گھر ڈاکومنٹری ڈبےڈكر اور بھارت کا مستقبل
ڈاکومنٹری - دسمبر 7, 2019

ڈبےڈكر اور بھارت کا مستقبل

کی طرف سے- संजय श्रमण जोठे ~

ڈاکٹر. سنجے شرمان جوٹھے ~ ڈاکٹر۔. گزشتہ چند سالوں میں بھارت کی سیاسی…, आर्थिक और सामाजिक पतन से जन्मी दुर्दशा की सघन प्रष्ठभूमि मे हमें अंबेडकर की वैचारिक विरासत और उनके दिखलाये मार्ग की सम्मिलित संभावनाओं को ठीक से समझना होगा. जिस गंभीरता से अंबेडकर ने भारत के भविष्य के विषय मे या भारत मे बहुजनों के भविष्य के विषय मे अपनी चिंतन धारा को आकार दिया था उसे भी हमें एक विशेष ढंग से देखना और समझना होगा. अंबेडकर की दृष्टि मे बहुजनों के भारत मे भविष्य का प्रश्न या फिर स्वयं बहुजन भारत के भविष्य का प्रश्न – ये दो भिन्न आयाम हैं. इन दोनों आयामों की दो भिन्न संभावनाएं हैं और इन संभावनाओं की अपनी सैद्धांतिक और वैचारिक प्रष्ठभूमियाँ भी हैं.

اس پیچیدہ موضوع میں جانے سے پہلے ہمیں یہ سمجھنا ہوگا کہ ہندوستان میں بہوجنوں کا مستقبل اور بہوجن ہندوستان کا مستقبل دو مختلف سوالات کیوں ہیں۔. इसका उत्तर खोजते हुए हमें भारत के इतिहास मे घटी उन महत्वपूर्ण विचारधाराओ मे झांकना होगा जिनका जन्म प्राचीन और जर्जर हो चुके भारत और यूरोपीय आधुनिकता के बीच के संवाद की प्रष्ठभूमि मे हो रहा है.

भारत मे यूरोप के प्रभाव के स्थापित होने के पहले मुग़ल भारत मे कबीर और उनके बाद विभिन्न धार्मिक परंपराओं मे समन्वय करती हुई एक विशेष देशज आधुनिकता का जन्म हो रहा था. لیکن برطانوی قبضے نے اس جدیدیت اگروال کو ختم کر دیا۔ 2009 ब्रिटिश आधिपत्य मे भारतीय समाज की तमाम नकारात्मक प्रवृत्तियों ने अपने शिखर पर पहुंचकर अपना रंग दिखाना शुरू किया और एक ऐसे असुरक्षित समाज का निर्माण किया जिसमे विभाजन और भय का जहर पहले से अधिक गहरा होकर समाज राजनीति और लोक जीवन के सभी आयामों मे पसर गया. یورپی آقاؤں نے ہندوستان میں جس طرح کا قانون بنایا، وہ سطحی طور پر ہندوستان کے مفاد میں نظر آرہا تھا، لیکن گہرائی تک برطانوی راج ہندوستان کو کمزور اور تقسیم کررہا تھا۔. तमाम नकारात्मक चीजों के बीच कुछ बहुत सकारात्मक चीजें भी ब्रिटिश हुकूमत मे आकार ले रही थीं. एक तरफ कोलोनीयल लूट से भारत की उत्पादन प्रणालियाँ और सामाजिक ताना बाना कमजोर हो रहा था वहीं दूसरी तरफ भारत मे सदा से वंचित और उपेक्षित दलित बहुजन समाज मे यूरोपीय शिक्षा के प्रचार से एक नए जागरण का उदय भी हो रहा था.

