वैलेंटांस्डे को कैसे देखते हैं बहुजन बुद्धिजीवी?

वीरांगना फूलन ने जातीय उन्मादियों को सबक सिखाया था और जातीय उन्माद से ग्रसित बलात्कारियों को मौत की सज़ा दी

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Published By- Aqil Raza    ~

क्या हमें वैलेंटाइंस्डे मनाना चाहिए? इस सवाल का जवाब जब हम जानने की कोशिश करते हैं तो बहुजन महनायिका वीरांगना फूलनदेवी की याद आ जाती है,  जिनका नाम विशव इतिहास के श्रेष्ट विद्रोही महिलाओं की सूची में आता है। जिनका इतिहास पूरा विश्व जानता है।

बहरहाल इस दिन को लेकर बहुजन बुद्धिजीवियों की क्या राय है। यह जान लेते हैं

प्राद्युमन यादव इस दिन के बारे में लिखते हैं, “दो अफवाहें जो आज के दिन चरम पर रहती हैं. पहली ये कि आज के दिन भगत सिंग को फांसी सुनाई गयी थी. सच्चाई ये हैं कि शहीद भगत सिंह जी को 7 अक्टूबर 1930 को फांसी की सजा सुनाई गई थी. उन्हें ये सजा 24 मार्च 1931 को दी जानी थी लेकिन इसको अचानक बदल दिया गया और उनको करीब 11 घंटे पहले 23 मार्च 1931को फांसी दी गयी.

दूसरी ये कि आज के दिन माता-पिता पूजन दिवस होता है. इसकी शुरुवात आशाराम बापू ने की थी.

आज आशाराम , अपनी पोती की उम्र की नाबालिक लड़की के बलात्कार के जुर्म में जेल में बंद है. आप समझ सकते हैं कि जो प्रेम दिवस को माता पिता दिवस कह के प्रेम दिवस का विरोध कर रहा था वह असल में एक यौनरोगी बलात्कारी था.

प्रेम दिवस का विरोध करने वाले ज्यादातर लोग ऐसे ही बलात्कारी , झूठे और मनोरोगी किस्म के लोग हैं. उन्हें प्रेम और सेक्स में अंतर नहीं पता. वह सिर्फ समाज को दूषित करना जानते हैं.

उन्हें लगता है कि इससे उनकी संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी. जबकि ऐसे ही लोग मौका मिलने पर औरतों और बच्चियों का बलात्कार करते हैं. ठीक वैसे ही जैसे उनके बापू आशाराम ने किया.

इसलिए आज इन अफवाहों से बच कर रहें. एक बेहतर समाज की बुनियाद प्रेम पर टिकी होती है. प्रेम में बहुत बल होता है. नहीं पता हो तो दशरथ मांझी से सीखिए”

आज के दिन यानी 14 फरवरी को लेकर डॉ मनीषा बांगर लिखती हैं कि

“अन्यायकारी शोषणकर्ताओं को माफ़ करना प्रेम नहीं है बल्कि अन्याय और अन्यायकर्ताओं से घृणा करना प्रेम है”

वह आगे लिखती हैं आज का दिन 14 फरवरी (1981) बेहमई हत्याकांड का दिन है … आज दुनिया भर में वैलेंटाइन डे भी मनाया जाता है..इन दोनों में क्या सम्बन्ध हो सकता है भला ?

वो सम्बन्ध इस तरह है की इस दिन …दुनिया से ठुकराई , प्रताड़ित की, कलंककित मानी जाने वाली, निम्न जाति की माने जाने वाली ब्राह्मण वादी जातिवादी घिनौनी पितृसत्ता हिंसा से सताई गई महिला ने खुद को इस दिन बेइंतहा प्यार से नवाजा है.

वैसे फूलन का पूरा जीवन ही प्रेम की नयी व्याख्या को जन्म देता है

~ वैवाहिक शोषण को नियति समझ कर स्वीकर नहीं किया – बल्कि अत्याचारी पति को छोड़ दिया.

~पितृसत्ताक जातिवादी हिंसा के सामने घुटने टेक कर खुद को मिटने नहीं दिया बल्कि हर लाजमी तरीके से दुश्मनो को मिटा दिया — बलात्कारी क्रूर ठाकुरो को भून के रख दिया.

~ दुनिया न्याय दे न दे प्यार दे न दे, खुद पर ही सारी दुनिया का प्यार लुटाया –ठाकुरो को मौत के घाट उतारने में ही उसने खुद से न्याय किया.

