Home International Political अखबारनामा : दिल्ली के अखबारों में बिहार की खबरें और राजनीति
Political - Uncategorized - 4 weeks ago

अखबारनामा : दिल्ली के अखबारों में बिहार की खबरें और राजनीति

दोस्तों, आपका स्वागत है इस खास कार्यक्रम में। इस कार्यक्रम का मकसद बहुत खास है। खास इसलिए कि इसमें खबरों के पीछे की खबर शामिल है। इस कार्यक्रम के जरिए हमारा उद्देश्य यह है कि बहुसंख्यक SC-ST, पिछड़े और आदिवासी यह जान सकें कि अखबारों के दफ्तरों में खबरें कैसे बनायी और परोसी जाती हैं। फिर यह भी कि खबरों के चयन का तरीका क्या होता है। असल में खबरों के पीछे की दुनिया अत्यंत ही निराली होती है। इसमें असंख्य पेंच भी होते हैं। जाति के आधार पर खबरों के साथ मैनिपुलेशन सामान्य बातें हैं। यही वजह है कि वंचित समाज से जुड़ी खबरों को अखबारों में जगह नहीं दी जाती। इसके पीछे और भी कई वजहें होती हैं। हमारा प्रयास है कि हम आपके समक्ष इन वजहाें को परत-दर-परत आपके सामने रखें।

आज की कड़ी में हम यह देखेंगे कि बिहार या फिर सुदूर किसी राज्य की खबर दिल्ली कैसे पहुंचती है और पहुंचती है तो उसकी मेरिट क्या होती है। इस मेरिट का अधार क्या होता है? जाहिर तौर पर ये सवाल अत्यंत ही महत्वपूर्ण हैं।

दरअसल अखबरों की दुनिया में खबरों की गति एक समान नहीं होती। मतलब यह कि दिल्ली की खबरें आसानी से सुदूर राज्यों के अखबारों में पहुंच जाती हैं। लेकिन इसके विपरीत राज्यों की महत्वपूर्ण खबरें भी दिल्ली तक नहीं पहुंचतीं। इसकी एक वजह यह भी होती है कि दिल्ली में खबरें बहुत होती हैं। मेरा व्यक्तिगत अनुमान है कि सत्ता पक्ष और सत्ता से जुड़ी खबरें ही करीब 40-50 फीसदी रहती हैं। इनके बाद नंबर आता है क्राइम व अन्य खबरों का। फिर दिल्ली जैसे मेट्रो शहर में अखबारों को लोगों के मनोरंजन की चिंता भी रहती है, इसलिए मसालेदार खबरें भी जरूरी होती हैं।

खैर, हम बात करेंगे कि बिहार की खबरें दिल्ली कैसे पहुंचती हैं। और यह भी कि यदि कोई खबर पहुंचती भी है तो उसकी वजह क्या है।

मसलन, आज दिल्ली में प्रकाशित नवभारत टाइम्स के 12वें पन्ने पर बिहार से जुड़ी एक मात्र खबर है। कुल 14 पन्नों के इस अखबार में बिहार के केवल एक खबर को जगह दी गई है। यह खबर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तथा फिल्म अभिनेता रहे सुशांत सिंह राजपूत के पिता के के सिंह से जुड़ी है। इस खबर को पटना में प्रकाशित हिन्दुस्तान व प्रभात खबर ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। बताया गया है कि के के सिंह अपनी बेटी और पुलिस अधिकारी दाामाद के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने उनके आवास पहुंचे। खबर में इसका कारण नहीं बताया गया है कि आखिर वे मिलने क्यों पहुंचे। खबर में बताया गया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सीबीआई की धीमी जांच से असंतुष्ट हैं। लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण यह कि इस संबंध में के के सिंह ने कोई शिकायत की हो, इसका उल्लेख नहीं किया गया है।

पटना में प्रकाशित खबर के साथ नीतीश कुमार और के के सिंह की तस्वीर प्रकाशित की गई है। साथ ही यह भी इसी खबर का हिस्सा है कि सीएम से मिलने के बाद के के सिंह सीधे दिल्ली वापस लौट गए। वे पटना स्थित अपने घर नहीं गए।

मतलब साफ है कि पटना जाने का उनका मकसद सीएम से मिलना ही था। लेकिन क्या पटना वे अपनी मर्जी से गए थे? यह एक सवाल है, जिस पर पटना के पत्रकारों ने विशेष ध्यान नहीं दिया। आखिर वजह क्या रही इस खबर की?