भारत पर यूरोपीय आधिपत्य के बहुत तरह के मूल्यांकन संभव हैं लेकिन जहां तक भारत के ओबीसी और दलितों का प्रश्न है. ब्रिटिश शासन मे भारत के शूद्रअतिशूद्रों को पहली बार शिक्षा और शासकीय सेवा के अवसर मिले. ब्रिटिश शासन के दौरान भी भारत के ओबीसी शूद्रों और अस्पृष्यों दलितों/अतिशूद्रों पर जिस तरह के अमानवीय अत्याचार होते थे और जिस तरह से ब्राह्मणों की मानसिक सांस्कृतिक गुलामी मे फसाकर भारत के शूद्रअतिशूद्रों का शोषण होता था (پھولے 2017), उस विवरण को देखकर समझा जा सकता है कि ब्रिटिश हुकूमत भारत के शूद्रअतिशूद्रों के लिए आजादी और गरिमापूर्ण जीवन की नई संभावना भी लाया था. भारत का मुख्यधारा का सनातनी समाज जब भी शक्तिशाली रहा है और राजनीतिक आर्थिक सत्ता के सूत्र जब तक उसके पास रहे हैं तब-तब भारत के बहुसंख्य जनों और स्त्रियों को अमानवीय जीवन जीने को बाध्य होना पड़ा है. ماضی بعید سے لے کر مغلوں کی آمد تک مورخین اور اسکالرز نے اس بات پر زور دیا ہے کہ ہندوستان کے شودروں، اتیشودروں اور عورتوں کی زندگی غیر ملکی حملے یا قبضے کے دور میں کچھ آسان ہو گئی تھی۔ (اپادھیائے 2004)

اس کی دو وجوہات ہیں۔. सर्वप्रथम आततायी सत्ता को अपने लिए स्थानीय साथियों और सहयोगियों की आवश्यकता होती थी और दूसरी तरफ सनातनी और वर्णाश्रमवादी सत्ता भी आपद-धर्म का पालन करते हुए छुआछूत और पवित्रता अपवित्रता की अपनी शास्त्रीय आज्ञाओं से जन्मे कानूनों को शिथिल करके शूद्रअतिशूद्रों को गले लगाने का नाटक करती थी. इसी नाटक से ही सारे सामाजिक सुधार आंदोलन और भक्ति आंदोलन सहित तमाम प्रगतिशील परम्पराएं भी जन्म लेती रही हैं. یہ ڈرامہ نہ صرف مذہب سے متعلق سیاست کا مرکزی محرک رہا ہے بلکہ اگر غور سے دیکھا جائے تو یہ ہندوستان کے ورناشرم مذہب کا بنیادی کردار بھی رہا ہے۔. भारत मे वर्णाश्रम परंपरा मे जिस तरह के धर्म की धारणा है उसमे धर्म के तीन पक्ष माने गए हैं. ایک نظریاتی پہلو، دوسرا طرز عمل کا پہلو اور تیسرا عوامی زندگی کی روایات کا پہلو۔ (چوبے 2009). इन तीन तरह के धर्मों को की अन्य सुंदर शब्दों मे भी परिभाषित किया गया है. मोहनदास करमचंद गांधी के अनुसार भारत मे धर्म की तीन तरह की प्रतीतियाँ रही हैं जिन्हे सामान्य धर्म विशिष्ठ धर्म और आपद धर्म कहा जाता है (گاندھی 1965).

सामान्य धर्म मे सत्य बोलना, चोरी और व्यभिचार न करना इत्यादि नैतिक बातें आती हैं वहीं विशिष्ठ धर्म मे वर्ण और जाति के अनुकूल अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक हो जाता है. جب بھی برہمنی رجحانات زور پکڑتے ہیں تو مخصوص مذاہب کی پیروی کے نام پر معاشرے میں تیزی سے امتیازی سلوک اور ذات پات کا زہر پھیلاتے ہیں اور ہندوستان کے شودروں، اتیشودروں اور عورتوں کی زندگیوں کو جہنم بنا دیتے ہیں۔. تباہی کے بعد، وہ نہ صرف اپنے تئیں تھوڑا نرم ہو جاتے ہیں بلکہ دوسروں کے لیے بھی ترقی پسند ہو جاتے ہیں۔. इस आपद धर्म की सैद्धांतिक और दार्शनिक व्याख्या कुछ भी रही हो लेकिन हकीकत मे यह आपद धर्म ही वर्णाश्रम धर्म को आत्मरक्षा हेतु नए प्रयोग करते हुए प्रगतिशीलता और समावेशी होने का अवसर देता है इसे ही सुंदर शब्दों मे रूढ़िवादी भारत का ‘समावेशी भारत’ होना कहा जाता है. جب بھی ہندوستان پر بیرونی طاقتوں نے حملہ کیا ہے، ہندوستان کے شودروں، اتیشودروں اور عورتوں کو آزادی کا سانس لینے کا موقع ملا ہے۔. इस तरह प्रगतिशील होकर समावेशी नजर आना वर्णाश्रम परंपरा का आपद धर्म है वह उसका मूल स्वभाव नहीं है (Dharmaveer 2009).

