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International - Opinions - State - February 15, 2019

पुलवामा- कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू तो फिर इंटेलीलेंस ब्यूरो इस कदर बेखबर कैसे??

By-डॉ मनीषा बांगर~

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के कितने जवान मारे गए हैं, इस संबंध में अखबार आदि बता रहे हैं कि मरने वाले सैनिकों की संख्या 40 है। कुछ अखबार वाले इससे अधिक की संख्या भी बता रहे हैं। सच क्या है वह तो भारतीय सेना ही बता सकती है और यह भी कि कितने घायल हुए हैं। कितने मौत के कगार पर हैं, यह भी अभी तक साफ-साफ नहीं बताया गया है।

जाहिर तौर पर घटना कैसे घटित हुई, इसकी भी जानकारी मुकम्मिल तौर पर देश को नहीं दी गयी है। थोड़ी बहुत जो जानकारी दी गयी है, उसके हिसाब से एक आदमी जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह आतंकी था, कार में आरडीएक्स भरकर चला रहा था और भारत विरोधी नारे भी लगा रहा था। ऐसा एक वीडियो में भी दिखाया गया है। वह आदमी सीआरपीएफ के वाहन को टक्कर मारता है और फिर विस्फोट होता है। बताया जाता है कि विस्फोट इतना बड़ा था कि सीआरपीएफ के दो वाहनों के परखच्चे उड़ गए। अन्य वाहनों को भी नुकसान जरूर हुआ होगा। साथ ही स्थानीय लोगों को भी नुकसान हुआ होगा। हालांकि मीडिया में इसकी जानकारी नहीं दी गयी है कि इस आतंकी हमले में कितने सिविलियन मारे गए।
इससे पहले कि हम मारे गए जवानों के प्रति कृतज्ञ हों और आंसू बहाएं, क्यों न कुछ सवाल करें उस प्रधानमंत्री से जिसने दावा किया था कि उसका सीना 56 इंच का है और उसने यह भी कहा था कि एक भारतीय सैनिक के मरने पर पाकिस्तान के दस सैनिकों का सिर काटकर लाएगा?
सबसे पहला सवाल तो यह कि यह घटना घटित कैसे हुई? जम्म-कश्मीर में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को अपदस्थ कर राष्ट्रपति शासन थोपा जा चुका है। जाहिर तौर पर वहां लॉ एंड आर्डर की जिम्मेवारी केंद्र पर है। क्या देश का इंटेलीलेंस ब्यूरो इस कदर बेखबर है कि एक आदमी खुली सड़क पर बारूद से भरी कार चलाता है और भारत विरोधी नारे लगाता है, सरकार और उसका तंत्र कुछ नहीं कर पाता।
दूसरा सवाल यह है कि इस घटना की जिम्मेवारी कौन लेगा? नैतिक तौर पर जिम्मेवारी तो प्रधानमंत्री की बनती है। उन्हें यह स्वीकार कर लेनी चाहिए कि चूक हुई है और इस चूक के कारण 40 (अधिकारिक संख्या नहीं) जवानों की मौत हो गई। माताओं की कोख सूनी हो गई। महिलाएं विधवा हो गईं। पिताओं के उपर अपने बेटे की अर्थी उठाने की मजबूरी हो गई। क्या यह दर्द प्रधानमंत्री समझते हैं? यदि हां तो उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए। यदि वे स्वीकार कर इस्तीफा देते हैं तो भविष्य के लिए यह एक नजीर होगा।
खैर प्रधानमंत्री तो जुमले फेंकने में व्यस्त हैं। उनका कहना है कि सैनिकों की कुर्बानी बेकार नहीं जाएगी।
एक सवाल यह भी उठता है कि अब उन परिवारों का क्या होगा जिन्होंने अपने बेटों को खोया है। क्या सरकार की ओर से उन्हें एक करोड़ रुपए का मुआवजा और उनके आश्रितों को क्लास वन की नौकरी दी जाएगी जैसा कि यूपी पुलिस द्वारा एक ब्राह्मण के मारे जाने पर उसके आश्रित को दी गयी थी? यदि नहीं तो क्या इसकी वजह यह कि पुलवामा में जो मारे गए, उनमें अधिकांश गैर ब्राह्मण थे?
बहरहाल सवाल यह भी है कि पुलवामा की घटना कहीं एक साजिश तो नहीं? यह सवाल इसलिए कि देश में चुनाव होने हैं। सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण और विश्वविद्याालयों में विभागवार आरक्षण को लेकर पूरे देश में आंदोलन जोरों पर है। वैसे भी प्रधानमंत्री का यह जुमला कि सैनिकों की कुर्बानी बेकार नहीं जाएगी, व्यर्थ है। वजह यह कि 320 दिनों तक देश के सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन के लिए हड़ताल करने को मजबूर करने का श्रेय भी जुमलेबाज पीएम को ही जाता है।
अंत में एक छोटी सी कविता आप सभी के लिए
प्रसूति पीड़ा का अहसास
तुम्हें कैसे होगा देश चलाने वालों
जब फटती हैं नसें
सांसें तेज हो जाती हैं
आंखों के सामने अंधेरा छाता है
तुम तो देश पर राज करने की
रोज नयी तरकीब सोचो
तुम्हें क्या कि कोई बाप
कैसे अपने बच्चे को पहली बार
गोद में लेता है
उसकी परिवरिश करता है
सपना संजोता है कि
एकदिन उसका बेटा
उसकी परिवरिश करेगा।
खैर इससे भी तुम्हें क्या हुक्मरानों
सिविलियन मरता है
या मरता है कोई सैनिक
तुम हिंदू-मुसलमान का खेल खेलो
नहीं होता है तो
किसी और अखलाक को मारो
ऊना की घटना पुरानी हो गई
फिर किसी बहुजन को मौत के घाट उतारो।
नहीं, तुम्हें आंसू बहाने का हक नहीं
तुम राज करो
गंगा किनारे राम की सबसे ऊंची मूर्ति लगवाओ
संसद में खुद की पीठ थपथपाओ
और लालकिले के प्राचीर से
देश को जन-गण-मन की राग सुनाओ
और अंत में कहो
भारत माता की जय।
डॉ मनीषा बांगर~
~सामाजिक राजनितिक चिंतक, विश्लेषक एवं चिकित्सक.
~राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पीपल पार्टी ऑफ़ इंडिया-डी ,
~पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बामसेफ

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