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Uncategorized - March 9, 2021

उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा उलटफेर, CM त्रिवेंद्र सिंह रावत ने दिया इस्तीफा!

उत्तराखंड में एक बार फिर सियासी उलटफेर के संकेत दिख रहे हैं. सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुर्सी डगमगा रही है, जिससे उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक सियासी हलचल तेज हो गई. सीएम रावत के खिलाफ विरोध के सुर लगातार तेज होते चले गए और इस बार पार्टी आलाकमान के कानों तक भी बात पहुंच गई, जिसके बाद खुद सीएम को दिल्ली तलब किया गया. भले ही इस नाटक का पर्दा अब जाकर गिरा हो, लेकिन इसकी स्क्रिप्ट काफी पहले से लिखी जा रही थी. जानिए उत्तराखंड बीजेपी में मचे इस सियासी घमासान की पूरी कहानी.

मार्च 2017 में उत्तराखंड ने सत्ता परिवर्तन कर बीजेपी के हाथों में राज्य की कमान सौंप दी. 70 विधानसभा सीटों में से 56 सीटें जीतने के बाद मुख्यमंत्री को लेकर अटकलें शुरू हुईं. शुरुआत में सीएम पद के लिए जिन टॉप-5 नामों की चर्चा थी, उनमें त्रिवेंद्र सिंह रावत का नाम शामिल नहीं था. लेकिन पार्टी आलाकमान की तरफ से त्रिवेंद्र सिंह रावत को आगे किया गया और उनके नाम पर मुहर लगाई गई.

त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीएम पद के लिए चुना जाना एक चौंकाने वाला फैसला था. इसका सबसे बड़ा कारण ये था कि त्रिवेंद्र सिंह रावत आरएसएस के काफी करीब थे. वो करीब दो दशक तक संघ के प्रचारक रहे. साथ ही उन्हें अमित शाह का भी करीबी बताया जाता है.

उत्तराखंड बीजेपी में पिछले चुनावों में जीत के बाद से ही नेताओं के नाराज होने का सिलसिला शुरू हो चुका था. जिसके बाद सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत की कार्यशैली ने इसे लगातार बढ़ाने का काम किया.

त्रिवेंद्र सिंह रावत के सीएम बनने के बाद उनके तमाम फैसलों से भी पार्टी के नेता नाराज चलने लगे. मंत्री और विधायकों ने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि रावत के नेतृत्व में उनकी बात नहीं सुनी जा रही है. साथ ही रावत के कामकाज के तरीके को लेकर भी विरोध के सुर उठने लगे. पार्टी में दो धड़े बनने की खबरें आने लगीं. हालांकि खुलकर किसी ने भी विरोध नहीं किया. लेकिन पिछले दिनों हुई कुछ घटनाओं ने त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ बने माहौल को और मजबूत किया, जिसके बाद नाराज विधायकों ने दिल्ली में डेरा डाल लिया.

भले ही त्रिवेंद्र सिंह रावत के कामकाज को लेकर शुरुआत से ही सवाल खड़े हो रहे हों, लेकिन हर बार उठे विरोध के सुरों को रावत ने केंद्र तक सीधी पहुंच के चलते दबा दिया. इसीलिए अगर अब इस बार भी वो अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब होते हैं तो रावत इतिहास रचने का काम करेंगे. क्योंकि वो पहले ऐसे बीजेपी मुख्यमंत्री बनेंगे जिसने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया हो. इस छोटे राज्य ने 20 साल में 9 मुख्यमंत्री देखे हैं.

इसका कारण ये रहा है कि बीजेपी में हर सीएम के खिलाफ विरोध के सुर उठते आए हैं. साल 2000 में उत्तराखंड की स्थापना के साथ ही बीजेपी ने सरकार बनाई, नित्यानंद स्वामी ने सीएम पद की शपथ ली, लेकिन वो सीएम की कुर्सी पर अपना एक साल भी पूरा नहीं कर पाए. बीजेपी नेताओं के विरोध के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद अक्टूबर 2001 में भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना गया. क्योंकि ये अंतरिम सरकार थी, इसीलिए 2002 में विधानसभा चुनाव हुए और बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस सत्ता में आई और नारायण दत्त तिवारी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने. तिवारी उत्तराखंड में अब तक के पहले ऐसे सीएम हैं जिन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया.

उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री के तौर पर तीन नाम सामने आ रहे हैं. राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी, नैनीताल से लोकसभा सांसद अजय भट्ट और कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत का नाम सीएम की रेस में आगे है. तीनों में से किसी एक को नया मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. हालांकि, कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने इस सिलसिले में संघ के प्रमुख नेताओं से मुलाकात भी की थी. कहा जा रहा है कि नए सीएम के लिए सतपाल महाराज के नाम पर भी चर्चा चल रही है.

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