भारत की वर्णाश्रम परंपरा मे आपद धर्म को इस तरह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है. یہ کوئی غیر ضروری بحث نہیں ہے، اس کی ایک خاص وجہ ہے، جسے سمجھے بغیر ہندوستان کے ورناشرم دھرم کی طرف سے یورپی جدیدیت کو جو جواب دیا جا رہا ہے اسے سمجھنا ناممکن ہو گا۔. غلام ہندوستان پر جس طرح یورپی جدیدیت کو زبردستی مسلط کیا گیا، اس سے تمام طبقات کو کوئی نہ کوئی نقصان یا فائدہ اٹھانا پڑا۔. जाति व्यवस्था जो पूरे भारत मे एकसमान एक रंग-ढंग और एक जैसी अमानवीयता से अनिवार्यतः नहीं भरी हुयी थी उसमे अचानक इकहरे ढंग की जड़ता और सघन बर्बरता का प्रवेश हो जाता है. जाति व्यवस्था की लचीली संरचना मे पत्थर जैसी कठोरता का यह प्रवेश असल मे ब्रिटिश दौर मे ब्रिटिश प्रशासन के काम करने के खास तौर तरीकों से और तेज हो जाता है (Dirks 2001)

वहीं दूसरी तरफ इन्ही शूद्रअतिशूद्रों को अपना मित्र बनाने की होड़ वर्णाश्रमवादियों और ब्रिटिश आकाओं मे एकसाथ छिड़ जाती है. इस तरह शूद्रअतिशूद्रों और महिलाओं के हिस्से मे कुछ सामाजिक सुधार और कुछ शिक्षा के अवसर आ जाते हैं. सती प्रथा का उन्मूलन और बाल विवाह निषेध आदि सुधार इसी तरह के आपद धर्म के कुछ उदाहरण हैं. یہ ہندوستان کے برہمن پرستوں کا بنیادی کردار ہے۔. جب بھی وہ ترقی پسند نظر آتے ہیں، وہ دراصل آپ دھرم کی پیروی کر رہے ہوتے ہیں۔. जैसे ही ब्राह्मणवादी धर्मसत्ता का राजनीति, جب کاروبار اور معاشرہ پر قبضہ ہو جاتا ہے تو منو سمریت، یاجنوالکیا سمرتی اور انسانی الہیات جو پاکیزگی، نجاست اور ورنا ورنا کے قانون کی وضاحت کرتے ہیں ان کے غاروں سے نکلنا شروع ہو جاتے ہیں۔. आजकल इन स्मृतियों ने नागरिकता संशोधन और नेशनल रजिस्टर फॉर सिटीजनशिप जैसे नए अवतार भी धर लिए हैं.

इस भूमिका के बाद हम समझ सकते हैं कि ‘भारत मे बहुजनों के भविष्य’ का सैद्धांतिक और व्यावहारिक अर्थ क्या है. ہندوستان میں دلت بہوجن تب تک محفوظ رہ سکتے ہیں جب تک ورناشرم عقیدت مندوں کے لیے تباہی کا مذہب رہے گا۔. جیسے ہی ورناشرم پرستوں اور برہمن پرستوں کی طاقت حاصل ہوگی، وہ خود بھی اپنے مخصوص مذہب اور مشترکہ مذہب کی پیروی کرنے لگیں گے اور پورے ملک کے دلتوں اور بہوجنوں کو بھی گھسیٹیں گے۔. لیکن اس کا یہ مطلب ہرگز نہیں ہے کہ ہندوستان میں برہمنوں کے لیے آپ دھرم کو برقرار رکھنے کا مطلب ہندوستان کو کمزور رکھنا ہے۔. حقیقت دراصل اس کے برعکس ہے۔. जिस भी दौर मे भारत के दलित-बहुजन और स्त्रियाँ अपने लिए अधिक स्वतंत्रता सम्मान और अवसरों को हासिल कर पाते हैं उसे दौर मे भारत की सभ्यता आसमान छूने लगती है. प्राचीन भारत मे बौद्ध काल भारत का स्वर्ण-काल रहा है जिसमे ज्ञात इतिहास मे हमने विश्वविद्यालय और सार्वजनिक चिकित्सालय सहित जाति-वर्ण विभेद से रहित सामाजिक व्यवस्थाएं और एक निरीश्वरवादी-भौतिकवादी दर्शन की उड़ान देखी है (Singh 2008). यहाँ यह नोट करना आवश्यक होगा कि ऐसे स्वर्णकाल वे रहे हैं जबकि वर्णाश्रम धर्म की पकड़ भारत पर कमजोर हुई है.

