ایک میڈیا جس کی خبروں سے نفرت پھیل گئی 8 لاکھوں لوگوں کو ہلاک کیا
ان سات سالوں میں ملک میں بہت کچھ بدل گیا ہے۔. بنیادی طور پر نسلی تشدد, مذہبی تشدد اور نفرت اپنے عروج پر رہی ہے۔| اگر ہم ان شرمناک واقعات کو دیکھیں تو ان دنوں کی شروعات کل نہیں ہوئی تھی۔| اس کی تیاری کافی عرصے سے ہوئی ہوگی۔? ادبی میگزین ’’ہنس‘‘ کے مسلم خصوصی شمارے میں ایک مضمون میں لکھا ہے کہ 1977 مرکز میں بنی جن سنگھ حکومت میں اطلاعات و نشریات کے وزیر لال کرشن اڈوانی نے میڈیا کو ایک خاص نظریہ کے لوگوں سے بھرنا شروع کر دیا تھا۔| شاید یہ کھیل 1977 سے شروع ہوا ہوگا۔| جو آج صاف نظر آرہا ہے۔| ایسے لوگوں نے آج کے صحافیوں کو تیار کیا ہوگا۔? جس کی نفرت انگیز خبریں آج دیکھیں, سننے اور پڑھنے کو ملے| ان سات سالوں میں نفرت پھیلانے میں سب سے اہم کردار بھارتی ٹی وی چینلز اور بعض سرکردہ اخبارات نے ادا کیا ہے۔| میں یہاں کسی ٹی وی چینل یا اخبار کا نام نہیں لوں گا۔| आप मुझसे बेहतर जानते होंगे कि कौन से न्यूज़ वाले टीवी चैनल और अख़बार में हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर मस्जिद पर ज्यादा चर्चा समय समय पर होती रहती है| वो समय दो बार आता है| एक जब देश में कहीं चुनाव हो, दुसरा जब कोई सरकार अपनी नाकामी के कारण घिरी हो| ऐसे में न्यूज़ चैनल से लेकर उन प्रमुख अख़बार देश जनता का ध्यान भटकाने के लिए हिन्दी-मुस्लिम विवाद को सुर्खियां बनाते हैं और मीडिया के माध्यम से लोगों के दिलों-दिमाग में नफरत की ज़हर फैलाते हैं|
मीडिया द्वारा फैलाई गयी एक ऐसी ही नफरत ने 100 दिनों 8 लाख लोगों को मौत के घाट उतरवा दिया था. हम बात कर रहे हैं रवांडा रेडियो नरसंहार की जहाँ तुत्सी और हूतू समुदायों के बीच जमकर नरसंहार हुआ था| 7 اپریل 1994 से लेकर अगले 100 दिनों तक अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों को हूतू समुदाय वालों ने मौत के घाट उतार दिया था|
कैसे शुरू हुआ ये नरसंहार?
इस नरसंहार में हूतू जनजाति से जुड़े चरमपंथियों ने अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों और अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया था| छह अप्रैल 1994 की रात तत्कालीन राष्ट्रपति जुवेनल हाबयारिमाना और बुरुंडी के राष्ट्रपति केपरियल नतारयामिरा को ले जा रहे विमान को किगाली, रवांडा में गिराया गया था| इसमें सवार सभी लोग मारे गए| किसने ये जहाज गिराया था, इसका फ़ैसला अब तक नहीं हो पाया है| कुछ लोग इसके लिए हूतू चरमपंथियों को ज़िम्मेदार मानते हैं जबकि कुछ लोग रवांडा पैट्रिएक फ्रंट (आरपीएफ़) کو|
चूंकि ये दोनों नेता हूतू जनजाति से आते थे और इसलिए इनकी हत्या के लिए हूतू चरमपंथियों अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय को ज़िम्मेदार ठहराया| इसके तुरंत बाद हत्याओं का दौर शुरू हो गया|
रेडियो से आवाज़ आई- ‘तिलचट्टों को साफ़ करो’
रवांडा बहुत ही नियंत्रित समाज रहा है, ज़िले से लेकर सरकार तक| उस समय की पार्टी एमआरएनडी की युवा शाखा थी ‘इंतेराहाम्वे’ जो लड़ाकों में तब्दील हो गई थी उसने ही इन हत्याओं को अंजाम दिया|
स्थानीय ग्रुपों को हथियार और हिट लिस्ट सौंपी गई, जिन्हें पता था कि उनके शिकार कहां मिलेंगे|
