एक पत्रकार स्थिति को रिपोर्ट करे, या स्थिति से निपटने और नतीजों के बारे में सोचे…

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By- Urmilesh Urmil   ~

मुट्ठी भर लोगों की नुमाइंदगी करने वाले बेहद संकीर्ण, दृष्टिविहीन और जनविरोधी किस्म के लोग आज हमारे राष्ट्रीय परिदृश्य पर क्यों हावी हैं?
क्योंकि विपक्ष के दो प्रमुख शिविरों की अपनी-अपनी बेहिसाब कमियां हैं! 2014 में वो साफ़-साफ़ दिखी थीं! 2019 में भी वो दिखाई दे रही हैं!

कांग्रेस आम समझ के स्तर पर क्षेत्रीय या सबाल्टर्न के प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले दलों से बेहतर है। पर उसके नीति-निर्धारकों में आज भी ब्राह्मणवादी और मनुवादी मिजाज के लोगों का वर्चस्व है! राहुल गांधी की कुछ बेहतर कोशिशों के बावजूद पार्टी का वह ‘ताकतवर समूह’ किसी कीमत पर सबाल्टर्न समूहों के सुयोग्य प्रतिनिधियों को पार्टी के अंदर या उसकी परिधि के बाहर नीति-निर्धारण में हिस्सेदारी देने को तैयार नहीं दिखता! इसके अलावा भी एक समस्या है। जब पार्टी सरकार में आती है तो सत्ता संरचना में निहायत एरोगेंट और दलाल किस्म के तत्वों के गिरोह सक्रिय हो जाते हैं! एक समय राजीव गांधी ने इनसे निपटने का आह्वान किया। पर कुछ खास नहीं हासिल हुआ।
संभवतः राहुल गांधी पार्टी के इस चरित्र से वाकिफ हैं और इसे बदलना चाहते हैं। पर इसके लिए वैकल्पिक सांगठनिक नेटवर्क और नये मिजाज की टीम चाहिए। वह टीम तो बना रहे हैं पर इतना जल्दी नये मिजाज से लैस संगठन कहां से आयेगा! उनकी सबसे बड़ी समस्या यही है!

रही बात क्षेत्रीय दलों की तो उनके यहां सूचना, विचार और ज्ञान का घोर अकाल है! इसके चलते वे अपनी मूर्खता और भ्रष्ट आचरण की बहुत भौंडी शैली का प्रदर्शन करते रहते हैं! इसके चलते वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा ब्लैकमेल भी जल्दी होते हैं!
उनके पास न तो संघ जैसा विशाल और अनेक मुखों वाला सांगठनिक नेटवर्क है और न कांग्रेस जैसा थिंकटैंक(आमतौर पर सवर्ण पृष्ठभूमि के घोर दक्षिणपंथियों, मध्यमार्गियों के साथ लेफ्ट-लिबरलस और नवउदारवादी, हर तरह के तत्वों सहित) है! उनके पास सिस्टम के अंदर संवाद या सहयोग करने वाले लोग भी नहीं हैं! नौकरशाही, न्याय क्षेत्र, एकेडमिक्स और मीडिया में उनका कोई उल्लेखनीय आधार नहीं है! जब वे सूबाई स्तर पर सत्ता में आते हैं तो सरकारी छोड़िए, उनके निजी सचिवालय का संचालन भी वे लोग करते हैं, जिनकी बौद्धिक निष्ठा मनुवादियों के साथ होती है! सबाल्टर्न समूहों से जो थोड़े बहुत लोग बौद्धिक क्षेत्र में उभरे हैं, उनसे इन दलों के नेता बुरी तरह बिदकते हैं!
इस जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य और गैर-संघी राजनीतिक धड़े के प्रति बहुजन आबादी(85 फीसदी)की बढ़ती उदासीनता के चलते ही संघ-संचालित शक्तियों को 2014 में इतनी बड़ी कामयाबी हासिल हुई थी!
अब सोचिए 2019 के बारे में। एक पत्रकार के रूप में यहां हमारा काम स्थिति को रिपोर्ट करना था। इस बार स्थिति से निपटने और नतीजे के बारे में आप सोचिए!

 

~ लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..

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