अब हम अपने मूल प्रश्न पर आते हैं जिसमे हमने कहा था कि अंबेडकर के लिए भारत मे बहुजनों के भविष्य का प्रश्न और बहुजन भारत सहित स्वयं भारत के भविष्य का प्रश्न- یہ دو مختلف جہتیں ہیں۔. सरल शब्दों मे कहें तो भारत मे बहुजनों के भविष्य का प्रश्न अनिवार्य रूप से वर्णाश्रम धर्म की छाया मे जी रहे वर्तमान और भविष्य की तरह इशारा करता है जिसमे भारत के दलित बहुजन और स्त्रियाँ समय और परिस्थितियों की दया पर निर्भर रहेंगे . यह ऐसी दशा होगी जिसमे ब्राह्मणवादी विचारधारा के कमजोर होने और उसकी पकड़ ढीली होने का इंतजार करना होगा. दूसरी तरफ बहुजन भारत या वास्तविक भारत के भविष्य का प्रश्न है। बहुजन भारत से बहुसंख्य दलित बहुजनों (जिसमे धार्मिक अल्पसंख्यक भी शामिल हैं) का सुरक्षित और सुपरिभाषित भविष्य अभिप्रेत है जिसमे न केवल सदा से वंचित और तिरस्कृत पुरुषों और स्त्रियों का सम्मानजनक जीवन संभव है बल्कि ब्राह्मणवाद की परंपरा को ढोने और थोपने वाले वर्ग से आने वाले लोगों को भी सम्मानजनक और सुरक्षित स्थान प्राप्त होगा। निश्चित ही जब एसी कोई व्यवस्था होगी जहां सबसे तिरस्कृत लोगों कि सुनवाई होगी तब सदा से सत्ता मे बने रहे वर्ग के लिए भी एक आश्वासन का अनिवार्य रूप से निर्माण होगा.

भारत मे बहुजनों के भविष्य के प्रश्न के बाद हम बहुजन भारत के प्रश्न पर आते हैं। डॉ अंबेडकर ने अपने कठिन परिश्रम से जिस संविधान और जिस सांविधानिक नैतिकता के निर्माण का प्रयास किया है वह असल मे भारत के प्राचीन श्रुति-स्मृति शास्त्रों की ऐतिहासिक और पीड़ादायक गुलामी से मुक्ति की दिशा मे एक प्रयास रहा है. प्राचीन ब्राह्मणी परम्पराएं जहां जाति और लिंग के विभेद को पवित्रता और अपवित्रता की पाशविक धारणाओं के जहर से मिलाकर एक दुर्निवार दासता मे बदल देती थीं वहीं संविधान और संवैधानिक नैतिकता एक नई किस्म की मानवाधिकार और समानता की दिशा मे इंगित करती हैं (Hande and Ambedkar 2009) . प्राचीन बर्बर कानूनों से भविष्य की समता न्याय और बंधुत्व की तरफ देखने वाली इस संवैधानिक नैतिकता से जो भारत निर्मित हो सकता है वही बहुजन भारत है. इस तरह से एक नए भारत की कल्पना करना हमारे लिए आवश्यक हुआ जा रहा है. اس کی سب سے بڑی وجہ اور خوف یہ ہے کہ اگر ہندوستان آئینی اخلاقیات پر کھڑا ہونے کے بجائے کسی پرانے یا نئے مذہب سے پیدا ہونے والی اخلاقیات پر کھڑا ہندوستان کے مستقبل کا تصور کریں تو وہ ہندوستان کسی نہ کسی مذہب کی محدود اور 'خصوصی' تعریفوں سے محدود ہو جائے گا اور یہ حدود پھر سے اسے پرانی دلدل میں دھکیل دیں گی۔ (Ambedkar and Moon 2003).

اب ہم بہوجن ہندوستان کے مستقبل کے سوال کو دیکھنے کی کوشش کریں گے کہ یہ کیا ہے اور بہوجن ہندوستان کی نظریاتی اور تاریخی مخالفت کی روایات سے کون سے رجحانات منظم اور کارفرما ہیں۔. सर्वाधिक महत्वपूर्ण यहाँ यह नोट करना होगा कि किसी भी तरह के प्राचीन स्वर्णयुग की या ईश्वरवादी या नस्लीय या जातीय विभेद के दर्शन पर आधारित प्रत्येक विचारधारा से बहुजन भारत के भविष्य के लिए खतरा ही निर्मित करेगी. असल मे किसी भी धर्म और धार्मिक दर्शन पर आधारित फ्रेमवर्क से भारत ही नहीं दुनिया के किसी भी देश मे लोकतंत्र, नैतिकता और सभ्यता का विकास बाधित ही हुआ है ऐसे मे धार्मिक अर्थ की प्रस्तावनाओं से जन्मी नैतिकता या राष्ट्रवाद का पतन हमेशा किसी न किसी तरह की तानाशाही मे होता आया है (داڑھی 2013).

