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Uncategorized - October 30, 2018

‘धर्म पर लिबरल और नाइंसाफी पर कठोर’

~ खालिद अनीस अंसारी

गुलाम नबी आज़ाद को अचानक एहसास होता है कि ‘हिन्दू’ उम्मीदवारों ने उनको चुनाव प्रचार में बुलाना बंद कर दिया है. हामिद अंसारी फरमाते हैं की बंटवारे के लिए सिर्फ अँगरेज़ और पाकिस्तान ज़िम्मेदार नहीं बल्कि भारत भी उतना ही ज़िम्मेदार है. इस बात को साबित करने के लिए वह सरदार पटेल का सहारा लेते हैं. कल जब सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी केस की तारीख़ पर टिप्पड़ी की तो असदुद्दीन ओवैसी ने बीजेपी को चुनौती दे डाली की अध्यादेश ला कर मंदिर बना कर तो दिखाएं. शेहला रशीद एक मानसिक परेशानियों की शिकार आयरिश गायत्री के इस्लाम धर्म अपनाने पर भावविभोर हो कर उसे ‘कौम’ में दाखिल होने की मुबारकबाद दे डालती हैं. उमर खालिद साहब SIO जैसे इस्लामिक दक्षिणपंथी संगठन द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में बेझिझक भाषण देने जाते हैं.

यह अलग-अलग प्रकार के मुसलमानों–सरकारी, बुद्धिजीवी, फेमिनिस्ट, वामपंथी, नास्तिक, माओवादी, कट्टरपंथी, लिबरल, सेक्युलर, कल्चरल–को एक चीज़ जोड़ती है: इनके बयानों और हरकतों पर हिंदुत्ववादियों की अपार ख़ुशी. बार-बार जो यह ‘हिन्दू’ और ‘मुस्लिम’ के बीच लकीर खींचते रहते हैं उस से इनके जातिगत हितों की भी सुरक्षा होती है. बहुजन-पसमांदा को किसी तरह इस दंगल से बाहर निकलना है.

इसकी पहली शर्त है कि हम अपने आपको बुनियादी तौर पर बहुजन/मूलनिवासी/दलित/आदिवासी मानें और यह समझें की विभिन्न ऐतिहासिक कारणों से हम अलग-अलग धर्मों में बंट गए हैं. और इन सब धर्मों के सवर्ण ठेकेदारों ने हमें यह घुट्टी पिला दी है कि हमारा धर्म सर्वश्रेष्ट है और हमारी बुनियादी ज़िम्मेदारी अपने-अपने धर्म को बचाना या फैलाना है. इस से बड़ी बकवास कोई नहीं हो सकती है. अगर इश्वर है और सर्वशक्तिमान है तो वह अपना धर्म खुद बचा लेगा. अगर ईश्वर इंसाफ-पसंद है तो वह इंसानों के बीच भेदभाव और गैरबराबरी को पसंद नहीं कर सकता. दुनिया पेचीदा और जटिल है. जैसे एक साइज़ का जूता सबके पैर में नहीं आ सकता उस ही तरह कोई एक ही धर्म या उसकी व्याख्या सारे बहुजनों के लिए ठीक नहीं हो सकती. धर्म के मामले में लिबरल रहें और गैरबराबरी के मामले में कठोर. बहुजनों के सशक्तिकरण और इंसाफपसंद समाज के लिए संघर्ष करें और फालतू बहसों से बचें.

by- खालिद अनीस अंसारी

(लेखक के यह अपने विचार हैं )

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