मुफ्त नहीं, निशुल्क शिक्षा चाहिए!

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मुफ्त शिक्षा किसी के खैरात की मांग जैसी है. जबकि निशुल्क शिक्षा मतलब बिना शुल्क लगाए शिक्षा पहला भीख जैसी मांग है. दूसरा प्राकृतिक अधिकार की मांग है. हम सभी जानते हैं कि सरकारों के पास जो पैसा आता है. उसके तीन मूल स्रोत हैं पहला जनता पर लगने वाले विभिन्न तरह के कर दूसरा देश के प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल या बिक्री से होने वाली आय. तीसरा दूसरे देशों को वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात से होने वाली आय. भारत में एक चौथा आय का स्रोत बची-खुची सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनिया हैं कुछ अन्य आय.

इन सभी आयों की मालिक जनता है. जिसे पांच साल खर्च करने की जिम्मेदारी हम किसी सरकार को देतें हैं. सरकार हमारे इस धन से हमें कुछ वस्तुएं और सेवाएं प्रदान करती है. सरकार कभी-कभी कुछ वस्तुओं की कीमत लेती है और कुछ सेवाओं पर कुछ शुल्क लगाती हैं. इन्हीं सेवाओं में शिक्षा और स्वास्थ्य भी शामिल है. दुनिया भर में यह स्थापित तथ्य है कि इन दो सेवाओं को जनता को निशुल्क उपलब्ध कराया जाना चाहिए. इसके ठोस तर्क हैं.

यानी सरकार हमारे ही पैसे हमें कुछ सेवाएं ऐसी प्रदान करती है जिस पर कोई शुल्क नहीं लेती है. सबके लिए निशुल्क शिक्षा और स्वास्थ्य देना सरकारों समाज की जिम्मेदारी है. चूंकि समाज की आय और संपदा का मालिकाना सरकार के पास होता है तो यह उसकी जिम्मेदारी बन जाती है. निशुल्क शिक्षा की मांग किसी खैरात या दान की मांग नहीं है। यह हक की मांग है. अनुरोध है मुफ्त नहीं निशुल्क शब्द इस्तेमाल करें. मुफ्त शब्द 1990 के बाद के बाजारीकरण और उदारीकरण की देन है.

“सिद्धार्थरामू
वरिष्ठपत्रकार
संपादक फॉरवर्ड प्रैस”

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