ہندوستان میں آزادی سے پہلے اور نوآبادیاتی غلامی میں جنم لینے والے وہ نظریات جو برہمن مذہب کے جذباتی فلسفوں اور اصرار کو جگہ دے کر مستقبل کو ایک قدیم سنہری دور کی عکاسی کے طور پر تعمیر کرنا چاہتے ہیں، بہوجن ہندوستان کے مستقبل کے لیے قابل غور ہیں۔. इस अर्थ मे डॉ अंबेडकर की बताई संवैधानिक नैतिकता के विरोधी विचार के रूप मे हमें श्री अरबिंदो के भाववादी दर्शन से आ रही प्रस्तावनाओं को देखना जरूरी हो जाता है. आज के भारत मे विचारधाराओं का जो संघर्ष चल रहा है वह असल मे अंबेडकर और अरबिंदो के दर्शन के संघर्ष के रूप मे देखा जाना चाहिए. किसी प्राचीन धर्म के स्वर्णयुग की पुनर्स्थापना का आग्रह जिस तरह के राजनीतिक दर्शन और स्वयं राजनीतिक संगठनों मे प्रतिफलित हो रहा है उसकी वास्तविक जड़ विवेकानंद, رام موہن رائے, یہ تلک یا ساورکر میں نہیں بلکہ اروبندو گھوش میں ہے۔. विवेकानंद अपनी अल्पायु मे जिन विचारों का निर्माण कर रहे थे वे विचार मूल रूप से किसी मौलिक नव निर्माण को लक्ष्यित नहीं थे बल्कि तत्कालीन समय मे भारत की धार्मिक नैतिकता पर विश्व समुदाय द्वारा उठाए जा रहे कठिन प्रश्नों को उत्तर देने का प्रयास भर था. विवेकानंद के समय मे थियोसोफीकल सोसाइटी द्वारा प्रस्ताविक बौद्ध-वेदांतिक संश्लेषण पर खड़ी आधुनिक व्याख्याओं सहित मिशनरी सेवाभाव के नैतिक दबाव से जन्मी नयी परिस्थितियों मे वर्णाश्रम धर्म को हिन्दू धर्म की तरह निर्मित करने की विराट आवश्यकता उठ खड़ी हुई थी (David Gordon White 2014).

इसीलिए विवेकानंद की असामयिक विदाई के बाद जन्मी दार्शनिक सैद्धांतीकरण की असुरक्षाओं को उत्तर देते हुए अरबिंदो घोष आजादी की लड़ाई को कम महत्व देते हुए हिन्दू धर्म के नए अवतार के लिए एक सामाजिक, مذہبی اور سیاسی فلسفے کا ٹھوس احاطہ کرنے کے لیے وہ پانڈیچیری میں پناہ لیتے ہیں اور خاموشی سے اپنا کام شروع کر دیتے ہیں۔. اس طرح اگر ہم گہرائی سے دیکھیں تو مذہب کی جس قسم کی پرواز کو بعد کے مفکرین نے وویکانند میں پیش کیا ہے وہ بنیادی طور پر تھیوسوفیکل سوسائٹی ہے۔, मेक्स-मूलर, शापेनहावर और अन्य प्राच्य-वेत्ताओं सहित अरबिंदो घोष की तरफ से आ रही है. वहीं दूसरी तरफ तिलक और रॉय जिस आधुनिकता की बात कर रहे हैं वह भी प्राचीन आर्य बंधुओं के ब्रिटेन से आने से उपजे ‘भारत मिलाप’ की आह्लादकारी प्रतीति पर खड़ी है. इस नवीन रचना का निर्माण करते हुए तिलक इतने उत्साहित और प्रेरित हुए हैं कि उन्होंने भारत के ब्राह्मणों को न केवल युरोपियन आर्यों का बिछड़ा हुआ भाई बना दिया बल्कि वे आर्यों के मूल स्थान को खींचकर अंटार्कटिका तक ले गए (تلک 2011). इतना ही नहीं स्वयं अरबिंदो घोष जिस वैज्ञानिकता और दर्शनिकता से प्राचीन वैदिक साहित्य को समृद्ध बनाने का प्रयास कर रहे हैं वह डार्विन के क्रम-विकास के सिद्धांत और फ्रेडरिक नीत्षे के सुपरमेन के सिद्धांत पर आधारित है. घोष जब सुपरामेन्टल और चेतना के विकास की थ्योरी (Aurobindo Ghose 1973) देते हैं तब अरबिंदो घोष के लेखन मे नीत्षे और डार्विन के सिद्धांतों को वैदिक ऋषियों की ऋचाओं मे प्रक्षेपित करने की विवशता को बहुत आसानी से पढ़ा जा सकता है.

