाय कि न बढ़ाया जाय?

मेरा सवाल पीएम मोदी जी से ये है कि जब भारत में 500 से 1000 के बीच कोरोना के केसेज थे तब तो आपने किसी को नहीं पूछा, उल्टे फिल्मी स्टाइल में मन की बात थोप दिया, अब जब कोरोना भयानक रूप से अनियन्त्रिक और पीड़ितों की संख्या 80 हज़ार के पार हो गई है, तब आप लाकडाउन का ठीकरा मुख्यमंत्रियों के सिर क्यों फोड़ना चाहते हैं?

कोरोना ने न केवल देश की राजनीति को बल्कि समूचे सिस्टम की नाकामी देश के सामने ला दिया है। अब स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी के पास इस देश के मीडील क्लास और गरीब जनता को लेकर न कोई विजन है और नही कोई जवाबदेही। इस पार्टी को लगता है कि पाकिस्तान का नाम लेकर, हिंदू मुस्लिम का नाम लेकर। यह देश पर 50 सालों तक राज करेगे। लेकिन अब यह नही होने जा रहा है.. इस देश के गरीब मजदूरों को मुर्दा कौम समझने की भूल आत्मघाती साबित होगी।

यह जो ट्रकों में बैठ करष पैदल हजारो किलीमीटर चल के भुखे प्यासे अपने घर जा रहे लोग है न, वही तय करेंगे कल का भारत कैसा होगा। 2019 में जब बीजेपी दोबारा आई तो दरअसल इसकी वजह यही थी कि इन्ही लोगों ने बीजेपी द्वारा दिखाए जा रहे सपने को सच मान लिया था, इन्हे लगा था अब दिन बदलेंगे। इसीलिए तो देश का गरीब, बहुजन समाज, आदिवासी, निम्न माध्यम वर्ग प्रधानमंत्री की झुठे वादो को सच मान लिया था, याद है न “अच्छे दिन”, आवाज आती थी ‘आएंगे’। लो आएंगे..अगर यही अच्छे दिन है तो एसा अच्छा दिन नही चाहिए इन गरिबो को साहेब, इनका वही पुराना दिन लौटा दिजीए ।

पीएम मोदी ने जिस तरिके से कल आत्मनिर्भर होने की बात देश से किया, सुन के हसी आती है। क्योकि ये भारत 1947 से पहले भी आत्मनिर्भर था और आज तक आत्मनिर्भर है, ये देश कबी किसी के टुकड़ पर नही पला। हा लेकिन बीजेपी के नेता आत्मनिर्भर शायद नही है। वह गरीब जनता का हक मार के अपना पेट औऱ बैंक भर रहे।

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