~ एहसासों और अनुभवों को रास्ते का रोड़ा नही बनाया पर जीवन में प्रगति के शिखर पर पहुंची बढ़ती गयी,संसद बनी.

और अंततः मन में कोई दुविधा या क्लेश न रखते हुए ये समझा की प्रेम का मतलब खुद से प्रेम है, वंचितों से प्रेम है ,

अन्याय कारी शोषण कर्ताओं को अंत में माफ़ करना प्रेम नहीं है बल्कि अन्याय और अन्याय कर्ताओं से घृणा करना प्रेम है .

~ और इस समझ के साथ दुनिया में न्याय समानता और प्रेम के वैचारिक रास्ते पर चल पड़ी –गौतमा बुद्ध के धम्म में शरण लिया

ऐसी क्रन्तिकारी बहुजन नायिका को अनेक  सलाम ! और आप सभी को प्रेम दिवस यानी वैलेंटाइन डे मुबारक !!

डॉ मनीषा आगे लिखती हैं कि 14 फरवरी 1981 को वीरांगना फूलनदेवी ने…बेहमाई में…22 क्रूर बलात्कारी राजपूतों को लाइन में खड़ा कर सूट कर डाला था।

और इस तरह…वीरांगना फूलन देवी ने मानवता को शर्मसार करने वाले हैवानो से निडरता के साथ अन्याय का बदला लेते हुए समस्त महिलाओं के लिये एक पूरे विश्व में अपने आत्म~सम्मान की बेमिसाल तस्वीर पेश की थी।

अब आप ही बताएं 14 फरवरी को यह पर्व किस तरह से मनाना चाहिए? वैसे आप कितने भी गुलाब दों “शोषक की फितरत सुधरने की उम्मीद मूर्खता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं”

आज के इस पर्व पर गोलियों की यह रासलीला आप सबको मुबारक हो…

आज के दिन को लेकर जेएनयू विश्विद्यालय की छात्र कनकलता यादव लिखती हैं कि…

“आज की तारीख महान विरोध और एक बहुजन महिला के मजबूत दावे की तारीख है। 14 फरवरी 1981 का दिन हमें कभी भूलना नहीं चाहिए, यही वो तारीख थी जिस दिन बेहमई में वीरांगना फूलन ने जातीय उन्मादियों को सबक सिखाया था और जातीय उन्माद से ग्रसित बलात्कारियों को मौत की सज़ा दी।

हम लोग हमेशा से निर्माण करने वाले लोग रहे हैं और किसी भी प्रकार के जातीय उन्मादियों की हिंसा के खिलाफ है। राजपूत जाति के जातीय अकड़ का होश ठंढा करने के लिए एक फूलन ही काफी थी और हमें फूलन पर गर्व है। जिस दिन हर एक महिला फूलन की तरह दावा करना सीख जाएगी यकीन मानिए बहुत से उन्मादी पुरुष और पितृसत्तात्मक राज्य सही रास्ते पर आ जायेगा।

फूलन उत्तर प्रदेश की मल्लाह जाति से थीं और उन्होंने लगातार जातिगत, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक प्रताड़ना झेली और जिन राजपूतों ने उन्हें ये सारी यातनाएं सिर्फ एक खास जाति का होने के कारण दी, फूलन ने तय किया कि वो उनके खिलाफ लड़ेंगी, वो लड़ीं और जीती भी। फूलन के अलावा समाज में हज़ारों राजपूत लड़कियाँ रही होंगी लेकिन राजपूतों को किसी मल्लाह जाति जैसी अतिपिछड़ी जाति की लड़की का सामूहिक बलात्कार और सामाजिक प्रताड़ना देना ज्यादा इजी लगता था और उनकी आदत थी।

आज भी लगातार जाति के आधार पर रेप, मर्डर, शोषण करने उच्च जातियों को आसान लगता है, इसका एकमात्र कारण है दोषियों को कड़ी सजा न मिलना। फूलन ने जो किया वो स्टेट की ड्यूटी थी, लेकिन स्टेट भी सवर्णों के अधिकार को प्रोटेक्ट करने का टेंडर लेकर बैठा रहता है। फूलन हमारे लिए और हर एक महिला के लिए आदर्श हैं, उनकी यादें हमारी ताकत और हिम्मत हैं”

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