अरबिंदो घोष के धर्म दर्शन या उससे उपजे राजनीतिक दर्शन मे एक धर्म विशेष की महिमा का जो प्रभाव है वह प्रभाव अनिवार्य रूप से बहुजन भारत के भविष्य के लिए घातक है. سری اروبندو کا فلسفہ بنیادی طور پر ایک جذباتی فلسفہ ہے جس میں سپر مائنڈ اور روح خدا کا ادراک ہے۔ (Aurobindo Ghose 2000) की प्रतीति पर खड़ी धार्मिक दार्शनिक व्यवस्थाओं की सघन उपस्थित बनी रहती है जो एक जटिल हीगेलियन भाषा मे एक ऐसे फ्रेमवर्क का निर्माण करती है जिसमे प्राचीन स्वर्णयुग के समर्थन मे किसी भी तरह की अतिवादी प्रवृत्ति का निर्माण किया जा सकता है. ایسے انتہا پسندانہ رجحانات کے زہریلے سائے میں ہم آج کی سیاست اور معاشرے کے مشترکہ زوال کا مشاہدہ کر رہے ہیں۔.

वहीं दूसरी तरफ अंबेडकर एक अर्थशास्त्री, मानवशास्त्री और कानून-विद दार्शनिक की भांति जब बहुजन भारत के भविष्य को परिभाषित करने निकलते हैं तब वे सर्वथा भिन्न बौद्धिक, فلسفیانہ ذرائع سے اپنا نظریہ بنا رہے ہیں۔. अंबेडकर की वैचारिक यात्रा शोषण के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं की खोज से आरंभ होती हुई संवैधानिक नैतिकता की ठोस प्रस्तावना तक आती है जिसमे लोकतंत्र समाजवाद सहित समता बंधुत्व और न्याय की आधुनिक यूरोपीय धारणाओं का वही प्रबल स्वर सुनाई देता है जो हमे बाद मे इतावली राजनीतिक चिंतक एंटोनियो ग्रांमशी मे भी मिलता है (Zene 2013). امبیڈکر اپنے سماجی اور سیاسی فلسفے کی تشکیل کے عمل میں جن اقدار کا سہارا لے رہے ہیں وہ پچھلی چند صدیوں میں یورپ اور امریکہ کی سماجی اقدار ہیں۔, سیاسی اور فلسفیانہ جدوجہد اور ترقی کے نتیجے میں پیدا ہونے والی ٹھوس بنیادوں پر قائم ہیں۔. वहीं अरबिंदो घोष और विवेकानंद का कर्तृत्व एवं चिंतन एक अमूर्त और अज्ञात स्वर्णयुग के सम्मोहन की भुरभुरी भित्ति पर खड़ा है.

اس تفصیل کے بعد اب ہم دیکھیں گے کہ اروبندو گھوش اور امبیڈکر کے اصولوں میں کیا فرق ہے اور بہوجن ہندوستان کے مستقبل کے لیے ان کے متعلقہ امکانات کی نوعیت کیا ہے۔. اروبندو گھوش کی قوم اور قوم پرستی کی تعریف بنیادی طور پر ان کا 'بندے ماترم' ہے۔, ‘इंदु प्रकाश’ और ‘कर्मयोगिन’ मे प्राप्त होती है जिसमे वे औपनिवेशिक भारत मे चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष के बीचोंबीच स्वतंत्र भारत के लिए एक राष्ट्र की कल्पना का सूत्रपात कर रहे हैं (Varma 1990). تاہم، روحانی کیرئیر کے بالکل آغاز میں دی گئی اترپارہ تقریر جس میں اروبندو گھوش اپنے سیاسی کیرئیر کا خاتمہ کر رہے تھے۔ (Aurobindo Ghose 1943) की भाषा शैली और विचार प्रक्रिया के माध्यम से उनके दार्शनिक सैद्धांतिक कर्तृत्व की मौलिक प्रेरणा और दिशा को कहीं अधिक स्पष्टता से समझा जा सकता है.

