گھر سماجی سالگرہ خصوصی: جانئے کون تھا پیریار ای وی رامسوامی نائکر، جس نے برہمنیت کی قبر کھودی?
سماجی - جنوبی بھارت - حالت - ستمبر 17, 2018

سالگرہ خصوصی: جانئے کون تھا پیریار ای وی رامسوامی نائکر، جس نے برہمنیت کی قبر کھودی?

بذریعہ- سدھارتھ رامو

ہم سب جانتے ہیں کہ تمل ناڈو ان چند ریاستوں میں شامل ہے۔, جہاں برہمن ازم کو فیصلہ کن شکست دی گئی۔ اگر ایک شخص اس کا سب سے زیادہ کریڈٹ لیتا ہے ،, اس شخص کا نام ہے,ई.वी.रामास्वामी नायकर यानी पेरियार। हिंदी गाय पट्टी का ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन जहां राजनीति दायरे तक ही कमोवेश सीमित रहा, اس کے برعکس دراوڑی تحریک نے برہمن ازم کو سماجی بنا دیا۔, ثقافتی, राजनीतिक और कॉफी हद तक आर्थिक स्तर पर चुनौती दी। उन्होंने अपने आत्मसम्मान आंदोलन के माध्यम से जाति व्यवस्था के खात्मे, ब्राह्मणी वर्चस्व के विरोध और स्त्री-पुरूष समानता के लिए संघर्ष किया। फुले और आंबेडकर की तरह ही उन्होंने हिंदू धर्म और ब्राह्मणवाद को एक दूसरे का पर्याय माना। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जब तक हिंदू धर्म है, پھر ذات پات کا نظام ہے اور تب تک برہمن ازم باقی رہے گا۔

पेरियार ने ही द्रविड़ कडगम आंदोलन शूुरू किया। इस आंदोलन के उद्देश्य के बारे में उन्होंने लिखा “‘द्रविड़ कड़गम आंदोलन’ اس کا صرف ایک مقصد ہے اور صرف ایک ہی مقصد ہے کہ آریائی برہمن ورنا سسٹم کو ختم کیا جائے۔, جس کی وجہ سے معاشرہ اونچی اور نچلی ذاتوں میں بٹا ہوا ہے۔. دراوڑ کزگم تحریک وہ تمام صحیفے, پرانوں اور دیوتاؤں اور دیویوں پر یقین نہیں رکھتا۔, وہ جو ورنا اور ذات پات کے نظام کے حق میں کھڑے ہیں۔ اس نے پورے تامل ناڈو میں منسمرتی اور رامائن کو جلایا۔

پیریار ڈاکٹر. आंबेडकर तरह ही ब्राह्मणवाद और हिंदू धर्म को एक दूसरे का पर्याय मानते थे। उन्होंने लिखा है कि “हिन्दू परजीवी हैं। हम कड़ी मेहनत करते हैं, वे हमारे श्रम का रस चूस लेते हैं। अगर आज़ादी इस शोषण का अंत नहीं कर सकती तो ऐसी आज़ादी मिले या न मिले कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर आप इतिहास पर नज़र डालें, پرانوں کو دیکھیں, मनु के शास्त्र को पढ़ें या आर्यों के किसी भी साहित्य पर गहराई से नज़र डालें तो आप पाएँगे कि आर्य हिन्दू बिना मेहनत किए परजीवियों की भाँति दूसरों की मेहनत पर जीवित रहते थे। वे आज भी ऐसा ही कर रहे हैं।”

پھول, ڈاکٹر. आंबेडकर और पेरियार आधुनिक काल में ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन के आधार स्तंभ है। इनके विचारों को अपनाए बिना ब्राह्मणवाद का गाय पट्टी से नाश नहीं किया जा सकता है। फुले और डॉ. आंबेडकर के विचारों से धीरे-धीरे गाय पट्टी परिचित हो रहा है, लेकिन पेरियार के विचार आज भी बहुत कम परिचय है।

~ سدھارتھ رامو

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