हूतू चरमपंथियों ने एक रेडियो स्टेशन स्थापित किया, ‘आरटीएलएम’ और एक अख़बार शुरू किया जिसने नफ़रत का प्रोगैंडा फैलाया| इनमें लोगों से आह्वान किया गया, ‘तिलचट्टों को साफ़ करो’ मतलब तुत्सी लोगों को मारो. जिन प्रमुख लोगों को मारा जाना था उनके नाम रेडियो पर प्रसारित किए गए|
यहां तक कि पादरी और ननों का भी उन लोगों की हत्याओं में नाम आया, जो चर्चों में शरण मांगने गए थे| 100 दिन के अन्दर इस नरसंहार में लगभग 8 लाख तुत्सी समुदाय के लोग मारे गए थे|
ये कहानी मध्य-पूर्व अफ्रीकी में स्थित एक देश की है |हाँ तब की मीडिया रेडियो द्वारा एक दुष्प्रचार ने एक झटके में लाखों लोगों को मरवा दिया|
अब आते हैं सीधे असल मुद्दे पर जो भारतीय टीवी चैनल और कुछ प्रमुख अखबार के कारनामे हैं| भारतीय मीडिया भी अब बिल्कुल निष्पक्ष नहीं रहा गया| वहां भी खबरें टीआरपी, पैसा और ग्लैमर के हिसाब से चलाई जाती है| आपको पिछले साल की एक घटना याद होगी जब सभी मुल्क कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहे थे, तो हमारी मीडिया हिन्दू-मुस्लिम डिबेट करा रही थी|
निजामुद्दीन मरकज पर टीवी चैनल वाले जिस तरह से चीख-चीख कर मुसलामनों को कटघरे में खड़ा कर रहे थे और प्रमुख अखबार अपनी सुर्ख़ियों में मुसलामनों को ललकार रहे थे| दरअसल यह मीडिया द्वारा एक ऐसा प्रोपगैंडा था कि सरकार की नाकामी पर उंगली कोई न उठाए और ये देश हिन्दू-मुस्लिम झगड़े में उलझता जाएं| आप पिछले साल के सभी न्यूज़ चैनल और प्रमुख अख़बारों को उठा कर देख ले आपको समझ आ जाएगी नफरत फैलाने में मीडिया का कितना बड़ा योगदान रहा है|
अभी कुछ दिन पहले यूपी एटीएस ने धर्मपरिवर्तन कराने के आरोप में दिल्ली से दो मुसलमान व्यक्ति को गिरफ्तार किया है| खैर पुलिस ने कारवाही की और मामला कोर्ट में जाएगा| लेकिन इस घटना पर भी मीडिया का रवैया देख ले तुरंत मीडिया ट्रायल शुरू करके कोर्ट बन जाती है जबकि न्याय देने का अधिकार कोर्ट का है| इस देश में इस तरह की एक दो केस नहीं हैं कई केस मिल जायेंगे आपको|
जब बेवजह UAPA या NSA में कई मुस्लिम 10-20 साल के लिए जेल के अन्दर ठूस दिए जाते हैं और लम्बी कानूनी प्रक्रिया के बाद दस-बीस साल बाद कोर्ट से बाइज्जत बरी होकर निकलते हैं| लेकिन तब तक अपना सब कुछ खो चुके होते हैं| इनकी गिरफ्तारी और जाँच तक मीडिया आंतकवादी, देशद्रोही और न जाने किस-किस तमगे से नवाज देती है| लेकिन जब यही आरोपी कोर्ट द्वारा बाइज्जत बरी होते हैं तो मीडिया इनकी बेगुनाही और सिस्टम द्वारा बनाए गए लाचार को नहीं दिखाती. ऐसे कई केस आपको दिख जायेंगे|
इन सात सालों में सभी टीवी चैनल ने बड़े बड़े प्रोग्राम करके हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद डिबेट में देश को उलझाए रखा है| सुबह से रात तक नफरती डिबेट से देश या जनता को क्या मिलता है| वो आप मुझसे बेहतर जानते होंगे. क्योंकि अब किसी को रोजगार, स्वास्थ्य और सस्ती तथा अच्छी शिक्षा नहीं चाहिए| खैर ऐसे तबकों के लिए रवांडा रेडियों नरसंहार से हुए बर्बादी से भी कोई मतलब नहीं होगा?
नुरुल होदा एक स्वतंत्र पत्रकार है
مولانا آزاد اور ان کی برسی کو یاد کرتے ہوئے۔
مولانا ابوالکلام آزاد, مولانا آزاد کے نام سے بھی جانا جاتا ہے۔, ہندوستان کے نامور اسکالر تھے۔, آزادی…