इस भाषण मे अरबिंदो घोष अलीपुर जेल मे हुए अपने दिव्य ईश्वरीय साक्षात्कार का वर्णन करते हैं जिसमे उनके शब्दों मे उन्हे श्री-कृष्ण के दर्शन होते हैं जिसके परिणाम मे उनके हृदय मे भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने का ईश्वरीय आदेश प्राप्त होता है. इस आदेश का स्वरूप जो कुछ भी रहा हो इतना सुनिश्चित है कि अरबिंदो घोष अपने नए राजनीतिक और धार्मिक दर्शन को जिस तरह से लेजिटीमेसी या वैधता देने का प्रयास कर रहे हैं वह लेजिटीमेसी दार्शनिक विचार की अपनी मेरिट पर कम और ईश्वरीय आदेश की दिव्यता पर अधिक निर्भर है. यह निर्भरता किसी भी दार्शनिक वैचारिक प्रयास के लिए अगर एक विवशता बन चुकी हो तो ऐसा विचार और दर्शन भविष्य मे उसे ईश्वरीय आदेश को नए कलेवर मे रखकर उचित अनुचित कुछ भी करवा सकता है. यह एक भयानक सच्चाई है जिसमे हम सभी आज जी रहे हैं.

अरबिंदो घोष और उनकी आध्यात्मिक सहयोगिनी ‘श्री-माँ’ बाद मे जिस तरह के दार्शनिक और यौगिक अनुशासन को जन्म देते हैं वह भी प्राचीन भारत की निरीश्वरवादी-श्रमण-योग परंपराओं से अलग दिशा लेते हुए ईश्वरवादी और भाववादी अनुशासन का स्वरूप ले लेता है. یہاں یہ نوٹ کرنا ضروری ہے کہ یوگا کی قدیم روایات میں بھگوان اور بھگوان کی عقیدت کی کوئی جگہ نہیں ہے۔ یہاں تک کہ پتنجلی کے یوگا ستراس میں بھی خدا کو ایک آلے کے طور پر استعمال کیا گیا ہے۔ پتنجلی 'ایشورا پرانیدھانا' کی اصطلاح کا استعمال کرتے ہوئے خدا کے تصور کو ایک مفید آلہ کے طور پر استعمال کرتا ہے۔. پتنجلی کے یوگا پربھنڈ میں بھگوان کی عقیدت یا جلال پر وہی اصرار نہیں ہے جو نوآبادیاتی دور میں وویکانند یا اروبندو گھوش پیدا کر رہے تھے۔ (David Gordon White 2014). بعد کے سالوں میں ہم دیکھتے ہیں کہ وویکانند اور اروبندو گھوش کی طرف سے دی گئی یہ تجاویز دراصل ہندوستانی خدا کو مغربی سامی مذاہب کے خدا کے خلاف کھڑا کرنے کی ضرورت سے پیدا ہوئی تھیں۔. इस आवश्यकता से जन्मे अरबिंदो और विवेकानंद के प्रयासों मे स्वतंत्र भारत के राजनीतिक उत्तरजीवन की आवश्यकताओं को उत्तर देने वाली ईमानदार प्रेरणाएं कम और प्राचीन भारत की भौतिकवादी परंपराओं की महिमा को कुंद करने की प्रेरणाएं अधिक हावी थीं.

