سماجی انقلاب کے جنگجو لالائی سنگھ یادو کی سالگرہ خصوصی
पेरियार की चर्चित किताब ‘सच्ची रामायण’ को हिंदी में लाने और उसे पाबंदी से बचाने के लिए सुप्रीमकोर्ट तक लड़ाई लड़ने वाले मान्यवर ललई सिंह यादव सामाजिक क्रांति के योद्धा थे. ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल मान्यवर यादव जी का आज जन्मदिवस है. एक सितंबर 1911 को उत्तरप्रदेश के कानपुर देहात में उनका जन्म हुआ था.
द्रविड़ आंदोलन के अग्रणी, सामाजिक क्रांतिकारी पेरियार ईवी रामासामी नायकर की किताब सच्ची रामायण का हिंदी में अनुवाद करते ही उत्तर भारत में तूफान उठ खड़ा हुआ था. 1968 اسی میں لالائی سنگھ نے ’’رامائن‘‘ لکھا: ए ट्रू रीडिंग’ का हिन्दी अनुवाद करा कर ‘सच्ची रामायण’ नाम से प्रकाशित कराया.सच्ची रामायण ने उस समय उत्तरभारत में वह धूम मचाई कि ब्राह्मण धर्म के रक्षक उसके विरोध में सड़कों पर उतर आए. तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने 8 دسمبر 1969 को धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में किताब को जब्त कर लिया और पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया. इसके खिलाफ मान्यवर यादव हाईकोर्ट गए.
सरकारी वक़ील ने न्यायालय में दलील दी कि यह पुस्तक राज्य की विशाल हिंदू जनसंख्या की पवित्र भावनाओं पर प्रहार करती है और इस पुस्तक के लेखक ने बहुत ही खुली भाषा में श्रीराम और सीता एवं जनक जैसे दैवी चरित्रों पर कलंक मढ़ा है, جسے ہندو پوجتے ہیں۔. इसलिए इस किताब पर प्रतिबंध लगाना जरूरी है.
ललई सिंह यादव के विद्वान अधिवक्ता माननीय बनवारी लाल यादव ने ‘सच्ची रामायण’ के पक्ष में जबर्दस्त पैरवी की. 19 جنوری 1971 को कोर्ट ने जब्ती का आदेश निरस्त करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी जब्तशुदा पुस्तकें वापस करे और अपीलकर्ता मान्यवर यादव को तीन सौ रुपए मुकदमे का खर्च दे.
उत्तर प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. سماعت تین ججوں کی بنچ نے کی۔, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर ने की और दो अन्य जज थे पीएन भगवती और सैयद मुर्तज़ा फ़ज़ल अली. सुप्रीम कोर्ट में ‘उत्तर प्रदेश बनाम ललई सिंह यादव’ नाम के इस मामले पर 16 ستمبر 1976 को मान्यवर यादव के पक्ष में निर्णय सुनाया. इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही माना और राज्य सरकार की अपील को ख़ारिज कर दिया.
पेरियार ललई सिंह यादव ने बहुजन नायकों पर व्यापक शोध-विचार किया उनकी खोज-बिन की. بدھ مت کے متقی بہوجن بادشاہ اشوک ان کی مثالی شخصیات میں سے تھے۔. اس نے 'اشوکا لائبریری' کے نام سے ایک اشاعتی ادارہ قائم کیا اور اپنا پرنٹنگ پریس قائم کیا۔, जिसका नाम ‘सस्ता प्रेस’ रखा था.
उन्होंने पांच नाटक लिखे- (1) अंगुलीमाल (2) شمبوک ذبح (3) سینٹ مایا کی قربانی (4) एकलव्य और (5) नाग यज्ञ . اس نے نثر میں بھی تین کتابیں لکھیں (1) مظلوم پر مذہبی ڈاکہ (2) शोषितों पर राजनीतिक डकैती और (3) سماجی عدم مساوات کو کیسے ختم کیا جائے۔?
बहुजन साहित्य में उनके योगदान के बारे में कंवल भारती लिखते हैं, “यह साहित्य हिन्दी साहित्य के समानान्तर नई वैचारिक क्रान्ति का साहित्य था, जिसने हिन्दू नायकों और हिन्दू संस्कृति पर बहुजन वर्गों की सोच को बदल दिया था. یہ ایک نئی بحث تھی, جس کا ہندی ادب میں فقدان تھا۔. ललई सिंह के साहित्य ने बहुजनों में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध विद्रोही चेतना पैदा की और उनमें श्रमण संस्कृति और वैचारिकी का नवजागरण किया.”
