Home International दिल्ली के लाल किले को अपना बताता है पाकिस्तान , जानिए कैसे ?
International - June 15, 2017

दिल्ली के लाल किले को अपना बताता है पाकिस्तान , जानिए कैसे ?

शेंघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (SCO) के एक कार्यक्रम में पाकिस्तान एक मजेदार गलती कर बैठा। इस मौके पर भारत और पाकिस्तान, दोनों ही SCO के बाकी सदस्य राष्ट्रों के आगे अलग-अलग प्रदर्शनियों द्वारा अपनी ऐतिहासिक विरासत का परिचय दे रहे थे। दोनों ही देशों ने मुगल बादशाह शाहजहां को अपनी विरासत का हिस्सा बताया। शाहजहां की विश्व-विख्यात स्थापत्य कला को अपनी विरासत का हिस्सा बताने के चक्कर में पाकिस्तान एक हास्यास्पद गलती कर बैठा। पाकिस्तानी दल ने एक प्रदर्शनी के दौरान दिल्ली स्थित लाल किले की एक तस्वीर दिखाई। इस तस्वीर में लाल किले पर भारत का तिरंगा झंडा लहरा रहा था। पाकिस्तानी दल ने लाल किले की इस तस्वीर को लाहौर के शालिमार गार्डन्स स्थित एक किले की फोटो बताया।
पाकिस्तान ने न केवल दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले को पाकिस्तान स्थित किला बताने की गलती की, बल्कि वह मुगल विरासत पर भी अपना दावा जता रहा था। पाकिस्तान ने कहा, ‘ये सभी नायाब इमारतें मुगल सभ्यता के समय की हैं। शाहजहां के समय में मुगल सभ्यता अपने चरम पर थी।’ पाकिस्तान की इस प्रदर्शनी में लाल किले के अंदर स्थित संगमरमर के महलों और सजावटी झीलों का भी जिक्र किया गया था। वहीं, भारत ने अपनी प्रदर्शनी में आगरा स्थित लाल किला और ताज महल को जगह दी। अपने एक्सिबिशन में ताज महल का परिचय देते हुए भारत ने कहा, ‘यह सफेद संगमरमर से बना विशाल मकबरा है। मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी पसंदीदा बेगम मुमताज महल की याद में इसे बनवाया था। ताज महल का निर्माण 1631 में शुरू हुआ और 1648 में यह बनकर तैयार हुआ। ताज महल भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला की बेहतरीन और नायाब मिसाल है। इसे दुनिया भर में एक नायाब वैश्विक विरासत का दर्जा हासिल है।’
पाकिस्तान की प्रदर्शनी में सबसे दिलचस्प हिस्सा मोहनजोदड़ो का था। सिंधु घाटी सभ्यता की यह जगह देश विभाजन के बाद पाकिस्तान में चली गई। पाकिस्तानी प्रतिनिधि दल ने इसके अवशेषों की तस्वीर को भी अपने एक्सिबिशन में शामिल किया। इस्लामाबाद की ओर से मोहनजोदड़ो को अपनी विरासत बताना इसलिए ज्यादा दिलचस्प है कि पाकिस्तान भारतीय इतिहास के बहुत चुनिंदा प्रतीकों को अपने इतिहास के साथ जोड़ता है। पाकिस्तान भले ही बंटवारे के पहले भारत का हिस्सा था और इस नाते उसका इतिहास भारत के इतिहास से बराबर जुड़ा हुआ है, लेकिन इसके बावजूद वह केवल भारत पर आक्रमण करने वाले मुस्लिम आक्रांताओं के समय से ही अपने इतिहास की पहचान करता है।
SCO के सभी 8 देशों- चीन, भारत, रूस, कजाकिस्तान, उजबेकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान और पाकिस्तान के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस कार्यक्रम में शिरकत की। कजाकिस्तान ने तैमूर की विरासत पर दावा किया। तैमूर को मुगल वंश के पूर्वजों में से एक माना जाता है। SCO कार्यक्रम में मुगलों का जिक्र होना काफी दिलचस्प है। मुगल वंश का पहला शासक बाबर केंद्रीय एशिया से भारत आया था। सेंट्रल एशिया का प्रतिनिधित्व यूरेशियन देश करते हैं। कजाकिस्तान ने अपनी प्रदर्शनी में एक मकबरे को दिखाते हुए कहा, ‘यासी शहर में बना ख्वाजा अहमद यसावी को तैमूर के जीवनकाल में 1389 से 1404 के बीच बनाया गया था। यह शहर अब तुर्किस्तान में है। इस अधूरी इमारत में फारसी स्थापत्य कला के जानकारों ने कई ऐसे अनोखे प्रयोग किए, जिनका इस्तेमाल बाद में तैमूर साम्राज्य की राजधानी समरकंद को बनाते समय किया गया।

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