دوسری طرف ڈاکٹر امبیڈکر کے فکری عمل اور ان کے نظریاتی اداروں کی روانگی کے نکات پر نظر ڈالتے ہوئے ہمیں معلوم ہوتا ہے کہ ان کا نظریہ جان ڈیوی کی عملیت پسندی اور یورپی جدیدیت کے کمالات سے بہت متاثر ہے۔ (Zene 2013)। ये आधुनिक विचारधाराएं किसी काल्पनिक ईश्वर, ईश्वरीय आदेश और किसी लोप हो चुके स्वर्णयुग के सम्मोहन से सर्वथा अछूती हैं और मनुष्यता के नए भविष्य के निर्माण के लिए तार्किक आलंबनों पर आधारित हैं. ڈاکٹر امبیڈکر کو اپنی تعلیم کے دوران جس قسم کی جدیدیت کا سامنا کرنا پڑتا ہے اور وہ سماجی و سیاسی فلسفے جن پر وہ اپنا نظریہ استوار کرتے ہیں وہ استحصال اور امتیاز کے ٹھوس تجزیہ پر مبنی ہیں۔. अंबेडकर की सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैचारिक स्थापनाएं हम उन प्रबंधों मे पाते हैं जहां वे भारतीय वर्णाश्रम धर्म का कठोर मूल्यांकन करते हुए दलित-बहुजन एवं स्त्रियों की मुक्ति के संभावित मार्ग की खोज करते हैं. प्राचीन भारत के पवित्र ग्रंथों की दार्शनिक धार्मिक एवं राजनीतिक प्रवृत्तियों के विश्लेषण से जब वे शूद्रों की उत्पत्ति का सिद्धांत खोजते हैं (امبیڈکر 1970), یا جب وہ ہندوستان میں خواتین کی حالت زار پر سوال اٹھاتے ہیں۔ (امبیڈکر 2016) یا جب وہ ورناشرما دھرم کی متضادات اور فلسفیانہ مذہبی عجیب و غریبات کا تجزیہ کرتے ہیں۔ (امبیڈکر 2017), तब वे ईश्वरीय आदेश के अमूर्त आधारों से दूर जाते हुए मानव अधिकार मानव गरिमा और समता, न्याय बंधुत्व जैसे संवैधानिक नैतिकतागत आधारों पर मनुष्य के शोषण और गरिमा से जुड़े प्रश्नों को सुलझाते हैं. ये आधार किसी दिव्ययलोक या वैकुंठ मे बैठे किसी ईश्वर पर नहीं बल्कि मनुष्य की तार्किक और वैचारिक संघर्ष-यात्रा के परिणाम मे इसी धरती पर टिके हुए हैं.

ईश्वरीय आदेश या किसी प्राचीन स्वर्णयुग के सम्मोहन से जन्मी दार्शनिक या सामाजिक राजनीतिक प्रस्तावनाओं का परिणाम हम अरब और यूरोप के कई देशों मे लोकतंत्र के पतन मे देख सकते हैं. امبیڈکر کا اس طرح کے انہدام کے امکان کے خلاف احتیاط کا مطالبہ دستور ساز اسمبلی میں ان کی بحثوں میں سب سے زیادہ تیزی سے سامنے آتا ہے جب وہ خواتین اور اقلیتوں کے مستقبل کے سوال پر اپنا موقف پیش کرتے ہیں۔ (امبیڈکر 2008). स्वतंत्र भारत के सुरक्षित भविष्य के लिए अंबेडकर की विचार प्रक्रिया न सिर्फ यूरोपीय दार्शनिकों के ठोस दार्शनिक प्रबंधों पर आधारित है बल्कि उसमे उनके अपने निजी जीवन के शोषण और संघर्ष से जन्मे प्रश्नों के विश्लेषण और उत्तरों का आश्वासन भी शामिल है. इस तरह यह कहा जा सकता है कि वर्णाश्रम धर्म और ईश्वर की भित्ति पर खड़े किसी भी भाववादी सम्मोहन से जन्मे राजनीतिक या सामाजिक दर्शन की तुलना मे अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता पर खड़ी स्थापनाओं मे पूर्व और पश्चिम की श्रेष्ठतम विचार प्रक्रियाओं का युगपत विश्लेषण होता है.

अंत मे हम अपने मूल प्रश्न पर वापस लौटते हैं. प्रश्न यह है कि हम भारत के दलित-बहुजनों और स्त्रियों सहित सभी भारतीयों के लिए कैसा भारत चाहते हैं. क्या यह भाववादी दर्शनों की हवा-हवाई स्थापनाओं पर किसी काल्पनिक स्वर्णयुग के संधान मे रत भारत होगा या फिर आधुनिक विज्ञान और दर्शन की ठोस भित्ति पर खड़ा लोकतान्त्रिक भारत होगा. इस प्रश्न के उत्तर की दोनों संगत संभावनाओं का विस्तार हम ऊपर देख चुके हैं. ऐसे मे, विशेष रूप से हाल ही मे जिस तरह का सामाजिक राजनीतिक पतन हम देख रहे हैं उसके बीचोंबीच खड़े होकर हमे अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर अंबेडकर के वैचारिक अवदान को उसकी समग्रता मे समझने की तैयारी करनी चाहिए. یہ بابا صاحب امبیڈکر کو ہمارا حقیقی خراج عقیدت ہوگا۔. यही भारत को सभ्य और समर्थ बनाने कि दिशा मे हमारी निष्ठा की सम्यक अभिव्यक्ति होगी.

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-سنجے شرمن جوتھ

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