मान्यवर यादव को पेरियार की उपाधि पेरियार की जन्मस्थली और कर्मस्थली तमिलनाडु में मिली. بعد میں وہ ہندی پٹی میں شمالی ہندوستان کے پیریار کے نام سے مشہور ہوئے۔. بہوجن ہیرو پیریار لالائی سنگھ کی پیدائش 1 ستمبر 1911 کانپور کے جھنجھک ریلوے اسٹیشن کے قریب کٹارا گاؤں میں پیدا ہوئے۔. دوسرے بہوجن ہیروز کی طرح ان کی زندگی بھی جدوجہد سے بھری ہوئی ہے۔. وہ 1933 میں گوالیار کی مسلح پولیس فورس میں کانسٹیبل کے طور پر بھرتی ہوا تھا۔, पर कांग्रेस के स्वराज आंदोलन का समर्थन करने के कारण वे बर्खास्त कर दिए गए. اس نے اپیل کی اور اپیل میں اسے بحال کر دیا گیا۔. 1946 انہوں نے گوالیار میں ہی 'نان گزیٹڈ ایمپلائز پولیس اینڈ آرمی ایسوسی ایشن' کی بنیاد رکھی۔, और उसके सर्वसम्मति से अध्यक्ष बने.
इस संघ के द्वारा उन्होंने पुलिसकर्मियों की समस्याएं उठाईं और उनके लिए उच्च अधिकारियों से लड़े. جب امریکہ میں ہندوستانیوں نے لالہ ہردیال کی قیادت میں 'گدر پارٹی' بنائی, چنانچہ ہندوستانی فوج کے سپاہیوں کو تحریک آزادی سے جوڑنے کے لیے کتاب 'سولجر آف دی وار' لکھی گئی۔. मान्यवर ललई सिंह यादव ने उसी की तर्ज पर 1946 'سولجرز ڈسٹرکشن' نامی کتاب لکھی۔, جو پرنٹ نہیں ہوا, لیکن ٹائپ کرکے اسے فوجیوں میں تقسیم کر دیا گیا۔. जैसे ही सेना के इंस्पेक्टर जनरल को इस किताब के बारे में पता चला, اس نے اسے اپنے خاص حکم سے پکڑ لیا۔. 'سپاہی کی تباہی' گفتگو کے انداز میں لکھی گئی کتاب تھی۔. اگر یہ شائع کیا گیا تھا, तो उसकी तुलना आज महात्मा जोतिबा फुले की ‘किसान का कोड़ा’ और ‘अछूतों की कैफियत’ किताबों से होती.
जगन्नाथ आदित्य ने अपनी पुस्तक में ‘सिपाही की तबाही’ से कुछ अंशों को कोट किया है, جس میں سپاہی اور اس کی بیوی کے درمیان گھر کی حالت زار پر مکالمہ ہے۔. آخر میں لکھا- “वास्तव में पादरियों, جنت و جہنم کے نام پر ملاؤں، مولویوں، پجاریوں کا نادیدہ تصور بالکل جھوٹ ہے۔. یہ آنکھوں نے دیکھا ہے, سچے جہنم کا انتظام جو سپاہی کے گھر کے سارے پر سے گزر چکا ہے۔. اس جہنم کے نظام کی وجہ- سندھیا حکومت کی بدانتظامی. لہٰذا اسے ہر معاملے میں پلٹنا ہوگا۔, ختم کرنا ہے. 'عوام پر عوام کی حکومت ہونی چاہیے', तब अपनी सब मांगें मंजूर होंगी।”
इसके एक साल बाद, لالائی سنگھ نے گوالیار پولیس اور فوج میں ہڑتال کر دی۔, جس کے نتیجے میں 29 اس دھمکی کے دوران سوشلسٹ فیکٹر کے ایڈیٹر 1947 انہیں گرفتار کر لیا گیا. مقدمہ, اور پانچ سال کی سخت قید کی سزا سنائی گئی۔. 9 ماہ جیل میں, اور جب ہندوستان آزاد ہوا۔, پھر ریاست گوالیار کے جمہوریہ ہند کے ساتھ انضمام کے بعد, وہ 12 جنوری 1948 को जेल से रिहा हुए.
1950 में सरकारी सेवा से मुक्त होने के बाद उन्होंने अपने को पूरी तरह बहुजन समाज की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया. وہ اس حقیقت سے بخوبی واقف تھے کہ برہمنیت کے خاتمے کے بغیر بہوجنوں کی آزادی نہیں ہو سکتی۔. ایک سماجی کارکن, ایک مصنف اور پبلشر کے طور پر، انہوں نے اپنی پوری زندگی برہمنیت کے خاتمے اور بہوجنوں کی آزادی کے لیے وقف کر دی۔. 7 فروری 1993 को उनका परिनिर्वाण हो गया।
مولانا آزاد اور ان کی برسی کو یاد کرتے ہوئے۔
مولانا ابوالکلام آزاد, مولانا آزاد کے نام سے بھی جانا جاتا ہے۔, ہندوستان کے نامور اسکالر تھے۔, آزادی…