हम इसी सवाल पर पहले गौर करते हैं। सीबीआई की अभीतक की जांच से यह बात सामने आयी है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत की वजह खुदकुशी ही है। उसके बेसरा में जहर सामने नहीं आया है। जबकि उसके पिता के के सिंह ने पटना के राजीवनगर थाने में दर्ज अपनी प्राथमिकी में रिया चक्रवर्ती जो कि सुशांत सिंह राजपूत की प्रेमिका थी, के खिलाफ हत्या का आरोप लगाया था।

सीबीआई ने इस मामले में के के सिंह और उनके परिजनों को सम्मन भेजा है और उनसे दोबारा पूछताछ की जा रही है। इसकी एक संभावित वजह यह कि रिया चक्रवर्ती के खिलाफ सीबीआई ने कोई ठोस तरीके से बात नहीं कही है। उसे जेल भी ड्रग्स के मामले में भेजा गया है।

खैर, हमारा मकसद सुशांत सिंह राजपूत की खबर पर विचार करना नहीं है। हम तो यह बताना चाहते हैं कि यह खबर क्यों और कैसे बनाई गई। दरअसल, बिहार में चुनाव हैं और जैसा कि भाजपा व नीतीश कुमार ने पहले ही कह रखा है कि वे सुशांत सिंह राजपूत की लाश पर राजनीति करेंगे। इसके लिए भाजपा ने तो एक नारा भी गढ़ रखा है – न भूले हैं, न भूलने देंगे।

नीतीश कुमार यह जानते हैं कि सुशांत सिंह राजपूत की लोकप्रियता मध्यम आयवर्गीय परिवारों में है। वे उसकी इसी लोकप्रियता को चुनाव में भुनाना चाहते हैं। उनकी कोशिश है कि हर दिन कुछ न कुछ खास हो ताकि यह मामला मिडिल क्लास के बीच जाय। बिहार के अखबारों में इसे लेकर खास तैयारी भी रहती है। नीतीश कुमार और के के सिंह की कल हुई मुलाकात की वजह यही रही ताकि के के सिंह मुख्यमंत्री के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करें कि उनके कारण ही मामला सीबीआई तक पहुंचा।

अब बिहार की इस खबर को नवभारत टाइम्स ने दिल्ली में 12वें पन्ने पर जगह दी है। खबर पीटीआई के हवाले से है। यानी यह साफ है कि पीटीआई जो कि भारत की प्रमुख समाचार एजेंसी है, ने इस खबर को तवज्जो दी। दिल्ली में बड़ी संख्या में बिहार के लोग रहते हैं। इनमें अखबार पढ़ने वाले बिहारियों में अधिसंख्य आबादी उनकी है जो द्विज वर्ग के हैं। वंचित समाज के बिहारियों को भी दिल्ली में बिहार की खबर को लेकर दिलचस्पी रहती है। इन्हीं खबरों के सहारे वे जान पाते हैं कि उनके बिहार में हो क्या रहा है।

तो सुशांत सिंह राजपूत के पिता और सीएम की मुलाकात की खबर दिल्ली में प्रकाशित करने के पीछे दिल्ली में रह रहे बिहारियों से सहानुभूति प्राप्त करना है तथा इसका चुनावी लाभ भी एक उद्देश्य है। अखबार राजनीतिक दलों के लिए टूल्स बनते जा रहे हैं। यह खबर इसका एक उदाहरण है।

वहीं वे खबरें जो सत्ता पक्ष की बुराइयों और विफलताओं को जगजाहिर करते हैं, उन्हें दबाने की पूरी कोशिश की जाती है। अब आज का ही उदाहरण देखें। कल पटना में प्राख्यात साहित्यकार रहे फणीश्वरनाथ रेणु के घर से उनकी महत्वपूर्ण पांडुलिपियां चोरी हो गईं। पटना के अखबारों में यह खबर तो है, लेकिन दिल्ली के अखबारों के लिए यह कोई खबर नहीं। जबकि सुशांत सिंह राजपूत के पिता की सीएम से मुलाकात खबर है।

एक वजह यह भी कि फणीश्वरनाथ रेणु कुर्मी (ओबीसी) जाति के थे और सुशांत सिंह राजपूत की जाति राजपूत।

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यह लेख वरिष्ठ पत्रकार नवल किशोर कुमार के निजी विचार है ।

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