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भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी योद्धा सावित्रीबाई फुले की जयंती पर नमन !

हिन्दू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परम्परा में शूद्रों और महिलाओं को एक समान माना गया है। अतिशूद्रों (अछूतों) को इंसानी समाज का हिस्सा नहीं माना गया। उन्हें इंसान का दर्जा तक नहीं दिया गया। निर्णयसिंधु में उद्धृत एक स्मृति में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि –

स्त्रीशूद्राश्चय सधर्माणः [1] (अर्थात् स्त्री और शूद्र एक समान होते हैं)भागवतपुराण के अनुसार स्त्री तथा शूद्रों को वेद सुनने का अधिकार नहीं है। दोनों को शिक्षा पाने का अधिकार नहीं है। हिन्दू धर्मग्रंथों में साफ़ तौर पर कहा गया है कि –स्त्रीशूद्रौ नाधीयताम्

[2] (अर्थात् स्त्री तथा शूद्र अध्ययन न करें) ऐसा नहीं है कि महज अध्ययन के मामले में स्त्रियों और शूद्रों को समान माना गया था। क़रीब सभी मामलों में शूद्रों और स्त्रियों को समान माना गया। विवाह संस्कार को छोड़ दिया जाए, तो अन्य सभी संस्कारों के मामले में स्त्रियों को शूद्रों के समकक्ष रखा गया है।

दोनों को संपत्ति के अधिकार से वंचित किया गया है। मनुस्मृति में साफ़ तौर पर कहा गया है कि पत्नी, पुत्र और दास के पास कोई संपत्ति नहीं हो सकती है। उनके द्वारा अर्जित संपत्ति उनकी होती है, जिसके वे पत्नी/पुत्र/दास हैं –
भार्या पुत्रश्चः दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः।
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम्।।

[3]जिस तरह ब्राह्मण ग्रंथों का आदेश है कि शूद्रों का मूल कार्य अन्य तीन वर्णों की सेवा करना है, उसी तरह स्त्री का मूल कार्य अपने पति की सेवा करना है। मनु ने बिना किसी संकोच के साफ़ शब्दों में आदेश दिया है कि शूद्रों के लिए ब्रह्मा ने केवल एक कर्म निर्धारित किया है कि वे विनम्र होकर तीन वर्णों– ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों की सेवा करें– एकं एव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्। एतेषां एव वर्णानां शुश्रूषां अनसूयया।।

[4]इसी तरह से महिलाओं के लिए इन हिन्दू धर्मग्रंथों का आदेश है कि पति चरित्रहीन, लम्पट, गुणहीन ही क्यों न हो, साध्वी स्त्री देवता की तरह उसकी सेवा करे।

[5] महाभारत में कहा गया है कि पति चाहे बूढ़ा, बदसूरत, घिनौना, अमीर या ग़रीब हो, लेकिन स्त्रियों की दृष्टि से वह उत्तम भूषण होता है। वह धनवान हो या निर्धन, ख़ूबसूरत हो या बदसूरत, उसे सदैव संतुष्ट रखनेवाली पत्नी ही सर्वश्रेष्ठ होती है। ग़रीब, कुरूप, निहायत बेवकूफ़, कोढ़ी जैसे पति की सेवा करने वाली स्त्री अक्षय लोक प्राप्त करती है।

[6] हिन्दू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परम्परा में शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की स्थिति को आधुनिक भारत में पहली बार जिस महिला ने चुनौती दी, उनका नाम सावित्रीबाई फुले है। वे आजीवन शूद्रों-अतिशूद्रों की मुक्ति और महिलाओं की मुक्ति के लिए संघर्ष करती रहीं।

उनका जन्म 3 जनवरी, 1831 को जिस नायगाँव नामक गाँव में हुआ, वह महाराष्ट्र के सतारा जिले में है, जो पुणे के नज़दीक है। वह खंडोजी नेवसे पाटिल की बड़ी बेटी थीं, जो वर्ण-व्यवस्था के अनुसार शूद्र जाति के थे। उस दौर में शूद्र जाति में पैदा किसी लड़की के लिए शिक्षा पाने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

वे घर के काम करती थीं और साथ ही खेतों में पिता संग खेती के काम में सहयोग भी करती थीं।
शिक्षा और किताबों से दूर-दूर तक उनका कोई नाता नहीं था। पहली बार उन्होंने किताब तब देखी, जब वे गाँव के अन्य लोगों के साथ बाज़ार शिरवाल गईं।

यहाँ सप्ताह में एक बार बाज़ार लगता था। इस समय वे छोटी-सी बच्ची ही थीं। जब वे बाज़ार से लौट रही थीं, उन्होंने देखा कि बहुत सारी विदेशी महिलाएँ और पुरुष एक पेड़ के नीचे ईसा मसीह की प्रार्थना करते हुए गाना गा रहे थे। वे जिज्ञासावश वहाँ रुक गईं।

उन महिला-पुरुषों में से किसी ने उनके हाथ में पुस्तिका थमा दी। सावित्रीबाई पुस्तिका लेने से हिचक रही थीं। देने वाले ने कहा कि यदि तुम्हें पढ़ना नहीं आता, तब भी इस पुस्तिका को ले जाओ। इसमें छपे चित्रों को देखो, तुम्हें आनन्द आएगा। वह पुस्तिका सावित्रीबाई अपने घर ले आईं। उन्होंने उस पुस्तिका को सँभालकर रख दिया।

