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International - Opinions - Social - State - June 14, 2018

मेरा जीवन तीन गुरुओं और तीन उपास्यों से बना है- बाबासाहब डॉ बीआर अम्बेडकर

नई दिल्ली। 25 अक्टूबर 1954 के दिन बाबासाहब डॉ अम्बेडकर का हीरक महोत्सव मुंबई के पुरंदरे स्टेडियम में मनाया गया था। वहीं पर बाबासाहब ने अपने भाषण में कहा था कि..

मेरे तीन उपास्य (देवता) है…

 

मेरे प्रथम देवता ज्ञान है।

मेरा दूसरा देवता स्वाभिमान है और

मेरा तीसरा देवता शील है।

 

वहीं आगे बाबासाहब कहते हैं कि…

 

हर मनुष्य के गुरु होते हैं, उसी तरह मेरे भी गुरु (प्रेरणास्रोत) है।

मेरे प्रथम और श्रेष्ठ गुरु बुद्ध है।

मेरे दुसरे गुरु कबीर हैं और

मेरे तीसरे गुरु जोतिबा फुले हैं।

यही मेरे तीन गुरु हैं, इनकी शिक्षाओं से ही मेरा जीवन बना है।

 

जोतिबा फुले के बारे में बोलते हुए बाबासाहब कहते हैं कि “ब्राह्मणेतर समाज के सच्चे गुरु वही है। उन्होंने ही हमें मानवता का पाठ पढ़ाया और कहा आगे राजनीती में हम जोतिबा के मार्ग का ही अनुसरण करेंगे। कोई कहीं भी जाए लेकिन हम जोतिबा के रास्ते पर ही चलेंगे। साथ में कार्ल मार्क्स या किसी दुसरे को साथ मे ले लेंगे मगर जोतिबा का रास्ता नहीं छोड़ेंगे।

यहाँ सबसे अहम् सवाल यह है कि डॉ आंबेडकर ने जोतिराव फुले को अपने गुरु का दर्जा क्यो दिया था? जरा पढ़ लीजिये यह बात हमारे मित्र सिद्धार्थ रामू की कलम से…

 

फुले की किताब “गुलामगिरी” 1873 में प्रकाशित हुई। आधुनिक भारत की यह पहली किताब थी, जिसने यह बताया कि भारत के बहुलांश लोगों के दुख और अपमानजक जिंदगी की मूल वजह वर्ण-जाति की व्यवस्था और इसको स्थापित करने वाली ब्राह्मणवादी विचारधारा है। मार्क्स का कहना था कि…अब तक इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है, तो भारत में भी वर्ग संघर्ष हुआ होगा।

फुले की किताब गुलामगिरी यह बताती है कि कैसे भारत में ब्राह्मणवादियों और शूद्रों-अतिशूद्रों के बीच हजारों वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। कितनी बार शूद्रों-अतिशूद्रों ने आर्य-ब्राह्मणवादियों को पराजित किया। लेकिन इस देश और बहुतांश आबादी का दुर्भाग्य था कि अंत में ब्राह्मणवादियों की विजय हुई। और शूद्रों-अतिशूद्रों एवं महिलाओं को विभिन्न जातियों में बांटकर उनके बीच फूट डालकर उन्हें हमेशा के लिए गुलाम बना लिया गया।

 

फुले ने गुलामगिरी में विष्णु के विभिन्न अवतारों का वर्णन किया है। गुलामगिरी के सोलह परिच्छेदों में यह बताया है कि विष्णु के मत्स्य, कच्छ, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम और अन्य अवतार और कुछ नहीं हैं, बल्कि छली, कपटी, हिंसक और धूर्त आर्य-ब्राह्मणों के अगुवा हैं, जिन्होंने यहां की अनार्य समाज और उसकी संस्कृति के संरक्षक राजाओं पर हमला बोला। उन्होंने धोखे से बलिराज और हिराकश्यपु जैसे राजाओं की हत्या की।

गुलामगिरी की प्रस्तावना में लिखा है कि कैसे ब्राह्मण पुरोहितों ने शूद्रों-अतिशूद्रों पर सदा के लिए अपना वर्चस्व और नियंत्रण कायम करने के लिए झूठे ग्रंथों की रचना की। इन ग्रंथो के बारे में फुले लिखते हैं कि “ इन नकली ग्रंथों में उन्होंने यह दिखाने की पूरी कोशिश की कि उन्हें विशेष अधिकार प्राप्त हैं और वे ईश्वर द्वारा प्राप्त है। इस तरह का झूठा प्रचार उस समय के अनपढ़ लोगों में किया गया और शूद्रों-अतिशूद्रों के बीच मानसिक गुलामी के बीज बोये गये।

फुले ने अपनी किताब गुलामगिरी में इन झूठी किताबों और इन गढ़े गये भगवानों की असलियत को उजागर किया है। आधुनिक भारत में फुले पहले विचारक थे, जिन्होंने यह बताया कि इस देश की मूल समस्या वर्ण-जाति की व्यवस्था और उसके स्थापित करने वाली एवं बनाये रखने वाली ब्राह्मणवादी विचारधारा है। उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले के साथ मिलकर शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति की अलख जगाई।

उनका निरंतर संघर्ष चितपावन ब्राह्मण तिलक से चलता रहा, जो ब्राह्मणवाद के हिमायती थे, शूद्रों-अतिशूद्रों एवं महिलाओं की मुक्ति के हर कदम का विरोध करते थे। इस तरह फुले आधुनिक भारत मे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने समझा और समझाया कि सारी समस्याओं का मूल कारण ब्राह्मणवाद है।

फुले को आंबेडकर द्वारा गुरु मानने का मूल कारण यही था कि उन्होंने सबसे पहले यह बताया कि वर्ण-जाति व्यवस्था और इस पोषक ब्राह्मणवादी विचारधारा के समूल नाश के बिना इस देश और बहुसंख्यक जन की मुक्ति नहीं हो सकती। जोतिराव फुले की गुलामगिरी करीब 100 पृष्ठों की ही किताब है, इसे प्रत्येक भारतीय व्यक्ति को जरूर पढ़ना चाहिए।

-DR. JD Chandrapal

 

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