हैदराबाद केस में जश्न मनाने वाले कही गलत तो नही !

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11 दिन से उबलता हैदराबाद अब शांत हो गया है. क्या सच में हैदराबाद पीड़िता को इंसाफ मिल गया. क्या एनकाउटर में मारे गए चारों आरोपी ही असली दोषी थे. खैर पुलिस किसी को बचाने और अपनी नाकामी छिपाने के लिए किसी बी हद तक जा सकती है. अगर सच में असली दोषी वहीं थे. तो बाकी सब मामलों में भी पुलिस कोर्ट कचहरी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए. सबका एनकाउंटर कर अदालत का किमती वक्त बचाने के आलावा हर रेप पीड़िता को त्वरित इंसाफ मिल जाए. मुझे तो पुरी कहानी किसी फिल्म की तरह पहले से स्कीरिपटेड लगती है. जहां किसी रसूखदार को बचाने के लिए पुलिस किसी सड़क छाप को पकड़ लाती है और फिर बनती. एक फर्जी एनकाउंटर की कहानी खैर आगे बढ़ते है.अब सवाल बार बार सभी के जहन में यही उठ रहा है. क्या हम एक लाख लोगों का एनकाउंटर करने को तैयार. क्या हम एक लाख लोगों को फांसी देने के लिए तैयार है. और जब फांसी या एनकाउंटर होगा तो इसमें सासंद विधायक भी शामिल होगें क्या हम तैयार है. हम किस बात के लिए तैयार है. आज मैं यह सवाल आपलोगों से इसलिए कर रहा हूं. क्योंकि मसला इस देश में रेप का है. क्योंकि फेल होते कानून व्यवस्था. फेल होते सिस्टम व्यवस्था फेल होते लोकतंत्र का मंदिर. जब हैदराबाद में एनकाउटंर हुआ तो लोगों लग रहा था अब न्याय देश में हो रहा है. यकीन मानिय जब देश में जब सिस्टम व्यवस्था फेल होता है तो देश में ऐसे ही होता है. जब देश में हर 15 मिनट में 1 रजिस्टड बलत्कार केस दर्ज होता हो देश की स्थिती क्या होगी. आप खुद अंदाजा लगा सकते है. इसी मुद्दे पर हमारे वरिष्ठ सहयोगी मोहम्मद अकरम ने महेन्द्र यादव जो समाजिक कार्यकर्ता वरिष्ठ पत्रकार से बातचीत की.

आप इस वक्त समाजिक कार्यतर्ता और वरिष्ठ पत्रकार महेन्द्र यादव को सुन रहे थे .उनका भी साफ तौर यही कहना है कि हैदराबाद में दिशा का बलात्कार और हत्या के चारों आरोपियों की पुलिस द्वारा इनकाउंटर की बात हर तरह से साजिश की ओर इशारा करती हैं. क्योंकि चारों आरोपी पुलिस हिरासत में थे तो उनके पास पिस्टल आये कहाँ से जब भाग रहे थे तो पुलिस ने दौड़ा के पकड़ा क्यों नहीं दूसरी बात जिस जगह पर दिशा के साथ हैवानियत किया गया उसी जगह पर इनकाउंटर क्यों हुआ न्यायालय ने आरोपियों की 10 दिन की कस्टडी दी थी 1 ही हफ्ते में ऐसा क्या हो गया कि उनका इनकाउंटर करना पड़ गया ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि क्योंकि दुष्कर्म की घटना एक जघन्य अपराध है लेकिन बिना जाँच और सबूत के आरोपी बनाना किसी भी व्यक्ति को बलात्कारी बना सकता है. फर्जी तरीके से किसी दुश्मनी को निकालने के लिए भी फंसाया जा सकता है और इनकाउंटर किया जा सकता है. पुलिस अधिकारी द्वारा जो बयान दिया जा रहा हैं उससे कानून की धज्जियां उड़ती हुई नजर आ रही है. NHRC का आकड़ा ये कहता है कि 17 साल में 17 फेंक एनकाउंटर हुआ. इन सबमें आरोपी को सजा देने का प्रावधान न्यायालय को है पुलिस का नहीं. इस तरह से किया गया इनकाउंटर सवालिया निशान जरूर उठाते है. अगर ये सब सही है तो निर्भया कांड के आरोपी उन्नाव कांड के आरोपी, बिहार के आरोपी शाहजहांपुर के आरोपी तमाम ऐसे बलात्कार के आरोपियों को भी इनकाउंटर करना चाहिए. मुझे किसी से दया या हमदर्दी नहीं है. लेकिन जो हुआ है वो गलत है.आइए उन्नाव मामले पर चादनी चौक के पूर्व विधायक अलंका लांबा ने नेशनल इंडिया न्य़ूज से बातचीत उन्होंने क्या कुछ वो आपको सुनवाते है.

