International Women’s day: भारतीय समाज, बहुजन महिला का जीवन और मुक्ति का मार्ग

शिक्षा, आर्थिक स्वालंबन और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ संघठित संघर्ष से ही बहुजन महिला अपनी गुलामी की जंजीरे तोड़ पायेगी

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Published by- Aqil Raza
By- Dr. Manisha Bangar ~

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर — #आजकाबहुजन_विचार
भारतीय समाज बहुजन महिला का जीवन और मुक्ति का मार्ग –शिक्षा , आर्थिक स्वालंबन और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ संघठित संघर्ष से ही बहुजन महिला अपनी गुलामी की जंजीरे तोड़ पायेगी :–

कहने की आवश्यकता नहीं है कि महिलाओं की दासता केवल यहाँ पनप रही ब्राह्मणवादी विचारधारा से है जो सहूलियत के अनुसार संस्कृति या परंपरा के नाम पर खुद के लिए आहार और पोषण प्राप्त करती रही और इस बहाने खत पानी न मिलने पर धर्म के नाम पर दिमागों पर कोड़े बरसते रही. इस विचारधारा ने एक व्यवस्था बनायीं उसमे में से बने रीती रिवाज़ साहित्य और संघठन जिन्होंने अपने पर इस दमनकारी षड़यंत्र को अमलीजामा पहनाने का जिम्मा ले लिया .
ये सभी मिलकर पुरुषों के मस्तिक्ष और महिला भावनाओ को अपना गुलाम और जरिया बनाने लगे. और इसीलिए पुरुषों और महिलाओ की यह धारणा कि ईश्वर ने पुरुष को श्रेष्ठ शक्तियों से युक्त और स्त्री को उसकी गुलामी करने के लिए बनाया है और परंपरागत तौर पर स्त्रियों द्वारा इसे सत्य मानकर इसकी स्वीकार्यता, ये ही स्त्री की दासता को बढ़ावा देने वाले कारक तत्व हैं।

ज़मींदार अपने नौकरों और ऊंची जाति के लोग नीची जाति के लोगों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार करते हैं, पुरुष उससे भी बदतर व्यवहार स्त्री के साथ करता है। जमींदार अपने नौकरों के साथ और उंची जाति के लोग नीची जाति के साथ तभी ऐसा बुरा बर्ताव करते हैं जब इन्हें उनसे खतरा महसूस होता है, लेकिन पुरुष महिलाओं के प्रति उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक क्रूर व्यवहार करते हैं। भारत में महिलाएं हर क्षेत्र में अस्पृश्यों से भी अधिक उत्पीड़न, अपमान और दासता झेलती हैं। चूंकि हम इस बात को समझ नहीं पाते कि स्त्री की पराधीनता सामाजिक विनाश की ओर ले जाती है, इसीलिए अपनी सोचने-विचारने की सामर्थ्य के चलते, जिस समाज को विकास की सीढ़ियां चढ़नी चाहिए, वह दिन-ब-दिन पतन की ओर बढ़ता जाता है।
पुरुष के लिए एक महिला उसकी रसोइया, उसके घर की नौकरानी, उसके परिवार या वंश को आगे बढ़ाने के लिए प्रजनन का साधन है और उसके सौंदर्यबोध को संतुष्ट करने के लिए एक सुंदर ढंग से सजी गुड़िया है। पता कीजिए, क्या इनके अलावा उनका उपयोग अन्य कार्यों के लिए भी हुआ है ? ये तो संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता मानवता और विचारों की व्यापकता है जिसके वजह से संविधान में निहित अधिकारों से महिला को अनेक अधिकार मिले है.

इसके बावजूद साधन सत्ता मीडिया सांस्कृतिक और धार्मिक तंत्रों पर और संसाधन पर ब्राह्मणवादी लोगो का कब्ज़ा होने की वजह से ब्राह्मण सवर्ण महिला को ही फायदा हुआ और ओबीसी अनुसूचित जाति जान जाती की महिलाये वंचित प्रताड़ित रही.हिंदू कोड बिल में आंबेडकर ने वह तमाम प्रावधान किया था जो महिलाओं के लिए जरूरी थे। लेकिन वे सवर्ण थे जिन्होंने हिन्दू कोड बिल का विरोध किया था। आज भी सवर्ण महिलाएं बहुजन महिलाओं के प्रतिनितिद्व का विरोध करती है.

इसमें महत्त्वपूर्ण बात ये है की वंचित जातियों की महिलाओं के सवाल सवर्ण महिलाओं के सवालों से बिल्कुल अलग हैं। उनके समक्ष दो जून की रोटी का सवाल तो है ही, जातिगत अत्याचार और शोषण का मसला भी है। अशिक्षा गरीबी जातीय हिंसा अपमान अवसरों की कमी बेरोज़गारी और परंवलंबी जीवन है.

और इसीलिए आज अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम ये कहेंगे की बहुजन महिलाओं को अपना पृथक आंदोलन अपने ही नेतृत्व में चलाने आवश्यकता है.

और इस पथ पर यदि कोई समाधान दिखता है तो वह पेरियार और आंबेडकर के विचार हैं जो आधी आबादी को स्त्री मानने के बजाय मुकम्मल इंसान मानते हैं।

मैं मानती हूं कि प्रत्येक महिला को एक उपयुक्त पेशा अपनाना चाहिए ताकि वह भी कमा सके। अगर वह कम से कम खुद के लिए आजीविका कमाने में सक्षम हो जाए, तो कोई भी पति उसे दासी नहीं नहीं बना पायेगा. शिक्षा , स्वालंबन और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ संघठित संघर्ष से ही बहुजन महिला गुलामी की जंजीरे तोड़ पायेगी.

~ डॉ मनीषा बांगर
~सामाजिक राजनितिक चिंतक, विश्लेषक एवं चिकित्सक.
~राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पीपल पार्टी ऑफ़ इंडिया-डी ,
~गैस्ट्रोइंटेरोलॉजिस्ट और लिवर ट्रांसप्लांट स्पेशलिस्ट
~पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बामसेफ और मूलनिवासी संघ

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