گھر گیا Uncategorized 48 ہزار افراد بے گھر ہوں گے, کیا کیجریوال نے مودی سرکار کے راستے پر عمل کیا؟ ?
گیا Uncategorized - ستمبر 9, 2020

48 ہزار افراد بے گھر ہوں گے, کیا کیجریوال نے مودی سرکار کے راستے پر عمل کیا؟ ?

कितना स्वाभाविक है रेलवे किसी अरबपति को बेचने से पहले लाखों लोगो के घर उजाड़ कर ज़मीन ख़ाली करवाना. न्यायालय और सरकार ,पुलिस और प्रशासन,میڈیا, भांड और नक्काल ,शरीफ़ और अपराधी , माफिया और सामाजिक नेता ,पंच और सरपंच सब मिलकर मेहनत करने वालो के घर अरबपति के लिए उजाड़ दें .ज़मीन ख़ाली करा ले।

आओ मेहनकश को बेदख़ल करें शहर से, शिक्षण संस्था, ہسپتال, बाज़ार, न्यायालय, खेत , नदी,पहाड़, पृथ्वी से उसे बेदखल करें.उसे भुखमरा अशुभ बतायें .उसकी हिमायत करने वाले को कामरेड कहकर ,अर्बन नक्सल कहकर निशाना बनाएं उसे देशद्रोही सिद्ध करेंन्यायालय के निर्देश की दिशा में अरबपति की सेवा करें नहीं तो देशद्रोही कहलाएं.अरबपति ,खरबपति , ग्लोबल जुआरियों की सेवा में यह हिन्दू राष्ट्र समर्पित है।

बहुत अधिक लोगों को लगता है झुग्गी-झोपड़ी तो घर नहीं है। वह तो अस्थायी बसेरा है और उनका उजड़ जाना न केवल स्वाभाविक है बल्कि उचित भी है। इस तरह झुग्गी-झोपड़ी को वही लोग देखते हैं जिनके पास प्रापर्टी है कहीं पुश्तैनी इलाका है ज़मीन है ,घर है या कहीं भी मकान, دکان, ज़मीन या स्थाई नौकरी है या बस निजी प्रापर्टी से जुड़ी दृष्टि है।

ऐसे लोगो को अक्सर झुग्गी-झोपड़ी एक फालतू, अवांछनीय , बद्सूरत और मिटा दिये जाने लायक चीज लगती है.साफ़ तौर पर इसे वे किसी का आवास या घर नहीं मानते। वहां रहने वालों के बीच मानवीय सम्बन्ध हैं, एक सामाजिक व्यवहार है, उनके बीच भी स्मृति मौजूद है,इच्छा और आकांक्षा है.वहां गहरा ,पेचीदा, डायनेमिक, अनुभव-संसार है। वहां तरह -तरह के कारीगर और उनके हुनर मौजूद हैं.खाते-पीते लोगों कीहैल्पयानि घरों मे काम करने वाली औरतें हैं।

यहां भी पढ़ने वाले बच्चे हैं, गर्भवती औरतें हैं,थके-मांदे बुज़ुर्ग हैं। यहां भी किसी की प्रतीक्षा ,किसी का आदर-सत्कार और आतिथ्य होता है.त्योहार, ख़ुशीऔर गमी होती है।सवाल ये है कि इस सारे जीवन को व्यर्थ और मिटाने योग्य क्यों माना जाता है।

हमारे यहां ,सफेदपोश लोगो की अनधिकृत कौलोनी भी हैं, फार्महाउस, बंगले और छोटी- मोटी रियासतें हैं लेकिन उन्हे फालतू नहीं माना जाता।समरथ को नहीं दोष गुसांईसमर्थ लोगो का अपराध भी वांछनीय है, आकर्षक है और मेहनत करने वाले का जायज़ हक़ भी अवांछनीय है,कितनी पिटी हुई अनाकर्षक बात है न ! झुग्गी-झोपड़ी की तरह! इस बात को मिटा दो.इस बात को कहने वाली राजनीति मिटा दो .इसका पक्ष लेने वाले लेखक-कलाकार को मिटा दो.इसका पक्ष लेने वाले न्याय को मिटा दो।

कितना स्वाभाविक है रेलवे किसी अरबपति को बेचने से पहले लाखों लोगो के घर उजाड़ कर ज़मीन ख़ाली करवाना। न्यायालय और सरकार ,पुलिस और प्रशासन,میڈیا, भांड और नक्काल ,शरीफ़ और अपराधी , माफिया और सामाजिक नेता ,पंच और सरपंच सब मिलकर मेहनत करने वालो के घर अरबपति के लिए उजाड़ दें .ज़मीन ख़ाली करा लें।

आओ मेहनकश को बेदख़ल करें शहर से, शिक्षण संस्था, ہسپتال, बाज़ार, न्यायालय, खेत , नदी,पहाड़, पृथ्वी से उसे बेदखल करें.उसे भुखमरा अशुभ बतायें .उसकी हिमायत करने वाले को कामरेड कहकर ,अर्बन नक्सल कहकर निशाना बनाएं उसे देशद्रोही सिद्ध करें।

न्यायालय के निर्देश की दिशा में अरबपति की सेवा करें नहीं तो देशद्रोही कहलाएं.अरबपति ,खरबपति , ग्लोबल जुआरियों की सेवा में यह हिन्दू राष्ट्र समर्पित है।

यह लेख वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ रामू के निजी विचार है

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