ذات پات کے امتیازی سلوک ، بہوجن معاشرے کو ایک ناقابل تلافی نقصان ، سورجپال چوہان جی کی یاد ہے۔
ہندی ادب کے ایک سینئر لیٹریٹور ، سورج پال چوہان اب نہیں ہیں۔ آج 15 وہ جون کو صبح کے وقت مجرم بن گیا۔ وہ 66 वर्ष के थे। सूरजपाल चौहान पिछले काफी दिनों से बीमार थे और लगातार उनका डायलिसिस हो रहा था। उनके निधन की सूचना से बहुजन साहित्य के साथ हिन्दी साहित्य की भारी क्षति हुई है। सूरजपाल चौहान की कविताओं और कहानियों ने बहुजन समाज को जगाने और झकझोरने का काम किया। वह अपनी कविताओं की चंद पंक्तियों के जरिए बड़ी-बड़ी बातें कह देते थे, جس کی وجہ سے بہوجن سماج سوچنے پر مجبور ہو گیا۔

20 اپریل 1955 سوجپال چوہان جی، یوپی کے ضلع علی گڑھ کے گاؤں پھسووالی میں پیدا ہوئے، جدوجہد اور ذلت کے بطن سے جنم لینے والا ایسا ہیرا تھا جس کی چمک صدیوں تک ان کے ادبی کاموں میں رہے گی۔
चूड़ा(भंगी) سماج میں پیدا ہوئے سورج پال چوہان جی ایک بہوجن دانشور تھے، ذات پات کے ڈنک سے جل گئے، جنہوں نے اپنی پوری زندگی اپنے سماج کو بیدار کرنے کے لیے وقف کردی۔

دلت دستک کے ایڈیٹر محترم اشوک داس جی کو دیئے گئے انٹرویو کے مطابق، ان کی پیدائش کے بعد، جب وہ بچپن میں تھے، تو وہ اپنی بیمار ماں کے ساتھ روزی روٹی کے لیے گندگی صاف کرنے کے لیے نام نہاد اونچی ذات کے مقامات پر جایا کرتے تھے۔(टोकरी) में भरकर माँ के सिर पर उठाते थे।इन सब कामों को करने के बावजूद वे अपनी माँ को भद्दी-भद्दी जातिगत गालियां सुनते हुये देखते थे।
कक्षा दो तक गांव में अन्य जाति के बच्चों से अलग बैठाए जाने व हिकारत की भाषा मे मास्टरों की बातें सुनने के साथ वे जैसे-तैसे पढ़े फिर अपने पिताजी के पास दिल्ली चले आये जो सामान ढोने का काम करते थे।एक दूर के रिश्तेदार ने उन लोगों को शौचालय में रहने को जगह दी थी जिसमे रहते हुये किसी तरह से उन लोगों ने समय काटा।

سورج پال چوہان جی نے دہلی کے ایک آریہ سماجسٹ اسکول میں داخلہ لیا، جہاں ان کے موٹے موٹے جسم کی وجہ سے انہیں پہلے گپتا سمجھا جاتا تھا اور انہیں پہلی قطار میں بٹھایا گیا اور گایتری منتر پڑھ کر ہون کیا جاتا تھا، لیکن جیسے ہی یہ انکشاف ہوا کہ وہ چورا/بھنگی ہیں۔,उनके संस्कृत टीचर व कक्षाध्यापक वेदपाल शर्मा की दिनचर्या ही बन गयी उन्हें नित्य गालियां देने व मार-पिटाई करने की।वह कथित शिक्षक उन्हें उनकी जाति के कारण अनायास पीटता व संस्कृत में फेल कर देता था।
बीए में जाने पर सूरजपाल जी ने अपने गोत्र नाम चौहान को अपनी टाइटिल में जाति छुपाने की नियत से जोड़कर अपना नाम सूरज पाल चौहान कर दिया लेकिन जाति है कि जाती नही,वह सामने आ ही जाती है।कालेज में वजीफा पाने वालों की सूची ब्लैकबोर्ड पर लिख दी गयी थी जिसमे सूरज पाल चौहान जी का भी नाम था फिर क्या उनके जो मित्र थे वे उनकी जाति जान फब्तियां कसने लगे।
जाति के नाते सूरजपाल चौहान जी को नौकरी करते समय भी ट्रांसफर आदि की दुस्वारियाँ झेलनी पड़ीं।सूरजपाल चौहान सर 5-6 वर्षो तक आरएसएस से भी जुड़े रहे जहां उन्हें हिंदुत्व से सम्बन्धित गीतों को गाने हेतु मंच दिया जाता रहा।वे अपनी चौहान टाइटल के नाते सवर्ण समझे जाने के कारण अभिजात्य वर्ग के संघियो द्वारा जगजीवन राम जी से लेकर दलित समाज के प्रति उनकी गालियों व हिकारत भरी बातों को सुनते रहे।

बाबा साहब को पढ़ने और ओमप्रकाश बाल्मीकि जी के संगत में आने के बाद आरएसएस छोड़ बहुजन समाज के लिए पूर्ण समर्पित हो अपनी आत्मकथा “तिरस्कृत” व सन्तप्त” लिखने वाले सूरजपाल चौहान जी ने फिर ऐसी-ऐसी रचनाओं का सृजन किया कि वह आज जेएनयू सहित तमाम यूनिवर्सिटीज व लोक गायकों की धुनों में गायी व पढ़ाई जा रही है और उससे बहुजन समाज मे चेतना का प्रस्फुटन हो रहा है।सूरजपाल चौहान जी की रचना “ये दलितों की बस्ती है” اور “भीमराव का दलित नहीं यह गांधी का हरिजन है” अत्यंत ही मारक हैं।
سورج پال چوہان کی زندگی کی جدوجہد ہندوستانی سماجی نظام کا آئینہ ہے جس میں ہم اس سماج کا بگڑا ہوا چہرہ دیکھ سکتے ہیں۔
सूरजपाल चौहान जी जैसे महानायकों की इस समाज को आज बहुत जरूरत है जो घृणित रीति-रिवाजों,परम्पराओ,रूढ़ियों,मनुवादी विकारों को ललकार सके,समाज को दिखा,जता व बता सके तथा अपने सोए हुये समाज को नींद से झकझोरते हुये जगा सके लेकिन दुःखद कि 20 اپریل 1955 को जन्मे सूरजपाल चौहान जी 15 جون 2021 को हमलोगों को अलविदा कहकर चले गए।सूरजपाल चौहान जी का निधन सम्पूर्ण बहुजन मूवमेंट के लिए दुःखद है।हम श्रद्धावनत हैं उनके अद्वितीय सामाजिक,वैचारिक व साहित्यिक योगदान के लिए और उन्हें अश्रुपूरित नमन करते हैं।
~~चन्द्रभूषण सिंह यादव ~~
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