जब 9 वर्ष की ही उम्र में उनकी शादी 13 वर्षीय जोतीराव फुले के साथ हुई और वे अपने घर से जोतीराव फुले के घर आईं, तब उस पुस्तिका को भी अपने साथ लेकर आईं।

[7]आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण के दो केन्द्र रहे हैं– बंगाल और महाराष्ट्र। बंगाली पुनर्जागरण मूलतः हिन्दू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परम्पराओं के भीतर सुधार चाहता था और इसके अगुआ उच्च जातियों और उच्च वर्गों के लोग थे। इसके विपरीत महाराष्ट्र के पुनर्जागरण ने हिन्दू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परम्पराओं को चुनौती दी।

वर्ण-जाति व्यवस्था को तोड़ने और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के ख़ात्मे के लिए संघर्ष किया। महाराष्ट्र में पुनर्जागरण की अगुआई शूद्र और महिलाएँ कर रही थीं। जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले, पंडिता रमाबाई और ताराबाई शिंदे इसकी अगुआई कर रहे थे। यह सच है कि इस पुनर्जागरण के सबसे प्रमुख व्यक्तित्व जोतीराव फुले थे। जोतीराव गोविंदराव फुले (जन्म : 11 अप्रैल, 1827, मृत्यु : 28 नवम्बर, 1890) एक विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे।


डॉ. आंबेडकर ने अपने शोध-पत्र ‘भारत में जातियाँ : उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास’ में लिखा है कि स्त्री जाति से बाहर के पुरुषों से संबंध न क़ायम करने पाए, इसके लिए ब्राह्मणों ने सती प्रथा, विधवा प्रथा और बाल विवाह का नियम बनाया। इसमें सती प्रथा और विधवा प्रथा का पालन तो सिर्फ़ द्विज जातियाँ करती थीं, लेकिन उनकी देखा-देखी बाल विवाह का प्रचलन शूद्रों-अतिशूद्रों में भी हो गया।

ब्राह्मणवादियों की इसी प्रथा का पालन करते हुए सावित्रीबाई के पिता खंडोजी नेवसे ने उनकी शादी 1840 में 9 वर्ष की उम्र में ही जोतीराव फुले से कर दी। जोतीराव फुले भी नाबालिग ही थे। बाल विवाह उस समय व्यापक तौर पर प्रचलित परम्परा थी।


जोतीराव फुले भी ब्राह्मणवादी वर्ण-जाति व्यवस्था के श्रेणीक्रम में शूद्र वर्ण और माली जाति के थे, जिनके लिए ब्राह्मणवादी धर्मग्रंथों का आदेश है कि उनका काम ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों की सेवा करना है। जोतीराव के पूर्वज खेती करते थे। गुज़ारा जैसे-तैसे हो जाता था। गाँव के पटवारी के साथ उनकी अनबन होने तथा परेशान किए जाने से तंग आकर आख़िर में उन्होंने गाँव छोड़ दिया। पहले वे सतारा के कटगुल गाँव में रहते थे, फिर पूना जिले के खानवड़ी गाँव में और अन्त में पूना में आ बसे।

बाद में उनके परिवार ने फुलवारी सजाने-सँवारने का काम सीखा। धीरे-धीरे उनकी कीर्ति पेशवाओं तक पहुँच गई। उन्हें पेशवाओं की फुलवारी में काम मिला। काम वे इतने बढ़िया ढंग से करते थे कि उससे प्रसन्न होकर पेशवाओं ने उन्हें पैंतीस एकड़ ज़मीन इनाम में दे दी।

अब लोग उन्हें ‘फुले’ कहने लगे। जोतीराव के दादा शेटीबा थे। उनके तीसरे पुत्र गोविन्द थे, जिनके दूसरे पुत्र जोतीराव फुले थे। इसी के चलते उनका पूरा नाम जोतीराव गोविन्दराव फुले पड़ा। [8]
जोतीराव की उम्र सालभर की ही थी, तभी उनकी माँ चिमणाबाई का देहांत हो गया। उसके बाद उनका लालन-पालन सगुणाबाई ने किया, जिनका पूरा नाम सगुणाबाई खंडोजी क्षीरसागर था। जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले की शिक्षा-दीक्षा में सगुणाबाई की अहम् भूमिका है।


सगुणाबाई क्षीरसागर का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। बचपन में ही उनकी शादी हो गई थी और बहुत जल्दी वह विधवा हो गईं। उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए एक अनाथालय में काम करना शुरू किया। यह अनाथालय ईसाई मिशनरी द्वारा चलाया जाता था; जिसके संरक्षक मिस्टर जॉन थे। यहीं उन्होंने टूटी-फूटी अंग्रेजी भाषा सीखी।

सर्वप्रथम यहाँ उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे जैसे मूल्यों की शिक्षा ग्रहण की।[9] मानवीय गरिमा के साथ जीने का अर्थ समझा। उन्होंने इस शिक्षा और इन मूल्यों से जोतीराव फुले और बाद में सावित्रीबाई फुले को परिचित कराया।

उन्हें आधुनिक मूल्यों से सींचा। सगुणाबाई ने जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले को गढ़ा था। उनको याद करते हुए सावित्रीबाई फुले ने एक कविता लिखी है, जिसमें वे उनके प्यार-दुलार, मेहनत और ज्ञान की प्रशंसा करती हैं।

ये लेख डॉ. सिद्धार्थ जो लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। और ये उनके निजी विचार है ।

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