अगर मैं उन्नाव मामले का जिक्र करू तो उन्नाव वाले पांचों आरोपियों की तस्वीरें किसी ने देखी क्या हैदराबाद वालों की तो फौरन आ गई थीं. उन्नाव रेप कांड में पीड़िता को जिंदा जलाने के मामले में सबसे पहले हाईकोर्ट के उस जज पर गंभीर सवाल उठ रहा है. जिसने बलात्कार के आरोपियों को जमानत दी थी. इस मामले में अभियुक्त ब्राह्मण हैं. क्या अब धर्म के आधार पर न्याय मिलने लगा है. बिल्कुल मैं दम से कहूंगा. उन्नाव में विधायक ने बलात्कार किया जेल गया आसानी से जमानत पर छूटा लेकिन पीड़िता को जिंदा जला दिया . जिसकी सफदरजंग अस्पताल में मौत हो जाती है. अपराधी चार त्रिवेदी एक वाजपेयी पांचों ब्राह्मण देश के दिल में कोई गुस्सा नहीं. कोई भूचाल नहीं. अपराधियों को फांसी की मांग नहीं. एनकाउंटर या मॉब लिंचिंग की मांग नहीं वे लोग कौन हैं जो तादाद में चंद होने के बावजूद देश हो जाते हैं. कौन उन्हें देश बनाता है. और फिर देश उनके दुख से मरने लगता है. उनके आक्रोश को माथे पर बिठा लेता है. सारे नियम-कायदो के ऊपर और वह लड़की कौन है जो तीन चौथाई आबादी की बेटी होने के बावजूद ‘देश’ की बेटी नहीं हो पाती. क्यों अगर एक रेप भी हो जाय तो धर्म के आधार पर इंसाफ मिलने लगता है क्यों सोशल

मीडिया पर लहालोट होने लगता है. ऐसा क्यों लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ राज्य में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बड़े-बड़े बयानबाज़ी करते हैं. लेकिन प्रदेश का एक शहर ‘रेप कैपिटल’ बन गया है. उन्नाव शहर देश में रेप कैपिटल के नाम से जाना जा रहा है. बता दे की इस वर्ष 2019 में जनवरी से लेकर नवंबर तक 86 दुष्कर्म के मामले सामने आए हैं. योगी सरकार के खुद क्राइम आँकड़े बता रहें है की इसी दौरान जिले में महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के 185 मामले भी सामने आए हैं. कुलदीप सिंह सेंगर दुष्कर्म मामले और गुरुवार को महिला को आग लगाने के मामले से अलग कुछ अन्य महत्वपूर्ण मामले भी हैं. जहां उन्नाव के असोहा, अजगैन, माखी और बांगरमऊ में दुष्कर्म और छेड़खानी के मामले दर्ज किए गए हैं. इनमें से अधिकतर मामलों में आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद उन्हें या तो जमानत पर रिहा कर दिया गया या फिर वे फरार चल रहे हैं. बता दें कि उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित, कानून मंत्री बृजेश पाठक और भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज उन्नाव से ही आते हैं. लेकिन वहां की महिलाओं के साथ आज क्या दुर्गति हो रहीं है उसपर पूरा देश शर्मसार है. योगी के ये मंत्री और सांसद अक्सर महिलाओं को लेकर ओछी और नीच बयानबाज़ी करते पाए गए हैं. योगी के रामराज्य में महिलाओं के इस हालात पर विपक्ष जमकर हमला कर रहा है. पूर्व सांसद और कांग्रेस नेता डॉ उदित राज ने ट्वीट कर कहा यूपी में जो चल रहा है. उससे कम सब को शर्मसार होना चाहिए. योगी सरकार की लापरवाहियों की वजह से उत्तरप्रदेश बलात्कार प्रदेश बन गया है. लाश को कब्र से निकालकर बलात्कार करने की बात करने वाले लोग सत्ता में आयेंगे तो यही होगा.

अब जरा सोशल मीडिया पर लहालोट का जिक्र करते है. 6 दिसंबर की सुबह नींद इसी खबर से खुली. वॉट्सऐप पर मैसेज था. हैदराबाद केस में पुलिस ने एंकाउटर में 4 अपराधियों को मार गिराया है. एकबार लगा कि फेक न्यूज़ है. लेकिन खबर पक्की निकली. ख़बर आते ही एक यूफोरिया का माहौल बन गया. झूमते-नाचते लोगों की तस्वीरें आने लगीं. जश्न मनाए जाने के विडियो आने लगे. हैदराबाद में औरतें पुलिस को राखी बांधने लगीं. भीड़ पुलिसवालों को कंधे पर उठाकर झुलाने लगी उन पर फूल बरसाने लगी. पटाखे फोड़े जाने लगे. सोशल मीडिया तो और ज्यादा लहालोट हो गया है. लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ मूर्खों को इतनी भी समझ नहीं है कि बलात्कार, हत्या, जिंदा जला देना वगैरह किस मानसिकता या मनोविज्ञान का नतीजा है अगर आप हैदराबाद में आरोपियों की हत्या को जायज ठहरा रहे हैं तो भीड़ के हाथों मार डाले जाने को जायज ठहरा रहे हैं और अगर आप भीड़-हत्या या मॉब लिंचिंग को सही ठहरा रहे हैं तो किसी भी बच्ची, लड़की या महिला के बलात्कार, उसकी हत्या या उसे जिंदा जला देने की प्रवृत्ति को जायज ठहरा रहे हैं. लेकिन दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने क्या कुछ कहा वो भी जरा सुनिए.

आम आदमी तो जो कह रहे हैं वो अपनी जगह. फिल्म स्टार्स, स्पोर्ट्स पर्सन और नेता, सब इस जश्न में शरीक हैं. क्या जिस तरिके से संसद में हैदराबाद केस पर स्मृति रानी चिखने लगती है. क्या उन्हें उन्नाव मामला पर नहीं चिखना था. बिल्कुल चिखना चाहिए था. खैर, लेकिन हर कोई सवाल यही पूछ रहे है कि क़ानूनी रास्ते से सज़ा नहीं मिली, फिर क्यों खुशी अब मैं आपको आसान भाषा में बताता हूं. महिलाओं, लड़कियों, छोटे बच्चों के साथ यौन हिंसा की खबरों से अखबार पटे होते हैं. शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता हो जिसमें इस तरह की कोई खबर न आती हो. रेप की हर खबर के साथ उठती है दोषियों को फांसी पर लटकाने की मांग. फास्ट ट्रैक कोर्ट बनते हैं. सज़ा सुनाई भी जाती है. लेकिन सज़ा डिलीवर होती नहीं दिखती. अब आपको थोड़ा फलेशबैक में लिए चलते

2012 में हुआ दिल्ली का बहुचर्चित गैंगरेप-मर्डर केस. यौन हिंसा का ऐसा केस जिसने पूरे देश को दहलाकर रख दिया था. छह आरोपी थे. एक ने जेल में सुसाइड कर लिया था. एक नाबालिग था. फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सितंबर, 2013 में सभी आरोपियों को दोषी करार दिया. नाबालिग दोषी को रिमांड होम भेजा. और चार दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाई. 2014 में हाईकोर्ट ने फांसी की सज़ा को बरकरार रखा. जून, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा-ए-मौत पर मुहर लगा दी. लेकिन हम 2019 के दिसंबर महीने में हैं. उस घटना को सात साल पूरे होने को हैं, सजा आज तक नहीं मिली है. उस मामले में अब भी निर्भया की मां इंसाफ के लिए दर दर की ठोकड़े खा रही है. अदालत की चौखट पर इंसाफ गुहार लगा रही है. आपको याद होगा

2017 की बात है. गुरुग्राम में रेयान इंटरनैशनल स्कूल है. यहां 7 साल के स्टूडेंट प्रद्युम्न ठाकुर की हत्या हो गई थी. स्कूल के वॉशरूम में. धारदार हथियार से उसका गला रेता गया था. पुलिस पर प्रेशर था. कि इतने बड़े स्कूल में बच्चे की हत्या हो गई थी . सुरक्षा का क्या. पुलिस ने स्कूल बस के कंडक्टर को गिरफ्तार कर लिया था. बताया कि कंडक्टर ने वॉशरूम में बच्चे को मॉलेस्ट करने की कोशिश की, बच्चा चीखने लगा तो उसने उसे मार दिया. क्लीनर ने भी दबाव में गुनाह कुबूल कर लिया. लेकिन उस केस में जांच के बाद पता चला कि उसी स्कूल के ELEVENTH का लड़का चोषी था. लेकिन एनकाउंटर के नाम पर अगर पुलिस किसी की हत्या करती है तो वह मॉब लिंचिंग से अलग नहीं है. यानी अगर आप कथित एनकाउंटर का समर्थन करते हैं तो उस मॉब लिंचिंग मानसिकता का समर्थन करते हैं. जिसकी वजह से पिछले हफ्ते भर में कई महिलाओं का बलात्कार हुआ और उसे जिंदा जला दिया गया . तो तय कीजिए कि क्या आप महिलाओं के बलात्कार और उन्हें जिंदा जला देने को जायज ठहरा रहे हैं. लेकिन पता लगाया जाना चाहिए कि न्यायपालिका में फैले जातिवाद के कारण अभियुक्त छूटा है. या भ्रष्टाचार के कारण. आज रेप पीड़िता की इस हालत के लिए न्यायपालिका में बैठे जातिवादी, बेईमान जज भी जिम्मेदार हैं. जो अभियुक्त की जाति देखकर फैसले देते हैं.

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